यह संस्कृत श्लोक सामाजिक एकता, संगठन और सामूहिक चेतना के महत्त्व को रेखांकित करता है।
श्लोक-
योगक्षेमाय धर्मस्य सभ्यतायाः सुसंस्कृतेः।
नैवान्यो विद्यते पन्थाः लोकसंघटनं विना॥
भावार्थ-
धर्म, सभ्यता और संस्कृति के योगक्षेम हेतु समाज के सगंठन के बिना दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
आज के युग में प्रासंगिकता-
सांस्कृतिक पुनर्जागरण और संरक्षण: भूमंडलीकरण (Globalization) के दौर में स्थानीय संस्कृतियों और परंपराओं पर लुप्त होने का खतरा बना रहता है। समाज जब तक संगठित होकर अपनी पहचान के प्रति जागरूक नहीं होगा, तब तक सांस्कृतिक जड़ों को बचाना कठिन है।
सामाजिक समरसता और सुरक्षा: खंडित या बिखरा हुआ समाज बाह्य व आंतरिक चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता। कुरीतियों, असामाजिक तत्वों और नैतिक पतन से निपटने के लिए संगठित लोक-शक्ति ही सबसे बड़ा ढाल बनती है।
सामूहिक विकास और लोक-कल्याण: किसी भी राष्ट्र या समाज का भौतिक और आत्मिक उत्थान व्यक्तिगत प्रयासों से सीमित रहता है। जब लोग एक उद्देश्य के लिए एकजुट होते हैं (जैसे- स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा का प्रसार), तभी वास्तविक परिवर्तन आता है।
संस्थागत एवं वैचारिक उपयोग: यह श्लोक विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्र-निर्माण में लगे संगठनों का ध्येय-वाक्य (Motto) या मूल प्रेरणा स्रोत रहा है, जो समाज को जोड़ने और संगठित करने का कार्य करते हैं।

















