'लोक कल्याण की कामना ही लोकतंत्र का सत्य '
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‘लोक कल्याण की कामना ही लोकतंत्र का सत्य’

'सुशासन संवाद-राजस्थान' में सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण से पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने युवा पीढ़ी, समकालीन समाज, धर्म, अध्यात्म और सोशल मीडिया के बारे में संवाद किया।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Aug 24, 2026, 05:57 pm IST
inसाक्षात्कार, राजस्थान, पाञ्चजन्य इवेंट
सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण

सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण

हम संत शक्ति को नैतिकता के प्रहरी के रूप में देखते हैं। लोकतंत्र में संत का स्थान क्या है?
लोकतंत्र में लोक की आकांक्षाओं के अतिरिक्त भी कोई सत्ता हो यह एक विडंबना है। लोकतंत्र में लोक की जो अभीप्सा है, लोक की जो कल्याण कामना है, वही लोकतंत्र का सत्य है और उसी की सत्ता होती है। संत वह है-जो आत्मानुशासित है। जिसने अपनी मनुष्यता के गुण-दोषों को पहचाना है और स्वीकार किया है। स्वीकार करके अपने ही बल पर उनको प्रबंधित करने की योग्यता उपार्जित कर ली है। यह अकस्मात् नहीं होता। यह किसी जादू से नहीं होता। यह तिल-तिल संघर्ष करके होता है और जिन्होंने ऐसा कर लिया है, वे संत कहलाते हैं। इसलिए संतों के जीवन में अनुशासन दिखाई पड़ता है। समाज अपने लिए सदाचार चाहता है, संत उस सदाचार के प्रहरी हैं। संसार समुद्र है। समुद्र में किनारे लाइट हाउस होते हैं। एक प्रतीक की तरह हम देखें तो जिन्हें तट पर लगना है, उनको एक प्रकाश स्तंभ चाहिए। जीवन समुद्र में उतरे हुए लोग यदि चाहते हैं कि वे भटक न जाएं, खो न जाएं, किसी किनारे लग जाएं, उन्हें किसी न किसी संत के जीवन का प्रकाश चाहिए ताकि वह किनारे लग सके। यही भूमिका संत की है।

भारत के लोकतंत्र में ‘सेकुलर’ शब्द को लेकर राजनीति में कई तरह की बातें होती हैं। आपको क्या लगता है, इसके पीछे राजनीति का कितना कपट या दिखावा है? और जब राजनीति और आस्था बहुत करीब आ जाती हैं, तो इसका नुकसान किसे होता है, राजनीति को, आस्था को या धर्म को?
‘सेकुलर’ भारतीय अवधारणा का शब्द नहीं है। यह विश्व के किसी ऐसे इतिहास-भूगोल में पैदा हुआ शब्द है जहां ईश्वरवाद के नाम पर गैर बराबरी का एक तांडव चल रहा था और जहां यह आग्रह किया गया था कि ईश्वर के साम्राज्य में किसी को जातिगत, वर्णगत, धनगत, श्रेष्ठता का अधिकार नहीं है। सबको समान अवसर मिलने चाहिए। भारत पहले से ही यह कर रहा था। यह हमारे लिए व्यर्थ शब्द है, जो उपनिवेश के कारण हमारे मत्थे मढ़ दिया गया है। एक दूसरा शब्द है-मजहब। यह भी भारत की प्रकृति का शब्द नहीं है। हमको एक झूठी पक्ति पढ़ाई गई-‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’, जिसने यह लिखा था उनका संदर्भ भारत नहीं था। उसका संदर्भ मजहब के लिए लड़ते हुए कबीले थे, जो पूरी दुनिया में पशुओं की भांति परस्पर लड़ रहे थे। जहां कहीं भी मजहब अपना झंडा लेकर पहुंचा है, वह लड़ने ही पहुंचा है। आस्था और राजनीति जब दोनों करीब आते हैं तो हमें यह समझना होगा कि कोई भी नीति बिना आस्था के नहीं होती। जब भी कोई व्यक्ति नैतिक होता है और आस्थावान नहीं होता है तो वह एक हिंसक शिकारी हो सकता है। आस्था वो है जो हमें चरित्र में स्थिर होने के लिए बाध्य करती है।

आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण से बातचीत करते हुए पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर

अध्यात्म स्वभाव को कहते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने ‘स्वभावो अध्यात्म उच्चते’ कहा है। हम भीतर से ही जिसको अनुभव करते हैं और पाते हैं, विकसित करते हैं, जागृत कर पाते हैं, वह अध्यात्म है। बाहर से जो कुछ हमको मिलता है वह सब आचार-व्यवहार है, विचार है, सूचनाएं हैं, प्रेरणाएं हैं। यू-ट्यूब से, सोशल मीडिया के दूसरे माध्यमों से तकनीक का विस्तार, संचार का विस्तार हो जाने के कारण युवा पीढ़ी को जो कुछ मिल रहा है, वह केवल प्रचार है। वह किसी भी रंग-रूप में आ रहा हो, वह जीवन को बदलता नहीं। वह जीवन को रंगता है, जीवन को चमत्कृत करता है।

आज युवाओं में आस्था बढ़ रही है, लेकिन वायरल आध्यात्मिकता और वास्तविक साधना में अंतर कैसे समझें? क्या रील्स और फॉलोअर्स ही आध्यात्मिकता का पैमाना हैं?
अध्यात्म और धर्म बिल्कुल भिन्न वस्तु हैं। हम जो संवाद में, विचार में, प्रश्न-प्रतिप्रश्न में देखते हैं-वह सब धार्मिक है। आध्यात्मिक नहीं है। कुछ भी बाहर से जो पाया जा रहा है, वह आध्यात्मिक नहीं है, धार्मिकता है। नाटकों में एकांकी क्यों आने लगे? जबकि कई अंकों वाले नाटक होते थे। तो उस पर समीक्षाएं लिखनी होती थीं। इस पर पूरा पाठ होता था। और कहा जाता था कि दर्शक के पास, सहृदय समाज के पास इतनी निश्चिंतता नहीं है कि वह कई दिनों तक कई अंकों वाला नाटक देख सके। तो पूरे नाटक का जो एक उपदेश है, एक संदेश है, वह एक ही अंक में डाल के उसे एकांकी दिखाया जाए।

वीडियो में आप कुछ सेकंड्स में पूरी बात देख लेते हैं। वह रील के माध्यम से आपके पास आती है। एक रील है और आपने कुछ स्क्रॉल किया और देख लिया। तब मैं आपको टोकूंगा कि थोड़ा रुकिए। जब आपको लगता है कि आपको बहुत जल्दी है और इसलिए आप रील में सब कुछ समझ लेना चाहते हैं। ठीक उसी समय 3 घंटे की फिल्में अब दो-ढाई घंटे में सिमटने लगी हैं। उसी समय चार-चार सीजन के आठ-आठ एपिसोड के ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी आ रहे हैं। आप देख रहे हैं। आप कहां जल्दी में हैं ?अगर हम यह तर्क मान लें कि हम बहुत जल्दी में हैं और रील्स देख रहे हैं तो फिर हम कहेंगे, यह ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जो हिट हो रही हैं, उसे भी लोग देख रहे हैं। निष्कर्ष क्या निकल रहा है? हम अपनी रुचियों के साथ अधिक समय दे रहे हैं। हम केवल अपने सनातन हिंदू धर्म की बात करें तो चार वेद हैं, छह शास्त्र हैं, 18 पुराण हैं, सैकड़ों उपनिषद हैं, स्मृतियां हैं। इन सबका एक मिलाजुला जो विस्तार है, उसको जब आप एक रील में देख के समझ लेना चाहते हैं तो आप कितने रिस्क में हैं।

एक है तीर्थाटन, एक है देशाटन। मगर मोबाइल के दौर में तीर्थाटन ही पर्यटन बन गया। पर्यटन ही देशाटन बन गया। ये वर्गीकरण क्या था? तीनों का अंतर क्या है? क्या आस्था को आघात पहुंचा है और क्या प्रशासन के लिए चुनौतियां पैदा हुई हैं?
तीर्थाटन, देशाटन और पर्यटन-तीनों में ‘अटन’ शब्द है। अटन का अर्थ है चलना या घूमना। लेकिन इनके उद्देश्य अलग-अलग हैं। देश को जानने और समझने के लिए घूमना देशाटन है। किसी भी स्थान पर क्या अच्छा है, यह खोजते हुए घूमना पर्यटन कहलाता है। यानी पर्यटन का उद्देश्य घूमकर सुख और अनुभव प्राप्त करना है, जबकि देशाटन का उद्देश्य अपने देश को जानना और समझना है।
जिसे हम भारत देश कहते हैं। यह भारत किन तत्वों से बनता है? यह जानने के लिए जब आप घूमते हैं, भारत जिन तत्वों से, जिस इतिहास-भूगोल से, जिस विश्वास से अपने को परिभाषित करता है वह क्या है? यह आप किसी भी एक शहर में बैठकर नहीं देख सकते। आप कहीं बैठकर राजस्थान का इतिहास-भूगोल पढ़ते रहें। जब आप राजस्थान आएंगे तब आपको पता चलेगा कि सारे स्थानों में राजा होते थे तो राजस्थान यही क्यों है? यहां लोग बातचीत करेंगे, उनकी शब्दावली से आपको पता चलेगा कि यह हुक्म क्यों कह रहे हैं। यह देशाटन है। एक तीसरा, जो आज ज्यादा प्रासंगिक है-तीर्थाटन। तीर्थ क्या है? जो हमारा तारण करता है। हम जहां हैं, इससे अधिक दिव्य अवस्था में हमको ले जाने का जो माध्यम है, वह तीर्थ है। तीर्थ का अभिप्राय है-तारने वाला। तीर्थ का अभिप्राय-वह स्थान जहां से आप पार जा सकते हैं। जब अपनी मलिनता कम होती है। पार जाना कब होता है? जब हमारी अपवित्रता कम होती है तो हमको शुद्ध करने वाले जो केंद्र हैं-वे तीर्थ कहलाते हैं। पर्यटन सुख प्राप्त करने के लिए है। देशाटन बोध प्राप्त करने के लिए है। और तीर्थाटन स्वयं को निष्पाप करने के लिए है। तीनों बिल्कुल भिन्न-भिन्न प्रतिज्ञाएं हैं।

जब एआई सब कुछ बताने लगेगा, तब ज्ञान, संस्कार, विवेक और गुरु का स्थान क्या रहेगा?
बाजार पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ता है और यह भी जानता है कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति उसका कितना मुकाबला कर सकता है। इसलिए आज हमारे सामने चुनौती एआई की भी है। हालांकि, मैं एआई के पक्ष या विपक्ष में नहीं हूं। एआई को लेकर जितना भय पैदा किया जा रहा है, वह भी उचित नहीं है। मेरी चिंता यह है कि नई पीढ़ी एआई से मिलने वाली सुविधाओं की आदी होती जा रही है और अपने मानवीय गुणों को विकसित करने पर ध्यान कम कर रही है। केवल मोबाइल नंबर याद न रहना बड़ी समस्या नहीं है, लेकिन अगर हम वे गुण ही भूल जाएं जो हमें मनुष्य बनाते हैं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। शकुंतला और दुष्यंत का एक प्रसंग है। शकुंतला दुष्यंत के विचारों में इतनी डूबी थीं कि उन्होंने वहां आए दुर्वासा ऋ षि का सम्मान नहीं किया और उन्हें प्रणाम भी नहीं किया। इससे उन्हें ऋ षि का श्राप मिला और उनकी सुखद कथा पीड़ा और त्रासदी में बदल गई। यह प्रसंग बताता है कि एक छोटी-सी असावधानी भी जीवन भर के पुण्यों को प्रभावित कर सकती है। आज की तकनीक भी हमें लगातार असावधान और अपने से दूर कर रही है। एआई की थोड़ी-सी चूक भी हमें अपने जीवन और वास्तविकता से दूर कर सकती है। दुनिया के विकसित देशों में एआई के प्रभाव पर गंभीर शोध हो रहे हैं। वहां की कई रिपोर्ट और डॉक्यूमेंट्री यह चिंता सामने रखती हैं कि एआई कहीं मनुष्यता के लिए चुनौती तो नहीं बन रहा। दुनिया भर में एआई के इस्तेमाल से जुड़ी मानसिक परेशानियों और आत्महत्या की घटनाओं को लेकर भी वैज्ञानिक चिंतित हैं।
युवाओं को यह बात समझाना आसान नहीं है। क्या आज की पीढ़ी पहले से अलग है? क्या तकनीक ने इसे और कठिन बना दिया है, या अभी भी कोई उम्मीद बाकी है?
एक तरह का भ्रम फैलाया गया है कि आज की पीढ़ी बाकी पीढ़ियों से बहुत अलग है। सच यह है कि हर पीढ़ी अपने समय के कारण कुछ अलग होती है। 100 साल पहले की पीढ़ी भी अपने समय में अलग थी। आज की पीढ़ी उससे अलग है, लेकिन दोनों के बीच कोई सदियों का अंतर नहीं है। हमसे पहले की पीढ़ी ने मोबाइल का इस्तेमाल बुढ़ापे में शुरू किया, क्योंकि उस समय मोबाइल था ही नहीं। आज बाजार और तकनीक बहुत तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में पांच अलग-अलग पीढ़ियों की बात करना कितना तर्कसंगत है?
बूमर, जेन-जी और जेन-अल्फा जैसी पहचानें न जैविक हैं, न वैज्ञानिक और न सांस्कृतिक। यह बाजार द्वारा बनाई गई एक सोच है। इसका उद्देश्य परिवार और समाज में विभाजन पैदा करके हर व्यक्ति को अलग उपभोक्ता बनाना है। परिवार के हर सदस्य को अलग उपभोक्ता बनाया जाएगा, तभी बाजार अपने उत्पाद अधिक बेच पाएगा। इसलिए नई पीढ़ी को पिछली पीढ़ी से अलग दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। भारत दुनिया की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है और धर्म-परंपरा का देश है। साथ ही भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में है। यहां 16 से 35 वर्ष की आयु के लोगों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। सोचिए, जिस देश में इतनी बड़ी युवा आबादी हो, अगर वह अपनी संस्कृति, परंपरा और विरासत को पहचानकर उसके उत्तराधिकारी के रूप में खड़ी हो जाए, तो दुनिया में भारत के सामने कौन टिक सकता है? इसलिए चिंता यह है कि इस पूरी पीढ़ी को उसकी जड़ों और उत्तराधिकार की परंपरा से काटकर एक अलग पीढ़ी के रूप में स्थापित करने का प्रयास हो रहा है।

मोबाइल का दोष नहीं है, दोष हमारा है। स्मार्टफोन तो स्मार्ट है, लेकिन क्या हम भी स्मार्ट हैं? आखिर स्मार्टनेस की असली परिभाषा क्या है?
मैं मानता हूं कि स्मार्टनेस का अर्थ अपने व्यवहार को खुद समझना और नियंत्रित करना है। स्मार्ट मशीन वह होती है जिसे चलाने के लिए ऑपरेटर की बहुत कम जरूरत पड़ती है। वह अपनी गलती खुद पहचान लेती है और खुद को रोक लेती है। जैसे स्मार्ट प्रिंटर में प्रिंटिंग ठीक न हो तो वह अपने आप रुक जाता है। स्मार्टफोन की बैटरी कम होने पर वह कैमरे की लाइट बंद कर देता है, ताकि आपात स्थिति में फोन किया जा सके। बिना सिम के भी वह इमरजेंसी कॉल की सुविधा देता है। यानी स्मार्ट मशीन वही है जो खुद को प्रबंधित करना जानती है। यह समय, परिणाम या जोखिम-किसी भी स्तर पर हो सकता है। अब हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम भी स्मार्ट हैं? आज हम मशीनों पर बहुत अधिक निर्भर होने लगे हैं। क्या हमने अपने बच्चों की स्मार्टनेस उनसे छीन ली है? मुझे लगता है कि हमने ऐसा किया है। हम उन्हें अपने निर्णय खुद लेने और अपनी गलतियां पहचानने के लिए पर्याप्त तैयार नहीं कर पाए। यदि कोई बच्चा देर तक फोन चलाता रहता है और यह नहीं समझ पाता कि इससे उसका नुकसान हो रहा है, तो यह केवल उसकी गलती
नहीं है। इसका अर्थ है कि हमने उसे खुद को नियंत्रित करना सिखाया ही नहीं।

Topics: स्मार्टनेसतीर्थाटनसंस्कार और संस्कृतिआचार्य मिथिलेषनंदिनी शरणधर्म और अध्यात्मसंत की भूमिकालोक कल्याणआत्मानुशासनपाञ्चजन्यसेकुलारिज्मपर्यटनरील्स बनाम साधनासुशासन संवादएआई और तकनीकपाञ्चजन्य विशेष
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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