
पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर जी और श्री परिंदु भगत (काकू भाई)- भाजपा नेता एवं प्रख्यात चार्टर्ड अकाउंटेंट
अहमदाबाद में आयोजित ‘साबरमती संवाद 2026’ में पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर जी ने भाजपा नेता एवं प्रख्यात चार्टर्ड अकाउंटेंट श्री परिंदु भगत (काकू भाई) से विशेष बातचीत की। इस दौरान काकू भाई ने नरेंद्र भाई मोदी से अपने शुरुआती परिचय, उनके व्यक्तित्व की सादगी, साहस, संगठन क्षमता और पारदर्शिता से जुड़े कई रोचक संस्मरण साझा किए।
प्रश्न : नरेंद्र भाई मोदी से आपका पहला संपर्क कब और कैसे हुआ?
उत्तर: नरेंद्र भाई मोदी से मेरा पहला परिचय वर्ष 1969 में अहमदाबाद में हुआ। उस समय अहमदाबाद में एक बड़ा दंगा हुआ था। नरेंद्र भाई उस समय विश्व हिंदू परिषद का काम देखने के लिए आए थे। उसी दौरान संघ की एक बैठक हुई, जिसमें मैंने नरेंद्र भाई को पहली बार सुना। हालाँकि, नरेंद्र भाई हमारे घर पर भी आते थे लेकिन वे व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि संघ के काम के सिलसिले में मेरे पिताजी से मिलने आते थे। उन्हें देखकर मन में यह भाव बनने लगा था कि यह व्यक्ति आगे चलकर संघ का प्रचारक बन सकता है।
लेकिन वर्ष 1969 की उस बैठक में उन्हें पहली बार सुनने का अनुभव मेरे लिए बिल्कुल अलग था। मैं सामने बैठा हुआ था और नरेंद्र भाई जिस तरह अपनी बात रख रहे थे, उससे मेरे मन में एक विचार आया- “यह आदमी तो मरे हुए मुर्दे में भी जान डाल सकता है।” उनके व्यक्तित्व में लोगों को प्रेरित करने और उनमें ऊर्जा भरने की अद्भुत क्षमता थी।
प्रश्न : कुछ लोग मानते हैं कि नरेंद्र मोदी जी को समझना बहुत कठिन है। लेकिन आपने उन्हें बहुत करीब से देखा है। उनकी सरलता का कोई ऐसा उदाहरण, जो लोगों को जरूर जानना चाहिए?
उत्तर: नरेंद्र भाई की सरलता उनके व्यवहार में हमेशा दिखाई देती थी। संघ के विजयादशमी के कार्यक्रम में हम लोग परिवार के साथ जाते थे। वहाँ अंदर की ओर एक जगह थी। नरेंद्र भाई बिल्कुल पीछे, एक कोने में, पूर्ण गणवेश में चुपचाप बैठकर कार्यक्रम देखते थे। उनके व्यवहार में कभी यह भाव नहीं दिखाई देता था कि वे किसी विशेष स्थान या विशेष सम्मान के अधिकारी हैं। उनकी सरलता के साथ-साथ उनके साहस और जिम्मेदारी की भावना का एक प्रसंग आज भी मेरे मन में अंकित है। वर्ष 1967 में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना हुई थी। उस समय पूजनीय गुरुजी की इच्छा थी कि सभी मंडलेश्वर, आचार्य और महामंडलेश्वर एक साथ मंच पर आएँ। उस समय यह व्यवस्था थी कि 108 और 1008 जैसी उपाधियों वाले संतों के लिए मंच पर अलग-अलग ऊँचाई की गद्दियाँ रखी जाएँ। लेकिन संघ का मूल विचार था कि संगठन के काम में सभी समान हैं।
इसी भावना के साथ विश्व हिंदू परिषद का पहला सम्मेलन सिद्धपुर में आयोजित किया गया। नरेंद्र भाई का मूल गाँव वडनगर है, जो सिद्धपुर से लगभग 25-30 किलोमीटर की दूरी पर है। नरेंद्र भाई उस सम्मेलन में व्यवस्थापक के रूप में काम कर रहे थे। उस समय गुजरात में संघ के कार्य की जिम्मेदारी माननीय लक्ष्मणराव इनामदार जी के पास थी, जिन्हें सभी आदर से वकील साहब के नाम से जानते थे। वे उस कार्यक्रम के पूरे प्रभारी थे। उस समय संघ के पास आर्थिक संसाधन बहुत सीमित थे। पाँच रुपये का सहयोग भी बहुत बड़ी बात मानी जाती थी और संघ का खर्च भी बहुत कम होता था। विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन महामंत्री डॉ. बी.ए. वणीकर जी बहुत बड़े पैथोलॉजिस्ट थे। उनके उद्योगपतियों और मिल मालिकों से अच्छे संबंध थे। उन्होंने विभिन्न लोगों से सहयोग लेकर लगभग दो लाख रुपये एकत्र किए थे। उस समय दो लाख रुपये बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। कार्यक्रम की व्यवस्था के लिए वह रकम नरेंद्र भाई को सौंप दी गई। वकील साहब ने नरेंद्र भाई से कहा कि इस राशि को आप सुरक्षित रखिए। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सभी भुगतान किए जाने थे। जब कार्यक्रम समाप्त हुआ और भुगतान करने का समय आया, तो नरेंद्र भाई से कहा गया कि वह रकम ले आइए, ताकि सभी लोगों का हिसाब-किताब चुकता किया जा सके। नरेंद्र भाई सहज भाव से बोले, “चलिए, मेरे साथ।” वे उस स्थान पर गए जहाँ कार्यक्रम की व्यवस्था की गई थी। वहाँ एक जगह गद्दे के नीचे उन्होंने वह पूरी रकम सुरक्षित रखी थी। उन्होंने गद्दा हटाया और वहाँ से पूरे दो लाख रुपये निकालकर सामने रख दिए। सोचिए, इतनी बड़ी रकम लगभग एक महीने तक उनके पास रही, लेकिन उसमें से एक रुपये का भी दुरुपयोग नहीं हुआ। यही उनके साहस, ईमानदारी, पारदर्शिता और समाज के प्रति जिम्मेदारी का उदाहरण है।
प्रश्न : नरेंद्र भाई की कार्यशैली और दूरदृष्टि का कोई और उदाहरण, जो आपको आज भी याद हो?
उत्तर: उनकी कार्यशैली में एक बात हमेशा दिखाई देती थी- कम से कम खर्च में अधिक से अधिक काम करना।