क्या एक साधारण सोशल मीडिया पोस्ट के चलते जेल हो सकती है, वह भी केवल अपने देश की नागरिकता की बात करने पर? मगर यह हो रहा है उस ब्रिटेन में, जहां ग्रूमिंग गैंग के आरोपियों को महीनों तक गिरफ्तार भी नहीं किया गया था।
यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि अगर ग्रूमिंग गैंग के आरोपियों को सजा नहीं मिली, या समय पर गिरफ्तार नहीं किया गया तो फिर वे कौन लोग हैं, जिनकी इतनी संख्या में गिरफ्तारी पिछले पांच साल में हुई है? बिग ब्रदर नामक कैम्पेन समूह ने एक रिपोर्ट बनाई है, जो प्रकाशित होने वाली है। उसके अनुसार यूके में पिछले पांच साल में ऐसे लोगों को भी हिरासत में लिया गया है, जिन्होंने सही न समझे जाने वाले टिकटॉक वीडियो को महज देखा ही है।
अभियान चलाने वालों ने कहा कि कुल 62,159 लोगों को हिरासत में लिया गया है। डेली मेल के अनुसार अभियान चलाने वालों ने कहा कि कुछ तो मामले सही है, जैसे कि घरेलू हिंसा के मामले में शोषण करने वाले साथियों के धमकी भरे संदेशों को रोकने के लिए कदम उठाना, मगर कानून के दायरे को जिस तरह से बढ़ा दिया गया है, उसमें दैनिक जीवन के संवाद भी शामिल हो गए हैं। इनमें से 18,510 लोगों पर औपचारिक मामला दर्ज हुआ और 12,292 लोगों को कोर्ट द्वारा दोषी पाया गया।
कुछ चर्चित मामले
इस रिपोर्ट में उस मामले का विशेष उल्लेख है, जिसमें वेस्ट मिडलैंड की पुलिस एक किशोरी के घर पर एक टिकटॉक वीडियो लेकर पहुंच गई थी। इस वीडियो में उसने अपनी एक टीचर की तस्वीर पर कुछ नकारात्मक टिप्पणी कर दी थी। पिछले वर्ष एक दम्पति को महज इसलिए गिरफ्तार किया गया था, क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी के प्राइमरी स्कूल के विषय में एक व्हाट्सएप ग्रुप चैट में कुछ शिकायत कर दी थी। उन्हें 11 घंटे तक पुलिस स्टेशन में पूछताछ के लिए रखा गया था। हालांकि उन्हें बाद में जनता के असंतोष के चलते £20000 की क्षतिपूर्ति दी गई थी।
मजाक पर भी लोगों को हिरासत में ले लिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट ने अभिव्यक्ति की सहज स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया है। लूसी कोनोली का मामला सबसे अधिक चर्चित था। उन्होंने जुलाई 2024 में साउथपोर्ट हत्याओं के चलते शरणार्थियों के शिविरों में आग लगाने को लेकर पोस्ट किया था। हालांकि उसे बाद में डिलीट कर दिया गया था, फिर भी इस पोस्ट के लिए उन्हें 31 महीने की सजा मिली थी। इस अभियान को चलाने वालों का कहना है कि लोगों को महज चुटकुले कहने पर ही सजा मिल रही है, या फिर खाली कागज हिलाने पर भी, और पुलिस द्वारा “online thinking classes” लेने का अनुरोध किया जा रहा है।
पुलिस बताएगी कि क्या और कैसे सोचा जाए?
फ्री स्पीच यूनियन के डायरेक्टर टोबी यंग ने कहा कि हमारे ट्वीट्स की बजाय सड़कों को देखें। इस रिपोर्ट के आने के बाद लोगों में गुस्सा है और लोग कह रहे हैं कि हमारे पोस्ट्स और ट्वीट्स पर निगरानी के स्थान पर सरकार सड़कों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
टोबी यंग का कहना है कि यूके संसदीय लोकतंत्र की जन्मस्थली है और वहीं पर फ्री स्पीच पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। उनका कहना है कि सरकार सड़कों पर निगरानी करने के स्थान पर हमारे ट्वीट्स या पोस्ट्स पर इतना ध्यान क्यों दे रही है? देश में मोबाइल चोरी, झपटमारी, दुकानों से चोरी और यौन उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, मगर उन्हें लेकर इतनी जागरूकता नहीं है, बल्कि पुलिस का सारा जुनून ‘वैचारिक अपराधियों’ को पकड़ने को लेकर है।
बिग ब्रदर वाच की रिपोर्ट के अनुसार कुछ पुलिस बलों ने अपने पड़ोसियों की तुलना में 14 गुना तक इन मामलों में गिरफ्तारियां की हैं। इसके अनुसार यह सारी समस्या नई पीढ़ी के कुछ कॉन्स्टेबल्स के चलते शुरू हुई है। लाल ईंटों के सामाजिक विज्ञानों के विभागों से निकले हुए ये लोग यह सोचते हैं कि पुलिस की भूमिका कुछ निर्धारित समूहों को घृणा से बचाने के लिए सर्विस करनी है।
उनका मानना है कि सोशल मीडिया पर छोटी नावों में भरकर आने वाले शरणार्थियों की संख्या के विषय में या फिर प्राइड मार्च में आधे नंगे लोगों की आलोचना में की गई पोस्ट या फिर प्रिय स्थानीय पब के मस्जिद में बदलने को लेकर की गई शिकायती पोस्ट्स एक समुदाय को लेकर तनाव पैदा कर सकती हैं। अगर इन्हें ऐसे ही छोड़ दिया गया तो इससे सामुदायिक तनाव पैदा हो सकता है।
वे यह भी मानते हैं कि एक्स, यूट्यूब, और फेसबुक सामाजिक व्यवस्था के लिए बहुत बड़ा खतरा है। ट्रांस एक्टिविस्ट लोगों के खिलाफ पोस्ट किए जाने पर गिरफ्तार करना बहुत आम है। यह बहुत हास्यास्पद है कि इन अधिकारियों के अनुसार इनके मल्टी एथिनिक और मल्टी कल्चरल समाज में सब कुछ बहुत शांतिपूर्ण और बढ़िया चल रहा होता। अगर यह “उपद्रवी” एलन मस्क बीच में न आता! साथ ही इनका यह मानना है कि जनता में अवैध अप्रवासन, टू टायर जस्टिस सिस्टम और समाज के इस्लामीकरण को लेकर जो भारी असंतोष बढ़ रहा है, उसका समाधान यह बिल्कुल नहीं है कि उनकी नीतियों को सुधारा जाए या जनता के सवालों का जबाव दिया जाए, बल्कि लोगों का इन समस्याओं पर सोशल मीडिया पर लिखवाना बंद कराया जाए। अपनी व्यवस्थागत विफलताओं को छिपाकर केवल जनता की अभिव्यक्ति पर रोक लगाई जा रही है।

















