यह श्लोक प्राचीन नीति-साहित्य एवं ‘सुभाषित-रत्न-भांडागार’ जैसी नीति-रत्नावली पुस्तकों से उद्धृत है। विभिन्न भारतीय नीति-ग्रंथों और महाभारत के प्रसंगों में युग-धर्म के वर्णन के अंतर्गत भी ऐसे विचार मिलते हैं।
श्लोक :
त्रेतायां मंत्र-शक्तिश्च, ज्ञानशक्तिः कृते युगे।
द्वापरे युद्ध-शक्तिश्च, संघशक्तिः कलौ युगे॥
भावार्थ :
सत्ययुग में ‘ज्ञान-शक्ति’, त्रेता में ‘मंत्र शक्ति’ तथा द्वापर में ‘युद्ध-शक्ति’ प्रबल थी, किन्तु कलियुग में ‘संगठन की शक्ति’ (संघशक्ति) ही प्रधान है।
आज के युग (कलियुग) में प्रासंगिकता :
1. सामूहिक शक्ति ही सफलता का आधार (Power of Unity & Collaboration)
श्लोक का संदेश: सत्ययुग में केवल ज्ञान और द्वापर में केवल व्यक्तिगत बाहुबल (युद्ध-शक्ति) से कार्य सिद्ध हो जाते थे, लेकिन कलियुग में एकाकी व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली या ज्ञानी क्यों न हो, वह अकेला परिवर्तन नहीं ला सकता।
वर्तमान प्रासंगिकता: आज के समय में कोई भी बड़ा लक्ष्य—चाहे व्यापार हो, सामाजिक क्रांति हो, या राजनीतिक परिवर्तन—बिना टीमवर्क, संगठन और नेटवर्किंग के संभव नहीं है। आज का युग व्यक्तिगत नायकत्व का नहीं, बल्कि ‘कोलेबोरेशन’ (Collaboration) का है।
2. लोकतंत्र और जनशक्ति का आधार (Democratic & Civic Power)
आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह से ‘संघ-शक्ति’ (जनता की सामूहिक इच्छाशक्ति) पर निर्भर है। जब नागरिक या समुदाय किसी उद्देश्य के लिए एकजुट (Organized) होते हैं, तभी वे अपनी माँगें मनवाने या कानून और व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम होते हैं।
3. वैश्वीकरण और डिजिटल नेटवर्क (Globalization & Digital Networks)
आज के डिजिटल युग में इंटरनेट, सोशल मीडिया कम्युनिटीज़ और वैश्विक नेटवर्क ‘संघ-शक्ति’ के ही आधुनिक रूप हैं। एक जैसा विचार रखने वाले लोग मिलकर जब एक मंच पर आते हैं, तो वे बड़े से बड़े बदलाव को अंजाम दे सकते हैं।

















