अंग्रेजों के दौर में गणेश चतुर्थी कैसे बनी आजादी की आवाज, जानिए पूरी कहानी?
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अंग्रेजों के दौर में गणेश चतुर्थी कैसे बनी आजादी की आवाज, जानिए पूरी कहानी?

गणेश चतुर्थी की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में आया। उस समय भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। देश में स्वतंत्रता की भावना धीरे-धीरे मजबूत हो रही थी, लेकिन आम लोगों के लिए एक साथ बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर राजनीतिक चर्चा करना आसान नहीं था।

Written byMahak SinghMahak Singh
Sep 7, 2026, 03:04 pm IST
inधर्म-संस्कृति

भारत में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते। इनके साथ लोगों की भावनाएं, आस्था, परंपराएं और यादें जुड़ी होती हैं। गणेश चतुर्थी भी ऐसा ही पर्व है। भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली गणेश चतुर्थी आज पूरे देश में धूमधाम से मनाई जाती है। कहीं गणपति घरों में विराजते हैं तो कहीं बड़े-बड़े पंडाल सजते हैं। कई जगहों पर दस दिनों तक पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं और अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

लेकिन गणेश चतुर्थी का इतिहास केवल आज दिखाई देने वाले भव्य पंडालों तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें बहुत पुरानी धार्मिक परंपराओं में हैं। समय के साथ यह पर्व कई पड़ावों से गुजरा और फिर एक ऐसे दौर में पहुंचा, जब यह धार्मिक आयोजन से आगे बढ़कर सामाजिक एकता और जनजागरण का माध्यम बन गया।

भगवान गणेश की पूजा की परंपरा कितनी पुरानी है?

भगवान गणेश को हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य माना जाता है। किसी भी शुभ काम की शुरुआत गणेश जी की पूजा से करने की परंपरा रही है। उन्हें बुद्धि, विवेक, समृद्धि और शुभता का देवता माना जाता है। गणेश जी का स्वरूप भी अपने आप में विशेष है- हाथी का सिर, बड़ा पेट, एक दांत और हाथों में अलग-अलग वस्तुएं। उनका यह रूप कई प्रतीकों से जुड़ा हुआ माना जाता है। गणेश पूजा की परंपरा प्राचीन है और इससे जुड़े उल्लेख अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में मिलते हैं। हालांकि आज जिस रूप में गणेश चतुर्थी को एक निश्चित पर्व और उत्सव के तौर पर मनाया जाता है, उसका विकास धीरे-धीरे हुआ। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। इसी वजह से इस दिन गणेश जी की स्थापना कर उनकी पूजा की जाती है। भक्त उन्हें घर लाते हैं, उनकी प्रतिमा को सजाते हैं, पूजा करते हैं और मोदक समेत कई तरह के भोग लगाते हैं।

गणेश चतुर्थी कब से मनाई जा रही है?

गणेश पूजा की परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन गणेश चतुर्थी को एक व्यवस्थित धार्मिक पर्व के रूप में मनाने की परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर विकसित हुई। इतिहास में यह माना जाता है कि महाराष्ट्र और पश्चिमी भारत में गणेश पूजा को विशेष महत्व मिला। मराठा काल में भी गणेश उत्सव और गणेश पूजा का सामाजिक महत्व दिखाई देता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के समय महाराष्ट्र में धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को बढ़ावा मिला। उनके गुरु समर्थ रामदास की परंपरा में भी गणेश आराधना का विशेष स्थान था। हालांकि उस समय गणेश उत्सव आज की तरह विशाल सार्वजनिक आयोजन नहीं था। पूजा मुख्य रूप से परिवारों, मंदिरों और स्थानीय स्तर पर होती थी। धीरे-धीरे लोगों के बीच गणपति उत्सव की लोकप्रियता बढ़ती गई।

घरों से निकलकर सार्वजनिक उत्सव तक कैसे पहुंचा गणपति उत्सव?

गणेश चतुर्थी की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में आया। उस समय भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। देश में स्वतंत्रता की भावना धीरे-धीरे मजबूत हो रही थी, लेकिन आम लोगों के लिए एक साथ बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर राजनीतिक चर्चा करना आसान नहीं था। यहीं से एक विचार सामने आया- क्यों न किसी धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन को ऐसा माध्यम बनाया जाए, जिसके जरिए समाज के अलग-अलग वर्ग के लोग एक साथ आ सकें? इस विचार को सबसे प्रभावशाली रूप देने वालों में प्रमुख नाम था बाल गंगाधर तिलक, जिन्हें लोग लोकमान्य तिलक के नाम से जानते हैं।

लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव को दिया नया रूप

1890 के दशक में लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव को बड़े स्तर पर सार्वजनिक रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1893 के आसपास उन्होंने सार्वजनिक गणेश उत्सव को लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया।  भगवान गणेश समाज के बड़े हिस्से की आस्था से जुड़े हुए हैं। ऐसे में गणेश उत्सव के जरिए लोगों को एक जगह लाया जा सकता था। उस समय गणेश की सार्वजनिक स्थापना, पूजा, भजन, कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे। धीरे-धीरे यह आयोजन मोहल्लों और सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच गया। तिलक का उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन करना नहीं था। वे चाहते थे कि लोग आपस में जुड़ें, समाज में एकता की भावना मजबूत हो और भारतीयों में अपने देश और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़े।

एक त्योहार बना जनजागरण का माध्यम

उस दौर में सार्वजनिक गणेश उत्सव ने समाज को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अलग-अलग समुदायों और सामाजिक वर्गों के लोग उत्सव में शामिल होने लगे। पूजा के साथ-साथ देश, समाज, शिक्षा और संस्कृति से जुड़े विषयों पर चर्चा होने लगी। गणेश पंडाल केवल पूजा की जगह नहीं रहे। वे लोगों के मिलने-जुलने और विचार साझा करने के केंद्र बनने लगे। यही गणेश चतुर्थी की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। एक ऐसा पर्व, जिसकी शुरुआत धार्मिक आस्था और भगवान गणेश की पूजा से जुड़ी थी, समय के साथ सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम भी बन गया।

महाराष्ट्र से देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा उत्सव

सार्वजनिक गणेश उत्सव को महाराष्ट्र में सबसे अधिक लोकप्रियता मिली। मुंबई, पुणे और आसपास के क्षेत्रों में बड़े स्तर पर गणपति की स्थापना होने लगी। इसके बाद धीरे-धीरे यह परंपरा देश के अन्य हिस्सों तक भी पहुंची। आज महाराष्ट्र के अलावा कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, गोवा, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और देश के कई अन्य राज्यों में गणेश चतुर्थी अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। समय के साथ उत्सव का स्वरूप भी बदलता गया। पहले जहां मिट्टी की छोटी प्रतिमाओं के साथ पूजा होती थी, वहीं बाद में विशाल प्रतिमाएं और बड़े पंडाल दिखाई देने लगे। रोशनी, सजावट, सांस्कृतिक कार्यक्रम और भव्य विसर्जन यात्राएं इस पर्व का हिस्सा बन गईं।

गणपति स्थापना से विसर्जन तक की परंपरा

गणेश चतुर्थी के दिन भक्त भगवान गणेश की प्रतिमा को घर या पंडाल में स्थापित करते हैं। इसके बाद कई दिनों तक पूजा-अर्चना की जाती है लोग आरती करते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं और परिवार के साथ भगवान गणेश का आशीर्वाद लेते हैं। कई स्थानों पर डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन या दस दिन तक गणपति की पूजा की जाती है। दसवें दिन अनंत चतुर्दशी के अवसर पर गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन के समय ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारों से वातावरण गूंज उठता है। भक्त भावुक होकर विदाई देते हैं और अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हैं। इस परंपरा में एक गहरा भाव छिपा है। श्रद्धालु विश्वास रखते हैं कि भगवान गणेश अपने साथ दुख और परेशानियां ले जाते हैं और अपने भक्तों के जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद छोड़ जाते हैं।

आस्था से एकता तक की कहानी

गणेश चतुर्थी की यात्रा वास्तव में भारत की बदलती सामाजिक तस्वीर की कहानी भी है। प्राचीन धार्मिक परंपरा से शुरू होकर यह पर्व परिवारों और मंदिरों तक पहुंचा, फिर सार्वजनिक उत्सव बना और स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में सामाजिक जागरूकता का माध्यम भी बना।

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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