यह प्रसिद्ध संस्कृत नीति श्लोक ‘पञ्चतन्त्र’से उद्धृत है। इसके अतिरिक्त, यह श्लोक विभिन्न नीति-संग्रहों जैसे ‘सुभाषित-रत्न-भांडागार’ और ‘चाणक्य नीति’ के संदर्भों में भी पाया जाता है।
श्लोक :
वाचा मित्रत्वमायाति वाचैवायाति शत्रुताम्।
इति विज्ञाय संघार्थी सदा वाचंयमो भवेत्॥
भावार्थ :
वाणी से ही मित्रता होती है और वाणी से ही शत्रुता होती है, यह ध्यान में रखकर संगठन चाहने वाला व्यक्ति सदा वाणी के संयम वाला रहे।
श्लोक का विश्लेषण और प्रासंगिकता :
1. संगठन और दल-संचालन :
श्लोक का संदेश: जो व्यक्ति किसी संगठन, समाज या दल को जोड़कर रखना चाहता है (संघार्थी), उसे अपनी वाणी पर विशेष नियंत्रण रखना चाहिए।
वर्तमान प्रासंगिकता: आज कॉर्पोरेट वर्ल्ड, राजनीति और सामाजिक संगठनों में Soft Skills और Emotional Intelligence को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है। एक कठोर या कड़वा शब्द किसी पूरी टीम की एकता और निष्ठा को तोड़ सकता है, जबकि संयमित वाणी से दूरियों को मिटाया जा सकता है।
2. रिश्तों में मधुरता और सद्भाव :
हमारी बोली ही यह तय करती है कि सामने वाला हमारा मित्र बनेगा या शत्रु।
वर्तमान प्रासंगिकता: आजकल सोशल मीडिया और व्यक्तिगत जीवन में वाद-विवाद का मुख्य कारण असंगत या अमर्यादित भाषा है। यह श्लोक सिखाता है कि प्रतिक्रिया देने से पहले शब्दों का चयन अत्यंत सोच-समझकर करना चाहिए।

















