नागपुर के रेशिमबाग में श्री विजयादशमी उत्सव पर सरंसघचालक श्री मोहन भागवत जी ने उद्बोधन दिया। उन्होंने संघ, संविधान, हिंदू, भारत तथा अन्य विषयों पर बात की। तुष्टिकरण पर भी विचार रखा। उनके उद्भोधन की प्रमुख बातें
संघ की विचारधारा उनके तुष्टिकरण के एजेंडे से मेल नहीं खाती
इस पवित्र विचारधारा को आजादी के बाद राजनीतिक वर्ग के एक हिस्से ने स्वीकार नहीं किया, क्योंकि संघ की विचारधारा उनके तुष्टीकरण के एजेंडे से मेल नहीं खाती थी।
तमाम चुनौतियों के बावजूद संघ अपने मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ता रहा।
देश के गणतंत्र बनने के बाद, संघ के कार्यों और विचारों से प्रभावित होकर विशुद्ध भारतीयता में विश्वास रखने वाले अनेक नेताओं ने जनसंघ की स्थापना की। बाद में यही जनसंघ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। आज इस पार्टी के अनेक शीर्ष नेताओं को राजनीति में राष्ट्रीयता का बोध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ही मिला है। इसमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि इस पार्टी की सफलता के पीछे संघ की दृढ़ वैचारिकता और उसकी संगठन शक्ति है।
संविधान में जहां हम भारत के लोग लिखा है, वह स्वबोध के भाव को परिलक्षित करता है।
सम्पूर्ण विश्व कुटुम्ब है
भारत विविधताओं से भरा देश है। प्रकृति, वेश भूषा, खान पान, भाषा में विविधता है। इन विविधताओं में एकता देखने का भाव हमें परम्परा से मिला है। सम्पूर्ण विश्व को कुटुम्ब मानकर चलना हमारी परम्परागत विशिष्टता है।
सभी विविधताओं का सम्मान हमारी परंपरा
सभी विविधताओं का सम्मान परम्परा से हमारा विचार है। समाज में यह लचीलापन भी हमारी सनातन परम्परा की देन है। विविधता मे बदल संभव, लेकिन एकत्व का भाव लेकर चले, यही सनातन दृष्टि है। जब तक हम इसे याद रखते रहे, तब कमजोर होते गए। वह अपनापन का भाव कमजोर हुआ तो हम पराजित होते गए।
हमने समानता के अपने उच्च आचरण को त्यागा तो हमारी दुर्गति हुई। भारत की राष्ट्रीय ऐकत्व का भाव जब तक प्रबल रहा, हम विश्व में सम्मान प्राप्त करते रहे। जब इसका विस्मरण हुआ हमारी दुर्गति हुई।
सही विचार पहुंचाने की दृष्टि
भारत, हिन्दू और संघ इस बारे में विश्व भर में सही विचार को पहुंचाने की दृष्टि से हमने संघ के शताब्दी वर्ष में प्रयास किया। विश्वभर में भारत, हिंदुत्व और संघ इन विषयो में स्पष्टता आये इसलिये योजना की गयी।
युवाओं का प्रतिभाग
संघ के शताब्दी वर्ष में हुआ युवा सम्मेलनों में 39 लाख से ज्यादा युवाओं ने प्रतिभागिता की
संतों का स्मरण
यह वर्ष संत शिरोमणि रविदास जी का 650वां वर्ष चल रहा है। जब अपना देश अत्याचारी विदेशी शासकों से पीड़ित था, ऐसे समय में संत रविदास जी ने स्वधर्मनिष्ठा, सामाजिक समरसता और भक्ति का प्रचार किया। आर्य समाज के संन्यासी स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान के भी 100 वर्ष पूरे हुए हैं। इसी के साथ ओडिशा के स्वामी लक्ष्मणानंद जी महाराज की जन्मशताब्दी भी चल रही है। महात्मा फुले जी का 200वाँ वर्ष भी पिछले 11 अप्रैल से शुरू हुआ है। ऐसे ही आत्मबोध को जगाने वाले बंगाल के श्री श्रीमद राज जी बसु, जिन्होंने अपने समाज के संगठन की परिकल्पना की थी, उनका भी 200वां वर्ष चल रहा है। इनका स्मरण करना इसलिए भी समीचीन है कि संघ का जो कार्य 100 वर्षों से चल रहा है, वह इसी स्व को जगाने का काम है।














