भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने चुनौती अब केवल सीमा पार से आने वाली बंदूक या घुसपैठिए तक सीमित नहीं है। आतंक का चेहरा बदल चुका है और उसके तौर-तरीके कहीं अधिक जटिल हो गए हैं। सीमा पार से घुसपैठ, अवैध प्रवासन, नशीले पदार्थों की तस्करी, स्थानीय अपराध-जगत का इस्तेमाल, युवाओं को कट्टरता की घुट्टी पिलाना, हवाला और ड्रोन के जरिए हथियारों की आपूर्ति, सोशल मीडिया पर वैचारिक विष, सरकारी संस्थानों पर साइबर हमले और पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध-ये अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों की ऐसी शृंखला हैं, जिसका अंतिम लक्ष्य भारत को भीतर से कमजोर करना है।
24-25 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में हुए नौवें राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति सम्मेलन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसी बदले हुए खतरे की समग्र प्रकृति को रेखांकित किया। उन्होंने आतंकवाद और इस्लामी कट्टरता के खिलाफ ‘प्रहार’ नामक समग्र नीति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित खुफिया विश्लेषण तथा घुसपैठ और अवैध प्रवासन के प्रति शून्य-सहिष्णुता पर जोर दिया। ‘प्रहार’ इस वर्ष 23 फरवरी को गृह मंत्रालय द्वारा जारी भारत की पहली राष्ट्रीय काउंटर-टेररिज्म नीति एवं रणनीति है, जिसका आधार सक्रिय और खुफिया-आधारित सुरक्षा दृष्टिकोण है। यह महज किसी सरकारी सम्मेलन की कार्यवाही नहीं है। यह भारत की सुरक्षा-दृष्टि में आए उस निर्णायक बदलाव का संकेत है, जिसमें आतंकवाद को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय राष्ट्र की संप्रभुता, सामाजिक स्थिरता, अर्थव्यवस्था, सीमाई सुरक्षा और डिजिटल ढांचे पर एक साथ होने वाले हमले के रूप में देखा जा रहा है।
पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध
पाकिस्तान की भारत विरोधी रणनीति का मूल चरित्र लंबे समय से प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय परोक्ष युद्ध का रहा है। आतंकवादी संगठनों को संरक्षण, सीमा पार से घुसपैठ, हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी, फर्जी पहचान, हवाला और कट्टरपंथी नेटवर्क के जरिए भारत को भीतर से अस्थिर करने की कोशिश कोई नई बात नहीं। नया यह है कि इस पुराने खेल में अब डिजिटल और साइबर युद्ध भी शामिल हो चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति सम्मेलन में आतंकवाद, पाकिस्तान के परोक्ष युद्ध, अवैध प्रवासन, ड्रग्स और साइबर अपराध को एक ही सुरक्षा विमर्श में रखना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आतंक का नेटवर्क राज्यों और विभागों की सीमाओं को नहीं मानता। एक राज्य में भर्ती, दूसरे में वित्त, तीसरे में हथियार, चौथे में रेकी और विदेश में बैठे संचालक-यह आज के हाइब्रिड आतंकवाद की कार्यपद्धति है।
इसलिए केवल सीमा पर घुसपैठ रोक देना पर्याप्त नहीं।
घुसपैठिया अकेला नहीं आता। उसके साथ धन, पहचान, संपर्क, विचारधारा और नेटवर्क भी प्रवेश कर सकते हैं। आधुनिक सुरक्षा नीति को इस पूरी शृंखला को एक साथ तोड़ना होगा। यहीं पाकिस्तान की ‘हाइब्रिड टेरर’ नीति को समझना होगा। पहले सीमा पार से प्रशिक्षित आतंकियों को भेजना प्रमुख तरीका था। अब स्थानीय युवाओं, अपराध जगत, हथियार तस्करों, हवाला संचालकों और डिजिटल माध्यमों के जरिए ऐसे विकेंद्रित मॉड्यूल खड़े किए जा रहे हैं, जिनमें पाकिस्तान का प्रत्यक्ष हाथ तुरंत दिखाई न दे। लक्ष्य है-स्थानीय व्यक्ति को बरगलाओ, हथियार पहुंचाओ, संवेदनशील प्रतिष्ठानों की रेकी कराओ और सही समय पर हिंसा कराओ। यह रणनीति बताती है कि पाकिस्तान अब केवल आतंकवादी भेजने की कोशिश नहीं करता, वह भारत के भीतर आतंक का इकोसिस्टम खड़ा करने की कोशिश करता है।
प्रतिक्रिया नहीं, आतंक की जड़ पर हमला
‘प्रहार’ की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसका केंद्र आतंकवादी घटना के बाद प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि आतंक की पूरी शृंखला को पहले ही पहचानना और बाधित करना है। कट्टरता का निर्माण, भर्ती, वित्तपोषण, नेटवर्किंग, लॉजिस्टिक्स और संचालन-इन सभी चरणों पर प्रहार किए बिना आतंकवाद का स्थायी उन्मूलन संभव नहीं।
अमित शाह ने सुरक्षा तंत्र के प्रशिक्षण, यूएपीए मामलों की समग्र जांच, सीमा-पार संबंध वाले मामलों में मुकदमों को तेज करने और विदेश में बैठे आतंक के सरगनाओं को कानून के दायरे में लाने पर जोर दिया है। आवश्यक मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति में मुकदमे की व्यवस्था का इस्तेमाल भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। यानी भारत की सुरक्षा नीति को प्रतिक्रियात्मक से पूर्व-सक्रिय बनाने की दिशा स्पष्ट है।
आतंकवादी को सीमा पर रोकना जरूरी है, लेकिन उससे पहले यह जानना ज्यादा जरूरी है कि उसे सीमा तक कौन पहुंचा रहा है। उसके लिए पैसा कौन दे रहा है? हथियार कौन पहुंचा रहा है? डिजिटल प्रचार कौन कर रहा है? स्थानीय मददगार कौन हैं? रेकी कौन कर रहा है? और सीमा पार बैठा संचालक कौन है? आतंकवादी शरीर है; उसका नेटवर्क उसकी जीवन-रेखा है। प्रहार का लक्ष्य उस जीवन-रेखा को काटना होना चाहिए।
आतंकी नेटवर्क पर चोट
स्वतंत्रता दिवस से पहले 12 अगस्त को 14 राज्यों में हुई समन्वित कार्रवाई इसी बदले हुए दृष्टिकोण का ठोस उदाहरण है। शहजाद भट्टी से जुड़े कथित नेटवर्क पर कार्रवाई में 253 लोगों को हिरासत में लिया गया और अब तक 80 से अधिक एफआईआर तथा 200 से अधिक गिरफ्तारियां सामने आईं। उत्तर प्रदेश में 62, हरियाणा 52, दिल्ली 51, पंजाब 44, राजस्थान 15, महाराष्ट्र 8, उत्तराखंड 5, कर्नाटक/गुजरात/बिहार 3-3, तथा तेलंगाना-हिमाचल-जम्मू-कश्मीर/केरल में 2-2। कार्रवाई में आईईडी, पिस्तौल, कारतूस, पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री के निशान वाले ग्रेनेड और जासूसी के लिए इस्तेमाल किए जा रहे सीसीटीवी कैमरे बरामद किए गए।
यहां गिरफ्तारियों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है कार्रवाई का भौगोलिक विस्तार। उत्तर प्रदेश से हरियाणा, दिल्ली और पंजाब तक फैले नेटवर्क पर एक साथ कार्रवाई बताती है कि जांच एजेंसियां आतंकवाद को किसी एक जिले या राज्य की कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं चल रहीं।
इस नेटवर्क में पुलिस, रक्षा प्रतिष्ठानों और धार्मिक स्थलों की रेकी, स्थानीय संपर्कों को भुगतान, हथियारों और विस्फोटकों की व्यवस्था तथा लक्षित हिंसा जैसे आरोप सामने आए हैं। यानी लक्ष्य केवल विस्फोट करना नहीं था। लक्ष्य था-पहले जानकारी जुटाना, स्थानीय नेटवर्क बनाना, संसाधन पहुंचाना और फिर उचित समय पर हिंसा करना। यही कारण है कि भट्टी से बड़ा उसका नेटवर्क है। एक व्यक्ति को पकड़ना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उस नेटवर्क को ध्वस्त करना रणनीतिक सफलता है जो उसके बाद भी नए मॉड्यूल खड़े कर सकता है।
आतंकवादी संगठन विकेंद्रित होकर काम कर रहे हैं तो सुरक्षा तंत्र को भी विकेंद्रित, लेकिन एकीकृत होकर काम करना होगा। 12 अगस्त की कार्रवाई में केंद्र और राज्य एजेंसियों के बीच रियल-टाइम इंटेलिजेंस साझा करने की व्यवस्था का इस्तेमाल इसी नई कार्यशैली का संकेत है।
हाफिज सईद से भट्टी तक
भारत की आतंकवाद विरोधी रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष पाकिस्तान में बैठे आतंक के सरगनाओं को कानूनी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरना है। हाफिज सईद इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। 26/11 के मुंबई हमले से लेकर पहलगाम तक पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की कड़ियां अलग-अलग घटनाओं की तरह नहीं देखी जा सकतीं। जुलाई 2026 में एनआईए ने पहलगाम हमले की पूरक चार्जशीट में हाफिज सईद को आरोपी बनाया और विशेष एनआईए अदालत ने उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया। अगस्त 2026 में मुंबई पुलिस ने 26/11 मामले में पाकिस्तान में मौजूद आरोपियों के खिलाफ अभियुक्त की अनुपस्थिति में मुकदमे की दिशा में कदम बढ़ाया।
यह केवल पुराना हिसाब खोलना नहीं है। यह उस पाकिस्तानी मॉडल को चुनौती है, जिसमें आतंकवाद के सरगनाओं को अपनी जमीन पर रखकर भारत के खिलाफ उनके नेटवर्क को संचालित करने की गुंजाइश दी जाती रही है। पाकिस्तान ने अतीत में हाफिज सईद को आतंक वित्तपोषण के मामलों में गिरफ्तार और दंडित करने का दिखावा किया, लेकिन भारत के खिलाफ आतंकवादी हमलों की मूल साजिश और नेतृत्व पर निर्णायक कार्रवाई नहीं की। यही पाकिस्तान की नीति का असली चेहरा है। आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई का दावा, लेकिन आतंक की संरचना को बचाए रखना।
भारत का जवाब अब स्पष्ट है-यदि पाकिस्तान आरोपी को भारत को सौंपने से इनकार करता है, तो भारत अपने उपलब्ध कानूनी रास्तों से आगे बढ़ेगा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की जवाबदेही का प्रश्न उठाएगा। आतंक के सरगना को सुरक्षित पनाह देकर पाकिस्तान यह मानता रहा कि आतंक की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी। भारत अब उस भ्रम को तोड़ रहा है।
खुफिया तंत्र की नई आंख
आतंक के बदलते स्वरूप का सामना पुराने औजारों से नहीं किया जा सकता। जिस गति से डिजिटल संचार, वित्तीय लेन-देन, यात्रा डेटा, सोशल मीडिया गतिविधियां और एजेंसियों की सूचनाएं बढ़ रही हैं, उनका विश्लेषण मनुष्य अकेले उसी गति से नहीं कर सकता। इसीलिए मल्टी एजेंसी सेंटर यानी मैक पर उपलब्ध सूचनाओं के एआई आधारित विश्लेषण और इसके लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं तैयार करने पर जोर महत्वपूर्ण है। यह केवल तकनीक जोड़ने का मामला नहीं। यह सूचना को समय रहते खुफिया चेतावनी में बदलने की क्षमता विकसित करने का प्रश्न है।
यदि किसी संदिग्ध व्यक्ति की यात्रा, वित्तीय लेन-देन, डिजिटल संपर्क, सीमा गतिविधि और किसी आतंकी नेटवर्क से संबंध जैसी अलग-अलग सूचनाएं अलग-अलग फाइलों में पड़ी रहें, तो उनका महत्व खो सकता है। लेकिन एआई उन पैटर्नों को पहचान सकता है जिन्हें मनुष्य शायद देर से देखे। यही भविष्य के खुफिया तंत्र की दिशा होनी चाहिए। हालांकि तकनीक अंतिम निर्णय का स्थान नहीं ले सकती। एआई के साथ प्रशिक्षित मानव विशेषज्ञ, डेटा सुरक्षा, कानूनी निगरानी और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा में तकनीक की शक्ति तभी उपयोगी होगी, जब उसके साथ मानवीय विवेक और संवैधानिक मर्यादा भी हो।
युद्ध का नया साइबर मोर्चा
‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने भारत की आतंकवाद विरोधी नीति को एक और आयाम दिया। पाकिस्तान-प्रायोजित आतंक के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के समानांतर डिजिटल क्षेत्र में भी गतिविधियां सामने आईं। एनआईए 54 सरकारी वेबसाइटों को निशाना बनाने वाले कथित साइबर हमलों की जांच कर रही है। 24 अगस्त 2026 को महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, बिहार और दिल्ली में पांच ठिकानों पर छापेमारी भी की गई।
यह समझना जरूरी है कि सरकारी वेबसाइट पर साइबर हमला केवल ‘साइट बंद’ करने का मामला नहीं। यदि किसी महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना, संचार व्यवस्था, सार्वजनिक सेवा या संवेदनशील डेटा प्रणाली को बाधित करने का प्रयास हो, तो उसका प्रभाव नागरिक जीवन और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों पर पड़ सकता है। यानी युद्ध अब केवल जमीन, समुद्र और आकाश में नहीं लड़ा जाता। साइबर स्पेस भी युद्धभूमि है।
पाकिस्तान के परोक्ष युद्ध का यह नया आयाम इसलिए गंभीर है क्योंकि साइबर हमला अपेक्षाकृत कम लागत में व्यापक व्यवधान पैदा कर सकता है। यदि आतंकवाद की बंदूक सीमा पर है और उसका डिजिटल हथियार भारत की डिजिटल व्यवस्था पर, तो सुरक्षा नीति को दोनों को एक ही रणनीतिक चित्र में देखना होगा। यही कारण है कि ‘प्रहार’ और एआई आधारित खुफिया विश्लेषण को साइबर सुरक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
सुरक्षा की पहली दीवार
भारत की सीमाएं केवल नक्शे पर खींची गई रेखाएं नहीं हैं। वे संप्रभुता की पहली सुरक्षा-पंक्ति हैं। इसलिए घुसपैठ और अवैध प्रवासन को राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक ढांचे में देखना आवश्यक है। हर अवैध प्रवासी को आतंकवादी मानना न उचित है और न कानूनसम्मत। लेकिन जहां अवैध प्रवेश फर्जी पहचान, संगठित अपराध, तस्करी, जासूसी या कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़ता हो, वहां इसे महज प्रशासनिक समस्या मानना भी गंभीर भूल होगी।
आतंकवाद केवल बंदूक से नहीं पैदा होता। वह विचार से शुरू होता है, प्रचार से फैलता है, नेटवर्क से संगठित होता है और संसाधनों से हिंसा में बदलता है। इसीलिए कट्टरता-विरोधी नीति केवल पुलिस और खुफिया एजेंसियों का काम नहीं हो सकती। परिवार, शिक्षण संस्थाएं, मजहबी-सामाजिक संस्थाएं, तकनीकी मंच और नागरिक समाज-सभी की भूमिका है। वैचारिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन हिंसा, आतंक और संप्रभुता-विरोधी षड्यंत्र को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आवरण नहीं दिया जा सकता।
आतंकवादी नेटवर्क विभागीय सीमाओं में काम नहीं करते। फिर सुरक्षा तंत्र अलग-अलग खानों में क्यों काम करे? नौवें राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति सम्मेलन में 850 से अधिक अधिकारियों की भागीदारी और केंद्र-राज्य समन्वय पर जोर इसी आवश्यकता को रेखांकित करता है। खुफिया एजेंसियों, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, राज्य पुलिस, एनआईए, साइबर संस्थाओं और वित्तीय जांच एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में सूचना साझा करना अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।
आतंकवादी नेटवर्क विकेंद्रित है, भारत की सुरक्षा व्यवस्था को एकीकृत होना होगा। सूचना अलग-अलग फाइलों में बंद रही तो आतंकवादी लाभ में रहेगा। सूचनाएं जुड़ीं, पैटर्न पहचाने गए और कार्रवाई की गति बढ़ी तो आतंक का नेटवर्क कमजोर होगा। यही ‘प्रहार’ की वास्तविक परीक्षा है।
दाऊद मॉडल से डिजिटल मॉड्यूल तक
दाऊद इब्राहिम के दौर में अपराध, तस्करी, हवाला और आतंकवाद का गठजोड़ अपेक्षाकृत संगठित रूप में दिखाई देता था। आज डिजिटल संचार, एन्क्रिप्टेड संपर्क, ड्रोन, सोशल मीडिया और छोटे-छोटे मॉड्यूल ने आतंकवाद को अधिक विकेंद्रित बना दिया है। इसलिए आज किसी एक ‘डॉन’ या एक आतंकी को पकड़ लेना पर्याप्त नहीं। लड़ाई अब नेटवर्क बनाम नेटवर्क की है।
भारत को उन सभी नेटवर्कों को लगातार तोड़ना होगा जो हथियार भेजते हैं, धन उपलब्ध कराते हैं, युवाओं को बरगलाते हैं, संवेदनशील प्रतिष्ठानों की रेकी कराते हैं और फिर हिंसा के लिए उनका इस्तेमाल करते हैं। यही शून्य-सहिष्णुता का वास्तविक अर्थ है-घटना के बाद बदला नहीं, घटना से पहले नेटवर्क का विनाश।
निर्णायक मोड़ पर भारत
आज भारत के सामने सवाल यह नहीं है कि आतंकवाद का मुकाबला करना है या साइबर अपराध का। असली प्रश्न यह है कि इनके बीच के संबंधों को कितनी जल्दी पहचाना जा सकता है। घुसपैठ, कट्टरता, ड्रग्स, आतंक-वित्तपोषण, हवाला, साइबर हमला, दुष्प्रचार और पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध-इन्हें अलग-अलग देखने का युग समाप्त हो चुका है। ‘प्रहार’ की सफलता इसी में होगी कि वह आतंकवादी के हमले की प्रतीक्षा न करे, बल्कि उसकी पूरी पारिस्थितिकी को पहचानकर उसे पहले ही निष्क्रिय कर दे। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने सीमा पार यह संदेश दिया कि भारत आतंक को सहने वाला राष्ट्र नहीं है। अब राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का अगला चरण यह सुनिश्चित करने का है कि आतंक का कोई सुरक्षित ठिकाना न बचे-न सीमा पर, न शहरों में, न साइबर स्पेस में और न ही किसी विदेशी धरती पर।
पाकिस्तान के लिए संदेश साफ है। भारत के भीतर आतंक का नेटवर्क चलाना अब सुरक्षित व्यवसाय नहीं रहेगा। संचालक सीमा पार बैठा हो, हथियार पाकिस्तान से आए हों या मॉड्यूल भारत में सक्रिय हो। जांच की कड़ी जहां तक जाएगी, कार्रवाई भी वहां तक पहुंचेगी। यही आतंक की जड़ पर प्रहार है।
भारत की नई सुरक्षा-दृष्टि का सार यही होना चाहिए कि सीमा सुरक्षित हो, समाज सजग हो, खुफिया तंत्र एकीकृत हो, तकनीक सक्षम हो, आतंक का वित्त सूख जाए, उसके स्थानीय मददगार बेनकाब हों और पाकिस्तान में बैठे उसके सरगनाओं को कानून के कटघरे तक पहुंचाने का संकल्प अडिग रहे। अब लड़ाई किसी एक आतंकी को मारने की नहीं है। लड़ाई उस पूरे तंत्र को ध्वस्त करने की है, जो भारत की शांति को अस्थिरता, उसकी युवा शक्ति को कट्टरता और उसकी डिजिटल शक्ति को साइबर युद्ध में बदलना चाहता है। आतंक के शरीर पर नहीं, उसकी जड़ पर प्रहार-यही नए भारत की सुरक्षा नीति का मंत्र होना चाहिए।
















