अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ अभिजीत अय्यर मित्रा ने ब्रिक्स, पाकिस्तान, वैश्विक शक्ति संतुलन, पश्चिमी देशों के साथ विकासशील देशों की सामूहिक सौदेबाजी और बदलती विश्व व्यवस्था पर अपनी बेबाक राय रखी। उनके साथ पाञ्चजन्य की सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्यांश
अभिजीत अय्यर का कहना है कि ब्रिक्स को पश्चिम के खिलाफ किसी गठबंधन के रूप में नहीं, बल्कि विकासशील देशों के लिए सामूहिक बातचीत और अपने हितों को मजबूती से रखने के मंच के तौर पर देखना चाहिए। ब्रिक्स में भारत का उद्देश्य बहुध्रुवीय व्यवस्था में अपने हितों को सुरक्षित करना है। अमेरिका कई बार भारत पर रूस से तेल खरीदने या कुछ देशों के साथ व्यापार सीमित करने का दबाव डालता है। ऐसे में ब्रिक्स जैसा बहुपक्षीय मंच भारत को सामूहिक रूप से अपनी बात रखने का अवसर देता है। उन्होंने कहा कि चीन के साथ भारत के द्विपक्षीय तनाव के बावजूद बहुपक्षीय मंच पर बातचीत की गुंजाइश बनी रहती है।
ब्रिक्स का महत्व इसी में है कि अलग-अलग हितों वाले देश भी एक मंच पर बैठकर बातचीत और सामूहिक सौदेबाजी कर सकते हैं। उनके अनुसार ब्रिक्स को पश्चिम के खिलाफ खड़े किसी समूह के बजाय सामूहिक बातचीत के मंच के रूप में देखने की जरूरत है। विकासशील देश एक साथ बातचीत करके पश्चिमी देशों से बेहतर शर्तें हासिल कर सकते हैं।
जलवायु वार्ताओं का उदाहरण देते हुए अय्यर ने कहा कि अतीत में चीन ने अलग से समझौता कर भारत को पीछे छोड़ दिया था। इसलिए भारत को इस बार अधिक सतर्क रहते हुए सामूहिक सौदेबाजी की रणनीति अपनानी चाहिए। पाकिस्तान के ब्रिक्स में शामिल होने की इच्छा पर उन्होंने कहा कि ब्रिक्स में शामिल देशों के पास या तो मजबूत आर्थिक क्षमता है या भविष्य में महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता है। उन्होंने वियतनाम और कजाकिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों देशों की अपनी रणनीतिक और आर्थिक उपयोगिता है।
उनके अनुसार, पाकिस्तान के पास ऐसा कोई स्पष्ट आर्थिक या रणनीतिक योगदान नहीं है, जिसके आधार पर उसे ब्रिक्स में शामिल करने की मजबूत वजह दिखाई दे। उन्होंने कहा कि आतंकवाद पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अमेरिका और चीन के बीच बदलते शक्ति संतुलन पर अय्यर ने कहा कि दुनिया इस समय एक बड़े सिस्टम परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। उनके अनुसार, अमेरिकी प्रभुत्व धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है और इस संक्रमण के दौरान वैश्विक तनाव बढ़ सकता है।
उन्होंने आशंका जताई कि चीन के पास भविष्य की वैश्विक शक्ति बनने की सबसे अधिक संभावना है, हालांकि उसकी अर्थव्यवस्था में कई संरचनात्मक कमजोरियां भी हैं। चीन के बड़े कर्ज और बुनियादी ढांचे से जुड़े निवेश को उन्होंने संभावित जोखिम बताया। उन्होंने कहा कि चीन की अर्थव्यवस्था में यदि बड़ा वित्तीय संकट आता है तो उसका प्रभाव बेहद व्यापक हो सकता है। हालांकि, उनके अनुसार, डॉलर निकट भविष्य में वैश्विक प्रमुख मुद्रा की भूमिका से हटने वाला नहीं है।
अय्यर ने कहा कि दुनिया अभी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विनिर्माण, सूचना की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया और मोबाइल तकनीक के कारण तेजी से बदल रही है। सरकारें और समाज इन बदलावों की गति को पूरी तरह समझने और उनका अनुमान लगाने की स्थिति में अभी नहीं हैं। आने वाले करीब 25 वर्ष में वैश्विक व्यवस्था के इस परिवर्तन के कारण काफी तनाव देखने को मिल सकता है। ऐसे में देशों को बदलती परिस्थितियों पर लगातार नजर रखते हुए संभावित चुनौतियों से निपटने की तैयारी करनी होगी।

















