कांग्रेस की राजनीति में इन दिनों विरोध केवल नीतियों का नहीं रह गया है। वह अब उन प्रतीकों तक पहुंच गया है, जो भारत की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक स्मृति और लोकतांत्रिक मर्यादा के प्रतिनिधि हैं। ‘वंदे मातरम्’ के पूरे गायन पर खीझ, 15 अगस्त के राष्ट्रीय समारोह से दूरी, संविधान और संवैधानिक संस्थाओं की दुहाई देते हुए राष्ट्रीय मर्यादाओं की उपेक्षा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति लगातार व्यक्तिगत स्तर की कटुता-इन सबको एक साथ देखें तो कांग्रेस का विरोधाभास साफ दिखाई देता है। प्रश्न केवल इतना नहीं कि कांग्रेस क्या कह रही है, प्रश्न यह है कि वह भारत के बारे में भीतर से क्या सोचती है?
दोहरा चरित्र
कांग्रेस स्वयं को संविधान की सबसे बड़ी रक्षक बताती है। संसद से लेकर सड़क तक वह लोकतंत्र, संविधान और संवैधानिक संस्थाओं की दुहाई देती है। लेकिन संविधान की आत्मा केवल सत्ता का विरोध करने में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं और राष्ट्रीय संस्थाओं के सम्मान में भी है। राष्ट्रीय पर्व किसी राजनीतिक दल के शक्ति-प्रदर्शन का अवसर नहीं होते। वे पूरे राष्ट्र के उत्सव होते हैं।
ऐसे में 15 अगस्त के राष्ट्रीय समारोह से नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की दूरी स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़े करती है। कांग्रेस की ओर से इसे प्रोटोकॉल और बैठने की व्यवस्था से जोड़कर सफाई दी गई। मान भी लें कि कांग्रेस को प्रोटोकॉल को लेकर आपत्ति थी, तो क्या राष्ट्रीय पर्व का बहिष्कार उस असहमति का उचित लोकतांत्रिक उत्तर है? क्या एक कुर्सी की दूरी राष्ट्र के प्रति दायित्व से बड़ी हो सकती है?

असहजता क्यों?
संसद के मौजूदा सत्र में ‘राष्ट्रगान’ के समकक्ष कानूनी दर्जा पा चुके राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन पर कांग्रेस मुख्यालय में ध्वजारोहण समारोह के दौरान जो हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है। ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो छंदों तक सब सहज दिखाई दिए, लेकिन आगे के छंद शुरू होते ही राहुल गांधी और सोनिया गांधी की भाव-भंगिमाएं बदलने लगीं। राष्ट्रगीत के दौरान कांग्रेस के शीर्ष नेता एक-दूसरे से बात करते दिखे। सोनिया किसी को हाथ के संकेत कर जैसे कुछ रोकने को कह रही थीं। बता दें कि इसी छंद में देवी की गौरवगाथा का उल्लेख है। सनातन के सांस्कृतिक वैभव का गुणगान है। कांग्रेस नेताओं की ओर से अलग-अलग सफाई आई। जयराम रमेश ने कहा कि मल्लिकार्जुन खरगे वृद्ध हैं। वह काफी समय से खड़े थे। उन्हें कष्ट हो रहा था। यह देखकर मैडम (सोनिया) ने उनके लिए कुर्सी मंगवाने के लिए संकेत किया था ताकि खरगे जी आराम से बैठ जाएं। चलो मान लेते हैं, पर कुर्सी तो इसके बाद भी नहीं दिखी। खरगे की तरह मूल प्रश्न भी वहीं खड़ा रहा-पूरे ‘वंदे मातरम्’ से आखिर इतनी परेशानी क्यों? यह वही ‘वंदे मातरम्’ है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान करोड़ों भारतीयों में राष्ट्रभाव जगाया। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष कर रहे भारत को मातृभूमि के प्रति समर्पण की अनुभूति दी। आज उसी गीत के आगे के छंदों को लेकर असहजता दिखाई देती है तो यह केवल एक गीत का विवाद नहीं रह जाता। यह उस सांस्कृतिक दृष्टि का प्रश्न बन जाता है, जो भारत को केवल भूगोल मानती है या उसे मातृभूमि के साथ-साथ एक जीवंत सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में भी स्वीकार करती है।
तुष्टीकरण की राजनीति
‘वंदे मातरम्’ पर कांग्रेस की वर्तमान असहजता को उसके इतिहास से अलग करके नहीं देखा जा सकता। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी कांग्रेस के भीतर इसके पूरे गायन को लेकर विवाद हुए। मुस्लिम लीग की आपत्तियों के बीच अंततः कांग्रेस के मंचों पर इसके शुरुआती दो छंदों तक सीमित करने की परंपरा बनी। यानी जिस गीत ने भारत की स्वतंत्रता चेतना को स्वर दिया, उसे भी कांग्रेस की राजनीति ने समय-समय पर राजनीतिक समीकरणों की कसौटी पर कसने का प्रयास किया। 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में मौलाना मोहम्मद अली ने पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर के पूरे ‘वंदे मातरम्’ गायन पर आपत्ति जताई। विवाद वर्षों चला और 1937 में कांग्रेस ने शुरुआती दो छंदों तक सीमित करने की परंपरा स्वीकार कर ली। इतिहास गवाह है-तुष्टीकरण के लिए ‘वंदे मातरम्’ से समझौता कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक आदत रही है। यहां महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है-क्या राजनीतिक सुविधा के लिए राष्ट्र की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को सीमित करना ही कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की कसौटी थी? और यदि ऐसा था, तो क्या आज की कांग्रेस उसी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रही है?
विचारहीन विरोध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राजनीतिक असहमति लोकतंत्र में पूरी तरह स्वाभाविक है। लेकिन कांग्रेस का संकट यह है कि वह अनेक बार नीतिगत विरोध की सीमा पार करके व्यक्तिगत विरोध तक पहुंचती दिखाई देती है। प्रधानमंत्री पर तीखी राजनीतिक आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन व्यक्तिगत कटाक्ष, अपमानजनक टिप्पणियां और परिवार तक पहुंचती राजनीतिक भाषा विपक्ष की गरिमा को ही नुकसान पहुंचाती है। मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती का उत्तर नीतियों के विकल्प से दिया जाना चाहिए। यदि कांग्रेस को लगता है कि सरकार की आर्थिक नीति गलत है तो वैकल्पिक आर्थिक नीति सामने रखे। यदि उसे विदेश नीति पर आपत्ति है तो अपना विकल्प बताए। यदि उसे सांस्कृतिक नीतियों से असहमति है तो अपने सांस्कृतिक दृष्टिकोण को जनता के सामने रखे। लेकिन केवल ‘मोदी हटाओ’ की राजनीति अंततः विचारहीन विरोध में बदल जाती है।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. ए.पी. तिवारी का मानना है कि सोनिया और राहुल की मोदी से राजनीतिक असहमति की एक बड़ी वजह केंद्र सरकार की विरासत आधारित विकास नीति, राष्ट्रीय चेतना तथा सनातन सांस्कृतिक सरोकारों को सम्मान और संरक्षण देने की प्राथमिकता भी है। तिवारी इस संदर्भ में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की उन नीतियों और राजनीतिक दृष्टिकोणों का उल्लेख करते हैं, जिन पर हिंदू समाज के प्रति भेदभाव और तुष्टीकरण के आरोप लगते रहे हैं। उनके अनुसार, जिस राजनीतिक संस्कृति ने लंबे समय तक सनातन के सांस्कृतिक दावों को संदेह की दृष्टि से देखा, उसके लिए बदलता हुआ भारत सहज स्वीकार करना कठिन हो रहा है।
ए.पी. तिवारी की यह टिप्पणी बहस को एक बड़े प्रश्न तक ले जाती है, क्या आज का कांग्रेस नेतृत्व उस भारत को समझ पा रहा है, जिसमें अपनी संस्कृति, विरासत और सभ्यतागत पहचान को लेकर संकोच लगातार कम हो रहा है? इसी व्यक्तिगत और उपहासपूर्ण विरोध का एक ताजा उदाहरण कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में भी देखने को मिला। 13 अगस्त को आयोजित ‘रचनात्मक कांग्रेस’ के कार्यक्रम में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति का मजाक उड़ाते हुए विदेशी नेताओं से गले मिलने को उसका प्रतीक बताया और मंच पर कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित को गले लगाकर इसका अभिनय किया। इसके बाद संदीप दीक्षित ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का संदर्भ लेते हुए ऐसी टिप्पणी की, जिस पर विवाद खड़ा हुआ और विदेश मंत्रालय को भी भारत-इटली संबंधों की गरिमा और पारस्परिक सम्मान का स्मरण कराना पड़ा।
सवाल यह है कि विदेश नीति जैसी गंभीर विषयवस्तु को भी क्या कांग्रेस के राष्ट्रीय मंच पर इस तरह के भद्दे राजनीतिक अभिनय और व्यक्तिगत मजाक का विषय बनाया जाना चाहिए? प्रधानमंत्री की विदेश नीति पर कठोर प्रश्न पूछे जा सकते हैं, उसके परिणामों की आलोचना की जा सकती है, कूटनीतिक निर्णयों पर बहस हो सकती है। लेकिन जब बहस तर्क से उतरकर हंसी-मजाक और किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के संदर्भ में आपत्तिजनक संकेतों तक पहुंच जाए, तब यह केवल मोदी-विरोध नहीं रहता। यह राजनीतिक मर्यादा का प्रश्न बन जाता है।
राजनीतिक प्रतिशोध का मंच
स्वतंत्रता दिवस किसी प्रधानमंत्री का निजी कार्यक्रम नहीं है। लालकिले की प्राचीर से दिया गया संबोधन भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य की परंपरा का हिस्सा है। प्रधानमंत्री कोई भी हो, ध्वज वही है, राष्ट्र वही है और तिरंगा वही है। इसलिए 15 अगस्त के राष्ट्रीय समारोह से दूरी बनाना राजनीतिक असहमति की सामान्य अभिव्यक्ति नहीं मानी जा सकती।राष्ट्रीय पर्व से दूरी बनाकर उसने यह संदेश दिया कि राजनीतिक अहंकार और राष्ट्रीय दायित्व के बीच उसकी प्राथमिकता क्या है। वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र भट्ट के अनुसार कांग्रेस आज उस राजनीतिक वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पा रही है, जिसमें देश की सनातन चेतना पहले की तुलना में अधिक मुखर हुई है। उनका कहना है कि बीते वर्षों में कांग्रेस और विशेष रूप से नेहरू-गांधी परिवार की ओर से नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने की राजनीति ने कई बार सामाजिक और राजनीतिक मर्यादाओं की सीमाएं पार की हैं। प्रधानमंत्री के परिवार और उनकी स्वर्गीय माता तक को लेकर की गई टिप्पणियां इस बात का संकेत हैं कि कांग्रेस के पास मोदी की नीतियों के मुकाबले कोई प्रभावी वैकल्पिक विमर्श नहीं बचा है। यदि मतदाता विकास के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान, परंपरा और राष्ट्रीय स्वाभिमान को भी महत्व दे रहा है, तो विपक्ष को इस आकांक्षा का वैकल्पिक उत्तर देना चाहिए, उसका उपहास नहीं।
तय करनी होगी सीमा
भारत का लोकतंत्र मजबूत विपक्ष चाहता है। लेकिन मजबूत विपक्ष का अर्थ हर राष्ट्रीय विषय पर विरोध करना नहीं है। विपक्ष सरकार की आलोचना करे, कठोर प्रश्न पूछे, नीतियों को चुनौती दे और सत्ता को जवाबदेह बनाए,यही लोकतंत्र की शक्ति है। लेकिन राष्ट्रगीत, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रीय पर्वों की गरिमा को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से ऊपर रखना भी उतना ही आवश्यक है। कांग्रेस को यह तय करना होगा कि उसकी राजनीति भारत के विरुद्ध नहीं, सरकार के विरुद्ध है। ‘वंदे मातरम्’ पर खीझ, राष्ट्रीय पर्व से दूरी, तुष्टीकरण की राजनीति और प्रधानमंत्री के प्रति लगातार व्यक्तिगत कटुता-इन सबको अलग-अलग घटनाएं बताकर टाला नहीं जा सकता। ये मिलकर कांग्रेस की वर्तमान राजनीतिक दिशा पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।
भारत बदल चुका है। आज का मतदाता अपनी संस्कृति को लेकर संकोची नहीं है। वह विकास चाहता है, आधुनिकता चाहता है, लेकिन अपनी जड़ों से कटकर नहीं। वह संविधान चाहता है, लेकिन संविधान के नाम पर अपनी सभ्यता को अपमानित होते नहीं देखना चाहता। वह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा चाहता है, लेकिन राष्ट्रहित की कीमत पर नहीं। इसलिए कांग्रेस के सामने असली चुनौती नरेंद्र मोदी नहीं, उसकी अपनी राजनीतिक दृष्टि का संकट है। ‘वंदेमातरम्’ से खीझने और राष्ट्रभाव से दूरी बनाने से वह उस भारत को नहीं बदल सकती, जिसकी चेतना अब अपनी जड़ों को पहचान रही है। सवाल अब केवल कांग्रेस की राजनीति का नहीं, उसकी वैचारिक दिशा का है। उसे तय करना होगा कि वह बदलते भारत से संवाद करेगी या अपने पुराने राजनीतिक दुराग्रहों के साथ ही खड़ी रहेगी।

















