‘अमेरिका में संघ को विरोध से अधिक समर्थन मिला’
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सुशासन संवाद : ओडिशा की उड़ान 2.0 : ‘अमेरिका में संघ को विरोध से अधिक समर्थन मिला’

भुवनेश्वर में आयोजित ‘सुशासन संवाद : ओडिशा की उड़ान 2.0’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी से पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके संपादित अंश

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Sep 11, 2026, 01:34 pm IST
inसंघ @100, ओडिशा, साक्षात्कार, पाञ्चजन्य इवेंट
ओडिशा की उड़ान 2.0’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी से बातचीत करते पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर

भुवनेश्वर में आयोजित ‘सुशासन संवाद : ओडिशा की उड़ान 2.0’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी से पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके संपादित अंश

सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के अमेरिका प्रवास के दौरान कुछ लोगों और संगठनों ने संघ के विषय में विवाद और व्यवधान पैदा करने की कोशिश की। आप इसे किस रूप में देखते हैं?
सरसंघचालक जी पहली बार विदेश प्रवास पर नहीं गए। इससे पहले भी संघ के अधिकारी विदेश जाते रहे हैं। हमारे स्वयंसेवक दुनिया भर में हैं। वे लोग संगठन और समाज का कार्य करते हैं। उनकी आवश्यकता और इच्छानुसार संघ के अधिकारी उनके पास जाकर उनका मार्गदर्शन करते हैं। कुछ नए विषयों पर भी विमर्श करते हैं। प्रवास की यह परंपरा बहुत पुरानी है। इससे पहले रज्जू भैया जी और सुदर्शन जी ने भी विदेश प्रवास किया था।
देश में तो संघ के विस्तार, प्रचार, प्रसार और प्रभाव पर चर्चा होती रहती है। पर दुनिया में भी इस विषय पर चर्चा होनी चाहिए। आज भी विश्व भर के लोग संघ के बारे में जानना चाहते हैं। वे भारत को समझना चाहते हैं। मैं मानता हूं कि अमेरिका में संघ और सरसंघचालक जी का विरोध से ज्यादा समर्थन हुआ है। वहां बड़ी संख्या में लोग सरसंघचालक जी को सुनने के लिए आए। वहां संघ के प्रति लोगों में उत्सुकता और जिज्ञासा ज्यादा है। वे लोग संघ का स्वागत कर रहे हैं। सरसंघचालक जी के कार्यक्रम के दौरान अमेरिका में 6,000 और कनाडा में 2,000 लोग उपस्थित हुए। संघ विरोधियों की अपनी भूमिका है। उन्होंने अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए ऐसा किया। ऐसा तो कहीं भी दिखाई नहीं दिया कि उनके समाज में उनकी कोई विशेष शक्ति या समर्थन है।

सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी और सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत जी की विदेश यात्राएं किस तरह एक-दूसरे की पूरक हैं?
सरकार्यवाह जी और सरसंघचालक जी, दोनों की यात्रा का निमित्त संघ का शताब्दी वर्ष रहा है। उनकी इस यात्रा का उद्देश्य वहां कार्यकर्ताओं के काम को देखना और बौद्धिक वर्ग के साथ आवश्यक संवाद करना है। विदेश में संघ के स्वयंसेवक बहुत तैयारी करते हैं। उनकी इच्छा होती है कि उनके पास संघ के बड़े अधिकारी आएं। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता है। एक मायने में यह प्रवास पूरक कहा जा सकता है। यह परंपरा पहले से चली आ रही है। यह कोई नई बात नहीं है। संघ के अनेक अधिकारी समय-समय पर विदेश प्रवास के लिए जाते रहते हैं। वहां की आवश्यकता, अपेक्षा और आमंत्रण के अनुसार संघ के अधिकारियों के प्रवास की रचना और योजना बनती है। संघ शताब्दी वर्ष के परिप्रेक्ष्य में विश्व संघ को, भारत को और हिंदुत्व को बेहतर ढंग से जान सके। इसी क्रम में सरसंघचालक जी का विदेश प्रवास हुआ।

काम से ही संघ की पहचान बनी है। ऐसे में क्या संघ अपनी छवि और धारणा को लेकर भी जागरूक हुआ है?
संघ की पहचान कार्य से ही है। संघ की पहचान छवि या धारणा से नहीं बनी है। संघ के स्वयंसेवक ही इसकी पहचान हैं। हमारे स्वयंसेवक धरातल पर काम करते हैं। समाज में संघ को जानने की उत्सुकता बहुत बढ़ी है। समाज को संघ से बहुत अपेक्षाएं हैं, इसलिए छवि निर्माण के लिए कभी-कभी इस तरह के कार्यक्रम और यात्राएं करनी पड़ती हैं। इसके लिए संघ बहुत प्रयत्नशील नहीं है, बल्कि यह समाज की अपेक्षा है। बीते समय में देश के चार बड़े महानगरों-दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और बेंगलुरु-में विशेष व्याख्यान सरसंघचालक ने दिया था। उस दौरान संघ को जानने और समझने के इच्छुक लोग बहुत बड़ी संख्या में आए। ये कार्यक्रम समाज के लिए हैं, स्वयंसेवकों के लिए नहीं हैं। संघ को तो स्वयंसेवक जानता है।

मोहिते के बाड़े से लेकर संघ की 100 वर्ष की यात्रा को आप आज के परिदृश्य में किस रूप में देखते हैं?
संघ की 100 साल की यात्रा विचार की यात्रा, व्यवहार की यात्रा और विश्वास की यात्रा है। यह एक विकास की भी यात्रा है। पूजनीय डॉक्टर साहब ने जो बीज डाला था, वह विषय बीज रूप में उस समय से है। उस समय की घटनाएं और प्रसंग, जो इस समय दिखाई देते हैं, वे विचार और आदर्श आज भी प्रासंगिक हैं। संघ ने 100 साल की अपनी यात्रा में महत्वपूर्ण काम-व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में किया है। संघ ने व्यक्ति निर्माण के कार्य को प्राथमिकता से किया है। लेकिन इसे समाज ने देर से समझा। प्रारंभिक काल में लोगों को संदेह था कि क्या हिंदुत्व के नाम पर संगठन भी हो सकता है? क्या संगठन आवश्यक है? आदि-आदि। पूज्य डॉक्टर साहब का विश्वास था कि संगठन एक शक्ति है और संगठन के माध्यम से काम करने के लिए स्वयंसेवकों का निर्माण करना आवश्यक है। उन्होंने बहुत हिम्मत से काम शुरू किया। उसका परिणाम आज हम देख रहे हैं। बड़ी लंबी यात्रा रही है।
विचार से कोई स्वयंसेवक खड़ा होता है। देशहित और समाजहित में काम करने के लिए स्वयंसेवकों ने अपने आप विषय ढूंढे। व्यक्ति का संग्रह हो गया तो उसके उपयोग के लिए माध्यम तलाशने का काम किया। संघ के 100 साल की यात्रा में गुणवान स्वयंसेवक खड़ा हो गया। उन्हें अनुशासन, प्रामाणिकता, देशभक्ति, सामूहिकता और प्रतिकूल परिस्थिति में भी अडिग रहना-ये गुण संघ स्थान से मिले हैं। इस कारण उन्हें जहां भी संभावना मिली, वहां उन्होंने अपना काम शुरू किया।

युवाओं तक पहुंचने और उनसे संवाद करने की जरूरत को संघ किस रूप में देखता है?
संघ का काम हम जानते हैं कि संघ स्थान पर बहुत से युवा आते हैं। पर संघ स्थान पर जो युवा नहीं आते हैं, वे भी उतने ही राष्ट्रभक्त दिखाई देते हैं। उनके सामने जानकारी और दिशा रखें, ताकि वे भविष्य के संकल्प को रख सकें। पूरे देश में महाविद्यालय, विश्वविद्यालय या कैंपस के भीतर या बाहर रहने वाले विद्यार्थी इस प्रकार के आयोजनों में शामिल होते हैं। इस प्रकार के कार्यक्रमों के माध्यम से लाखों युवाओं तक हम पहुंचने का प्रयास करेंगे। हमारा इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। इसकी जानकारी युवाओं को होनी चाहिए। वर्तमान की कुछ समस्याओं को युवाओं को कैसे देखना चाहिए, यह भी उनके सामने रखा जा रहा है। भविष्य के अच्छे स्वप्न कैसे देखने हैं-भूतकाल का गौरव, वर्तमान की पीड़ा और भविष्य सुनहरा हो-संघ ने इसी संकल्पना को लेकर युवा पीढ़ी को संवारने की कोशिश की है। आज का युवा कुछ नया, कुछ अच्छा, देशहित में, जागृति के लिए कुछ करना चाहता है। अपने समाज के अंतिम जन तक पहुंचना चाहता है। पर्यावरण के लिए कुछ करना चाहता है। अनेक प्रकार के विषय हैं, जिन पर काम करने का जज्बा युवा पीढ़ी में दिखाई दे रहा है। हमारा विश्वास है कि देश का युवा ऊर्जावान है।

ओडिशा के सांस्कृतिक और जनजातीय पक्ष के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्मिता के प्रश्न को आप किस रूप में देखते हैं?
ओडिशा की लंबी समुद्री सीमा रेखा है। राष्ट्रीय महत्व के चांदीपुर, पारादीप, गोपालपुर, कटक, सभी समुद्र रेखा से जुड़े हुए हैं। ‘डिजिटल फेंसिंग’ तो कर सकते हैं, पर ‘सोशल फेंसिंग’ कैसे किया जाए? यह काम समाज को करना होगा। समाज को जोड़ना, समुद्र तट की संवेदनशीलता के प्रति लोगों को जागरूक करना-सरकार ने ‘अपग्रेड’ किया है। मरीन पुलिस स्टेशन, बंदरगाह, ड्रोन-आज की परिस्थिति में लोगों को सजग करना जरूरी है। द्वीप, दलदल क्षेत्र के प्रति लोगों को सजग किया जा रहा है। समुद्री सीमा में रहने वाले लोगों की भावना, आवश्यकता और अस्मिता के प्रति सरकार और समाज को मिलकर काम करने की आवश्यकता है। इसके लिए गति को बढ़ाना होगा।

Topics: वैश्विक समर्थनपाञ्चजन्य विशेषसंघ शताब्दी वर्षसंघ का विस्तारसंघ विरोधीसरसंघचालकमोहिते का बाड़ाश्री मोहनराव भागवतअमेरिका प्रवासविदेश प्रवासराष्ट्र निर्माण‘व्यक्ति निर्माण’
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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