बॉलीवुड लंबे समय से दर्शकों को यही समझाता रहा कि फिल्म की सफलता का सूत्र बड़ा सितारा, बड़ा बजट और भारी प्रचार है। लेकिन ‘हनुमान अंश’ ने इस धारणा के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है। यह केवल एक फिल्म की सफलता नहीं, बल्कि उस दर्शक की वापसी का संकेत है, जिसे मनोरंजन बाजार ने केवल ‘उपभोक्ता’ समझा, जबकि उसकी सांस्कृतिक चेतना, आस्था और जड़ों से जुड़ाव की आकांक्षा को नजरअंदाज किया।
दो करोड़ की पूंजी, सौ करोड़ का भरोसा
लगभग दो करोड़ रुपये में बनी, बिना बड़े सितारे और शोर-शराबे वाले प्रचार के 7 अगस्त 2026 को रिलीज हुई यह फिल्म न केवल बॉक्स ऑफिस पर धमाका कर रही है, बल्कि 51 साल पुराने ‘जय संतोषी मां’ के रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर हिंदी सिनेमा की सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाली भक्ति फिल्म बन गई है। 31 दिन में फिल्म ने 122.13 करोड़ रुपये नेट और 144.40 करोड़ रुपये ग्रॉस कमाई के साथ 2026 की ब्लॉकबस्टर फिल्मों में से एक बन गई है। कुछ रपटों में इसकी वैश्विक कमाई लगभग 322 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
‘हनुमान अंश’ नीब करौरी (नीम करौली) बाबा के जीवन और आध्यात्मिक दर्शन पर आधारित है।
विशाल चतुर्वेदी ने फिल्म का लेखन और निर्देशन किया है, जबकि निर्माण 21 वर्षीय अनुप्रिया नागर ने किया, जो यूके के यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ से अर्थशास्त्र में स्नातक हैं और पहली बार फिल्म निर्माण में उतरीं। फिल्म पारंपरिक जीवनी नहीं, बल्कि दादा-पोते के संवाद के जरिए बाबा के जीवन को प्रस्तुत करती है। कथा का केंद्र बाहरी खलनायक से संघर्ष नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के परिवर्तन, भक्ति, सेवा, करुणा और ईश्वर की खोज है। निर्देशक के मुताबिक, अधिकांश घटनाएं वास्तविक वृत्तांतों पर आधारित हैं, हालांकि कथा को जोड़ने के लिए सिनेमाई स्वतंत्रता ली गई। नीब करौरी बाबा की भूमिका शोभिनव सत्या ने निभाई है, जो मूलतः फिल्म के सहायक निर्देशक थे।
मुख्य अभिनेता के बीमार पड़ने पर पांच घंटे के ऑडिशन के बाद उन्हें यह भूमिका मिली। यही इस फिल्म की निर्माण यात्रा का प्रतीक है, जहां स्टारडम के बजाय पात्र की आवश्यकता को प्राथमिकता मिली। निर्देशक ने इस परियोजना के लिए मानदेय न लेने और आध्यात्मिक विषय के अनुरूप कठोर अनुशासन अपनाने की बात कही है। उनका कहना है कि फिल्म आध्यात्मिक अनुभव और आंतरिक परिवर्तन पर केंद्रित है, चमत्कारों की सनसनी पर नहीं। फिल्म की कमजोरी भी यहीं दिखाई देती है। कथा कई स्थानों पर धीमी पड़ती है और पटकथा में वह कसाव नहीं है, जो बड़े परदे पर प्रभाव को और असरदार बना सकता था। लेकिन दर्शकों ने इन कमियों के बावजूद फिल्म को स्वीकार किया, क्योंकि कई बार तकनीकी पूर्णता से अधिक भावनात्मक प्रामाणिकता दर्शक को छूती है।
सिनेमा जब भक्ति की भाषा बोलता है
फिल्म के संगीत ने दर्शक के जुड़ाव को और गहरा किया है। दृष्टिबाधित बुंदेली लोकगायक सुनील लोधी की आवाज में लोक संवेदना फिल्म को महानगरीय कृत्रिमता से बचाती है। यही कारण है कि संगीत केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि दर्शक व कथा के बीच भावनात्मक सेतु बन जाता है। सुनील का भजन ‘मोरे संकट के कटैया’ वायरल होने के बाद उन्हें फिल्म में ‘मैंने तेरे ही भरोसे’ गाने का मौका मिला। इसमें ‘मैंने तेरे ही भरोसे’, ‘जय हनुमान’, ‘राम भजन की ओर’, ‘बजरंग बांका’, ‘परवती’, ‘सियावर रामचंद्र की जय’ और ‘हृदय में जिनके सियाराम’ सहित कुल 11 गीत हैं। लोकधुन, भक्ति और बुंदेलखंडी स्वरों वाला यह संगीत फिल्म को उस दर्शक वर्ग से जोड़ता है, जो पारंपरिक हिंदी फिल्म संगीत की चमक से अधिक भजन और भाव से जुड़ता है।
‘हनुमान अंश’ की सफलता को समझने के लिए 1975 की ‘जय संतोषी मां’ तक लौटना होगा। नगण्य बजट में बनी इस फिल्म ने लगभग 5 करोड़ का कारोबार किया और 50 सप्ताह तक चलकर अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की। उसी साल ‘शोले’ जैसी महागाथा भी आई थी, पर ‘जय संतोषी मां’ ने साबित कर दिया कि दर्शक की आस्था का बाजार किसी स्टार की लोकप्रियता का मोहताज नहीं है। इसी तरह, ‘कार्तिकेय 2’ के हिंदी संस्करण ने 7 लाख रुपये की शुरुआत के बाद 31.05 करोड़ रु. का कारोबार किया, जबकि ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने 3.55 करोड़ रु. की शुरुआत के बाद भारत में कुल 252.90 करोड़ रु. कमाए। ‘जय संतोषी मां’ पर निवेश का रिटर्न 1,650 प्रतिशत था, जबकि ‘हनुमान अंश’ ने 24 दिन में 1,906%, 26वें दिन 2,907% और 28 दिन में 3,644% तक मुनाफा देकर यह रिकॉर्ड तोड़ दिया। तीनों फिल्मों की विषयवस्तु अलग है। ‘जय संतोषी मां’ भक्ति की कथा है, ‘कार्तिकेय 2’ पुराण, रहस्य और रोमांच का मेल है, और ‘द कश्मीर फाइल्स’ विस्थापन और कश्मीर के हिंदू नरसंहार की स्मृति को सामने रखती है। फिर भी इनमें एक साझा सूत्र है। ये फिल्में उस भारत की कथा कहती हैं, जिसकी अपनी स्मृति, आस्था और सांस्कृतिक चेतना है।
दर्शक बदला या सिनेमा?
उत्तर है-शायद दोनों। बाॅलीवुड ने वर्षों तक दर्शक की पसंद को रोमांस, एक्शन, हास्य, सितारा, विदेशी लोकेशन और भारी प्रचार जैसे आसान फार्मूले में बांट। जब डिजिटल माध्यमों ने विकल्प बढ़ाए तो दर्शक के पास चयन की शक्ति और बढ़ गई। अब दर्शकों को थिएटर तक लाने के लिए केवल महंगा चेहरा पर्याप्त नहीं। दर्शक पूछ रहा है, यह फिल्म मुझे क्या देगी? क्या यह मेरे जीवन, स्मृति, विश्वास या पहचान से जुड़ती है? बॉक्स ऑफिस पर ‘हनुमान अंश’ का प्रदर्शन इसी का उत्तर है। फिल्म ने पहले दिन लगभग 10 लाख रु. का कारोबार किया। शुरुआती सप्ताह कमजोर रहा, पर जब दर्शकों ने देखना शुरू किया तो प्रचार दर्शकों ने स्वयं किया। यही ‘वर्ड ऑफ माउथ’ इसकी सबसे बड़ी मार्केटिंग बन गया। ‘बंटवारा 1947’ और ‘आवारापन 2’ जैसी बड़ी फिल्मों के कारण इसे सिनेमाघरों से लगभग हटा दिया गया था। पहले सप्ताह में ही स्क्रीन संख्या 250 से घटकर 25-30 रह गई थी। दर्शकों की मांग पर चौथे सप्ताह में फिल्म 1,200 स्क्रीन पर पहुंच गई। अब 1,500 से अधिक स्क्रीन पर चल रही है।
चौथे सप्ताह में कारोबार में असाधारण उछाल आया और फिल्म 100 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गई। इसने ‘धुरंधर 2’ के चौथे सप्ताह के प्रदर्शन को पीछे छोड़ा। पांचवें शुक्रवार की कमाई ने धुरंधर, छावा, पुष्पा 2 (हिंदी) और धुरंधर 2 के आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया। ‘धुरंधर’ 2026 की सर्वाधिक मुनाफा वाली फिल्म मानी जाती थी। ‘हनुमान अंश’ ने ‘सिंघम’, ‘83’ और ‘टॉक्सिक’ जैसी बड़ी एक्शन फिल्मों को भी पछाड़ा है। यही आधुनिक सिनेमा का सबसे बड़ा परिवर्तन है। विज्ञापन दर्शक को फिल्म तक पहुंचा सकता है, लेकिन दर्शक ही फिल्म को आंदोलन बना सकता है।
ओटीटी ने ठुकराया
‘हनुमान अंश’ की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जिसे बाजार ने शुरुआत में पर्याप्त आकर्षक नहीं समझा, उसे दर्शक ने धीरे-धीरे अपनी फिल्म बना लिया। सीमित शो, कम प्रचार और ओटीटी को लेकर शुरुआती अस्वीकृति जैसी चुनौतियों के बावजूद फिल्म ने लंबी दौड़ लगाई। इस सफलता से यह प्रश्न उठता है कि क्या निर्णय लेने वाली संस्थाएं अभी भी भारत के दर्शक को उसी दृष्टि से देख रही हैं, जिस दृष्टि से वह स्वयं को देखता है? यदि किसी फिल्म में बड़े सितारे नहीं हैं, तो क्या वह स्वतः छोटी फिल्म हो जाती है? यदि विषय आध्यात्मिक है, तो क्या वह आधुनिक दर्शक के लिए अप्रासंगिक हो जाता है? यदि कहानी किसी महानगर के अभिजात जीवन के बजाय किसी संत, आश्रम, गांव या भारतीय परंपरा से आती है, तो क्या वह ‘मुख्यधारा’ नहीं है? ‘हनुमान अंश’ का उत्तर है-नहीं।
सत्ता का हस्तांतरण, बॉलीवुड की बेचैनी
इस सफलता से बॉलीवुड की बेचैनी केवल इसलिए नहीं कि एक छोटी फिल्म ने बड़ी कमाई कर ली। असली चिंता गहरी है। यदि दो करोड़ रुपये की फिल्म दर्शक को थिएटर तक ला सकती है, तो करोड़ों रुपये का प्रचार किसके लिए? यदि बिना सुपरस्टार के फिल्म 100 करोड़ के आसपास पहुंच सकती है, तो स्टार की फीस पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये की क्या उपयोगिता? यदि दर्शक स्वयं फिल्म का प्रचार कर सकता है, तो क्या महंगे विज्ञापन अभियान अनिवार्य हैं? और सबसे बड़ा प्रश्न कि क्या अब निर्माता तय करेंगे कि दर्शक क्या देखेगा, या दर्शक तय करेगा कि निर्माता क्या बनाए?
यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि निर्णय की सत्ता का स्थानांतरण है। अब तक हिंदी सिनेमा में ‘स्टार’ मांग पैदा करता था और फिल्म उस मांग को पूरा करती थी। लेकिन डिजिटल युग और बदलती सामाजिक चेतना में दर्शक स्वयं मांग पैदा कर रहा है।
इस बदलाव को मात्र ‘धार्मिक फिल्मों का उभार’ कहना भूल होगी। भारत में एक व्यापक सांस्कृतिक बाजार आकार ले रहा है, जहां इतिहास, धर्म, अध्यात्म, लोकपरंपरा, सभ्यता, राष्ट्रीय स्मृति, भारतीय दृष्टि कथानक के केंद्र में हो सकते हैं। ‘कार्तिकेय 2’ में श्रीकृष्ण और द्वारका की स्मृति है, ‘द कश्मीर फाइल्स’ में इतिहास की दबाई गई स्मृति का प्रश्न है, और ‘हनुमान अंश’ में संत परंपरा, हनुमान भक्ति और सेवा का दर्शन है। ‘जय संतोषी मां’ ने आधी सदी पहले दिखा दिया था कि भारतीय समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना को बाजार में कम करके आंकना कितना महंगा पड़ सकता है। इसलिए उभरता बाजार केवल ‘भक्ति’ नहीं, बल्कि भारतीयता की कथाओं का है।
स्टारडम नहीं, एकाधिकार का अंत
‘हनुमान अंश’ की सफलता का अर्थ यह नहीं कि बड़े सितारे अप्रासंगिक हो गए। अच्छे अभिनेता और बड़े सितारे आगे भी दर्शकों को आकर्षित करेंगे। परंतु अब स्टारडम अकेला टिकट नहीं बेच सकता। सितारा कहानी का, बजट संवेदना का और प्रचार प्रामाणिकता का विकल्प नहीं हो सकता। दर्शक अब केवल यह नहीं देखना चाहता कि पर्दे पर कौन है, बल्कि यह भी देखना चाहता है कि पर्दे पर क्या कहा जा रहा है। भारत के पास हजारों वर्षों की कथाएं हैं। राम, कृष्ण, शिव, हनुमान और देवी परंपरा से लेकर संतों, लोकदेवताओं, स्वतंत्रता आंदोलन के अनकहे अध्यायों, चोलों, मराठों, अहोमों, राजपूतों, विजयनगर, कश्मीर, पूर्वोत्तर और असंख्य लोककथाओं तक कहानी का भंडार असीम है। समस्या कहानी की कमी नहीं, बल्कि यह थी कि कहानी सुनाने वालों ने अपने ही घर की ओर देखना बंद कर दिया था।
‘हनुमान अंश’ उस बंद दरवाजे पर दस्तक है। अगर यह दस्तक आने वाले वर्षों में एक नई सिनेमाई धारा में बदलती है, तो बॉलीवुड को समझना होगा कि भारत का दर्शक केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अपनी पहचान का प्रतिबिंब भी चाहता है। संकेत साफ है, स्टार, तमाशा और प्रचार बिक सकता है, लेकिन अंततः वही कहानी टिकती है, जिसमें दर्शक को अपना भारत दिखाई देता है।
















