यह प्रसिद्ध श्लोक व्यक्ति-निर्माण और राष्ट्र-रक्षा के साथ ही विभिन्न विचारों के अंतर्गत समाज को दूषित करने वाले तत्वों से सावधान और संगठित जीवन के महत्व को दर्शाता है।
श्लोक :
कुटिलाः जटिलात्मानः शठाः कापटिकाश्च ये।
ते दूषयन्ति लोकानां विशुद्धं संघजीवनम्॥
भावार्थ :
जो कुटिल हों, शुद्ध मन वाले न हों, शठ (दुष्ट) हों, अन्यों के साथ कपट (छल) का आचरण करने वाले हों, वे लोगों के विशुद्ध संघ जीवन को दूषित कर देते हैं।
आज के युग में प्रासंगिकता :
सामाजिक एकजुटता की रक्षा: किसी भी संगठन, समाज या देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकता और परस्पर विश्वास होती है। यह श्लोक आगाह करता है कि कपटी और छली स्वभाव वाले लोग इस सामाजिक ताने-बाने को अंदर से खोखला कर देते हैं।
चरित्र-निर्माण का महत्व: यह पंक्तियां स्पष्ट करती हैं कि एक सुदृढ़ संघ या समाज के लिए केवल संख्याबल पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यक्तियों का मन से शुद्ध, निष्कपट और ईमानदार होना अनिवार्य है।
संगठनात्मक अनुशासन: किसी भी संस्था या सामूहिक व्यवस्था (संघ जीवन) को सुचारू रूप से चलाने के लिए आंतरिक पारदर्शिता ज़रूरी है। कुटिलता और चालाकी से संगठन में गुटबाज़ी और अविश्वास पैदा होता है, जिससे पूरे समूह का उद्देश्य भटक जाता है।
आधुनिक संदर्भ में उपयोगिता: आज के परिपेक्ष्य में, चाहे वह कॉरपोरेट टीम हो, सामाजिक संगठन हो या राष्ट्र—यह श्लोक याद दिलाता है कि नैतिक मूल्यों से रहित व्यक्ति पूरे समुदाय के वातावरण को विषैला बना सकते हैं।

















