मानवी सभ्यता के इतिहास में संसारभर में स्त्री के प्रति पुरुष की दो प्रकार की दृष्टियांं रही हैं। एक वह जिसमें स्त्री पुरुष के भोग के लिए है। पुरुष का उस पर पूर्ण अधिकार है अतः वह पुरुष की भोग्या दासी और अनुगामिनी है। दूसरी दृष्टि में वह पुरुष की सहचरी है तथा स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों मिलकर दम्पति रूप इकाई बनते हैं। अतः वह पुरुष की अर्धांगिनी और सहगामिनी है।
ये दोनों प्रकार की मनोवृत्तियांं यद्यपि व्यक्ति के संस्कार और उसकी मानसिकता पर निर्भर हैं। एक ही परिवार अथवा जाति अथवा समुदाय अथवा संस्कृति के अन्तर्गत दो पुरुष अलग–अलग मानसिकताओं के हो सकते हैं। एक ही छत के नीचे रहने वाले मनुष्यों में एक व्यक्ति स्त्रियों का सम्मान करने वाला हो सकता है, तो दूसरा स्त्री को अपने पैर की जूती समझने वाला। तथापि व्यक्ति की मनोरचना में उसके पारंपरिक संस्कार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वह जिस संस्कृति, सभ्यता और धर्म, मत-पंथ में जन्म लेता है, उसमें स्त्री को लेकर क्या मान्यता है, इससे भी उसकी दृष्टि निर्धारित होती है। अतः इसकी विवेचना की जानी चाहिए। यदि हम वैश्विक धर्मों, मत-पंथों की मान्यताओं के आधार पर विश्लेषण करें तो देखते हैं कि संसार के दो सर्वाधिक जनसंख्या वाले मजहबों- ईसाइयत और इस्लाम में गॉड अथवा खुदा ने स्त्री का निर्माण पुरुष के भोग के लिए किया है। ‘पुरुष के लिए, पुरुष के बाद, पुरुष की देह से’ स्त्री के निर्मित होने की अवधारणा ही इन मजहबों में स्त्री की हैसियत का निर्धारण करती है।
ईसाइयत में महिला
ईसाइयत के अनुसार स्त्री को पुरुष के शरीर की पसली से उसके आनंद के लिए बनाया गया। धरती पर पहला पुरुष एडम और पहली स्त्री ईव थी। ईव ने ही एडम को वर्जित फल खाने के लिए प्रेरित किया। यही पहला पाप था, जिसका मूल कारण स्त्री ही बनी। ईसाइयत के अनुसार गॉड पुरुष रूप में ही होता है।
न्यू टेस्टामेंट, तीमुथियुस 2:11,12,13 के मूलपाठ का अनुवाद है- “स्त्री को चुपचाप और पूरी अधीनता में रहते हुए सीखने दो। मैं किसी भी स्त्री को न तो पुरुष को सिखाने की आज्ञा देता हूं और न किसी पुरुष पर अधिकार जताने की। उसे चुप रहना चाहिए क्योंकि गॉड ने पहले आदम को बनाया, फिर हव्वा को।”
इफिसियों 5:22,23,24 में पत्नियों से कहा गया है कि वे अपने पतियों के अधीन रहें, जैसे कलीसिया मसीह के अधीन रहती है।
पति को पत्नी का सिर कहा गया है, जैसे मसीह कलीसिया का सिर है।
कुरिन्थियों 14:34 का कथन है कि स्त्रियां कलीसिया की सभा में चुप रहें, क्योंकि उन्हें बातें करने की आज्ञा नहीं, परन्तु अधीनता में रहें, जैसा व्यवस्था में लिखा भी है। इसके अगले वाक्य 14:35 में कहा गया कि यदि वे कुछ सीखना चाहें, तो घर में अपने-अपने पति से पूछें, क्योंकि स्त्री का कलीसिया में बातें करना लज्जा की बात है। उल्लेखनीय है कि ईसाई मान्यता में मसीह और कलीसिया के संबंध को पति-पत्नी की तरह परिभाषित किया गया है, जिसमें मसीह शीर्ष और कलीसिया देह का प्रतिनिधित्व करते हैं।
महिला के प्रति इस्लाम की दृष्टि
इधर इस्लामिक मान्यता में भी स्त्री को पुरुष से हीन दर्जा ही प्राप्त है। कुरान के दूसरे अध्याय “सूरा अल बकरा” की आयत संख्या 228 के अनुसार “मर्दों को उन पर एक दर्जा प्राप्त है” अर्थात् पुरुष का स्तर स्त्री से ऊपर है। इसी अध्याय की आयत संख्या 223 में कहा गया है, “तुम्हारी स्त्रियां तुम्हारे लिए खेत के समान हैं, तो अपनी खेती में जिस तरह से चाहे, आओ और अपने लिए आगे बढ़ाओ…”
आगे आयत संख्या 282 में उल्लेख है कि दो औरतों की गवाही एक पुरुष के बराबर होगी।
अर्थात् स्त्री की हैसियत और अधिकार पुरुष से आधे हैं। यही नहीं यदि कोई स्त्री पुरुष का आदेश न मानती हो अथवा उसके विद्रोह करने की आशंका हो, तो उसकी पिटाई करने का भी आदेश कुरान देती है। चौथे अध्याय “सूरा अन–निसा” की आयत संख्या 34 का स्पष्ट निर्देश है-“पुरुष स्त्रियों से सरधरे (संरक्षक) हैं, इसलिए कि अल्लाह ने एक को दूसरे पर बड़ाई दी है, और इसलिए भी की उन्होंने अपने माल खर्च किए हैं। और जो स्त्रियां ऐसी हो जिनकी सरकशी (अवज्ञा) का तुम्हें भय हो, उन्हें समझाओ, बिस्तरों में उन्हें तन्हा छोड़ दो और उन्हें मारो।’’ इन सभी उदाहरणों को विशेष परिस्थिति-जन्य मान लिया जाए तो भी, यूरोप की डायन हत्या प्रथा का विवरण पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इधर हलाला जैसी पाशविक और अत्यंत नीच व्यवस्था आज भी देखी जा सकती है। यह इन मजहबों में स्त्री की वास्तविक स्थिति को प्रकट करती है।
भारतीय संस्कृति में स्त्री
जब हम भारतीय चिंतन परंपरा में स्त्री के प्रति दृष्टिकोण को देखते हैं तो पाते हैं कि स्त्री का स्थान पुरुष के समकक्ष है। वह भी पुरुष के समान सृष्टि का अंश है। जिस मनुस्मृति की इन दिनों दुर्भावनावश विकृत एवं काट–छांट पूर्ण कपट प्रस्तुति की जा रही है, उसका एक प्रसिद्ध श्लोक, जो किंचित् शब्दान्तर के साथ अग्निपुराण, ब्रह्मपुराण आदि में भी मिलता है, स्त्री विषयक भारतीय दृष्टि का अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार विराट पुरुष ने स्वयं को दो भागों में विभाजित कर अर्धभाग से पुरुष और अर्धभाग से नारी की रचना की-
द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत्।
अर्धेन नारी तस्यां च विराजमसृजत्प्रभु।। (मनुस्मृति 1/32)
वेदों में स्त्री को पुरुष के समतुल्य सम्मान सूचक शब्दों से संबोधित किया गया है। ऋग्वेद में पुरुष को सम्राट्, राजा, मनीषी और सभासद कहा है तो स्त्री को भी साम्राज्ञी, राज्ञी, मनीषा, सभासदा कहा है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते…’ वाली उद्घोषणा तो सर्वविदित है ही, ऐसे अनेक वचन मनुस्मृति में हैं जो स्त्री की अस्मिता और सम्मान को अतिशय महत्व देते हैं। इन दिनों वे सर्वसुलभ हैं। उल्लेखनीय है कि मनुस्मृति के जिन श्लोकों में स्त्री के नियंत्रण की बात कही गई है उसका हेतु बाइबल या कुरान की तरह स्त्री का निम्न स्तरीय होना नहीं, वरन् स्त्री के प्रति सुरक्षात्मक दृष्टिकोण रहा है।
यहांं स्त्री संबंधी हिंदू मान्यता को लेकर होने वाले एक विभ्रम का निराकरण करना भी समीचीन होगा। प्राचीन भारतीय वाङ्मय में स्त्री की प्रशंसा और निंदा दोनों ही प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। एक ओर वे कथन हैं जिनमें स्त्री के प्रति सम्मान का भाव है, उसकी अस्मिता और स्वायत्तता का स्वीकरण है तथा उसे पूज्या माना गया है। दूसरे प्रकार के वे कथन हैं जहां स्त्री की हैसियत पुरुष की तुलना में तुच्छ और अधम बताते हुए उसको अधिकार वंचित किया गया है। विकट समस्या तब खड़ी होती है जब एक ही ग्रन्थ में परस्पर विपरीत मन्तव्य मिलते हैं।
दासबुद्धि से ग्रस्त लोग
यह विचित्र स्थिति है कि भारतीय परंपरा से द्वेषभाव रखने वाले औपनिवेशिक दासबुद्धि से ग्रस्त लोग मनु को पितृसत्तावादी कहते हुए केवल एक ही प्रकार के कथनों को प्रस्तुत करते हैं। वे उन कथनों से सदैव मुंह चुराते हैं, जहांं स्त्री का गौरव पुरुष से भी बढ़कर बताया जाता है। जहांं उसे कुछ विशेष अधिकार भी दिए गए हैं। इधर भारतीय परम्परा के प्रति अगाध श्रद्धा रखने वाले स्वदेशी लोग हैं जो उन कथनों की ओर कभी नहीं देखते जहांं स्त्री को अधम बताकर उसका तिरस्कार किया गया है। उसे पुरुष के आश्रित मान कर, उसकी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया है। विचारणीय प्रश्न है कि धर्मशास्त्रों में ऐसे परस्पर विरुद्ध कथन क्यों मिलते हैं जो एक-दूसरे को काटते हैं तथा अंतर्विरोधी स्थापनाओं को पुष्ट करने का आधार प्रदान करते हैं!
इस विडंबना का समाधान क्या है? दरअसल, इस अंतर्विरोध का समाधान हमारे इतिहास-क्रम में छुपा है। अतिप्राचीन काल से चले आ रहे इस राष्ट्र में युगपरिवर्तन के साथ विचार एवं व्यवहार में भी परिवर्तन हुए हैं तथा वे समय–समय पर स्मृतियों और धर्मग्रंथों में दर्ज भी होते रहे। लेकिन जिन संस्करणों में नवीन व्यवहार जोड़े गए, उनमें भी पूर्ववर्ती विचार यथावत् रहे। अत: हमें इनमें परस्पर विरुद्ध कथन मिल जाते हैं। समस्या यह है कि इसके मूल मन्तव्य को छोड़ कर कोई एक को पकड़ कर बैठ जाता है, तो कोई दूसरे को। जबकि यह निर्भ्रांत सत्य है कि वैदिक एवं महाभारत काल में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत श्रेष्ठ थी। बौद्ध काल के उपरांत समाज में पतन प्रारंभ होता गया जो भारत में इस्लामी शासकों के आने के बाद अत्यंत शोचनीय दशा में जा पहुंचा। स्त्रियों की परतंत्रता और उन पर पुरुषों का नियंत्रण भी इसी क्रम में बढ़ते गए। यह परिवर्तन इस्लामी अत्याचारों के निवारणार्थ तो हुआ ही था, कुछ प्रभाव भारत में आने वाले विदेशियों की मजहबी धारणाओं की देखादेखी भी हुआ, जो भारत में अपने पैर पसार चुके थे।
इसी के साथ एक और तथ्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि बुद्धोत्तर भारत में योगमार्गी और वैराग्य के पथ पर चलने वाले साधकों का प्रभुत्व बढ़ने लगा था। ये साधक कंचन और कामिनी को साधना पथ में सबसे बड़ा अवरोधक मानकर इनकी बढ़-चढ़ कर निंदा करते थे। सिद्धों और संतों ने इन्हें पापपूर्ण और नरक का मार्ग घोषित कर दिया। इस वातावरण की छाया तत्कालीन धर्मग्रंथों पर पड़ी तो वैदिक काल की वन्दिता इस काल में निन्दिता हो गई। अतः हमें गोरख आदि योगियों और कबीर जैसे संतों के साहित्य में तथा उससे प्रभावित अन्य साधु-संतों के व्यवहार में स्त्री निंदा तथा वर्जना के स्वर भी मिलते हैं। इन्हें गृहस्थ की आंखों से नहीं अपितु गृहत्यागी की आंखों से देखने की जरूरत है।
वराह मिहिर के विचार
इस प्रसंग में हमें छठी शताब्दी के एक महान् विचारक को पढ़कर जो सुखद विस्मय होता है वह कल्पना से परे है। स्त्री-प्रश्नों पर ऐसी प्रगाढ़ संवेदनशीलता और स्त्री के प्रति ऐसा सात्विक सम्मान आधुनिक स्त्रीवादियों में भी दुर्लभ है। किन्तु स्त्री विमर्शकारों में कोई उस मनीषी की चर्चा तक नहीं करता। वह मनीषी है विख्यात खगोलविज्ञानी और गणितज्ञ वराह मिहिर, जो श्रेष्ठ नीतिकार भी थे। उन्होंने आज से डेढ़ हजार वर्ष पूर्व अपने ग्रंथ ‘बृहत्संहिता’ में स्त्री की अस्मिता और गरिमा के जो वचन कहे हैं वे हमें चकित कर देते हैं। वराह मिहिर ने इस अध्याय का नाम ही ‘स्त्री प्रशंसाध्याय’ रखा है। वे पूछते हैं, जरा बताइए स्त्रियों में ऐसा कौन सा दोष है जिसको पुरुषों ने पहले नहीं किया।
प्रब्रूत सत्यं कतरोङ्गनानां दोषोऽस्ति यो नाचरितो मनुष्यै:।
धार्ष्ट्येन पुम्भि: प्रमदा निरस्ता गुणाधिकास्ता मनुनाऽत्र चोक्तम्। (बृहत्संहिता/स्त्री प्रशंसाध्याय/74/6)
इस तीखे प्रश्न के साथ वे यहांं तक कह देते हैं कि स्त्रियों में पुरुषों से अधिक गुण होते हैं। पर पुरुष अपनी दुष्टता के कारण उनको निरस्त कर देता है। वराहमिहिर स्त्री निंदकों को दुर्जन मानते हुए, स्त्री निंदा के उस गूढ़ कारण की ओर भी संकेत करते हैं, जिसकी ऊपर चर्चा की जा चुकी है। वे कहते हैं-
येप्यंगनानां प्रवदन्ति दोषान् वैराग्यमार्गेण गुणं विहाय।
ते दुर्जना: मे मानसो वितर्क: सद्भाववाक्यानि न तानि तेषाम्।।
अर्थात् जो कोई वैराग्य मार्ग के द्वारा स्त्रियों के गुणों को छोड़कर दोषों का वर्णन करते हैं, वे दुर्जन हैं, ऐसा मेरा अभिमत है। उन दुर्जनों के वचन प्रामाणिक नहीं हो सकते हैं।

















