सुशासन केवल सरकार के काम करने की पद्धति का नाम नहीं है। उसका वास्तविक अर्थ तब है, जब नीतियां समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में बदलाव लाएं और नागरिक अधिकार व कर्तव्य, दोनों के प्रति सजग हों।
13 अगस्त, 2026 को जयपुर के हयात रीजेंसी में ‘पाञ्चजन्य सुशासन संवाद-राजस्थान’ ने इसी भारतीय अवधारणा को केंद्र में रखा। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि विकास अपनी जड़ों-संस्कृति, राष्ट्रभाव और कर्तव्य से कटकर अधूरा है। खनिज, सौर ऊर्जा, हस्तशिल्प और वस्त्र जैसे संसाधनों के बावजूद युवाओं को संस्कारों और परिवार से जुड़े रहना होगा। उनका संदेश था-विकास केवल आंकड़े नहीं, समाज की सामर्थ्य और आत्मविश्वास का विस्तार है।
शिक्षा को रोजगार की संकीर्ण परिधि से निकालकर राष्ट्र-निर्माण से जोड़ना इस संवाद का केंद्रीय आग्रह रहा। शिक्षाविद् अवध ओझा ने कहा कि शिक्षा केवल नौकरी पाने की सीढ़ी न बने, बल्कि ऐसे युवा तैयार करे जो समस्या-समाधान खोजें, उद्यम खड़ा करें और दूसरों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करें। आत्मनिर्भर युवा ही आत्मनिर्भर समाज और अंततः आत्मनिर्भर राष्ट्र की आधारशिला रख सकता है।
आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने पर्यटन, देशाटन और तीर्थाटन के अंतर के जरिए भारतीय जीवन-दृष्टि का एक और आयाम रखा। उन्होंने कहा कि आधुनिक पर्यटन अनुभव-मनोरंजन तक सीमित हो सकता है, जबकि भारतीय परंपरा में यात्रा आत्मबोध, आस्था और सांस्कृतिक संवाद का माध्यम रही है। अतः तीर्थ केवल स्थान नहीं, सभ्यता और आध्यात्म से जोड़ने वाला अनुभव है।
सुशासन का अर्थ अपने अतीत के प्रति सजग रहना भी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मुकुल कानिटकर ने ‘विभाजन की विभीषिका’ पर चर्चा करते हुए कहा कि 1947 को केवल नई सीमाओं की घटना मानने से आगे बढ़कर विभाजन के मानवीय, सामाजिक और सांस्कृतिक आघात को समझना और उस इतिहास को विस्मृति से बचाना जरूरी है। जो समाज अपने इतिहास के दुख और सबक भूल जाता है, वह भविष्य के प्रति पर्याप्त सजग नहीं रह सकता।
अंत में, पद्मश्री बेगम बतूल की मांड और भजन की प्रस्तुति ने यह याद दिलाया कि सुशासन की चर्चा समाज की सांस्कृतिक आत्मा से अलग नहीं हो सकती। लोकगीत, लोकभाषा, परंपरा और आस्था केवल विरासत नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली जीवंत शक्तियां हैं।
‘पाञ्चजन्य सुशासन संवाद-राजस्थान’ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही रही कि इसने सुशासन को फाइलों, योजनाओं और सरकारी कार्यालयों की चारदीवारी से बाहर निकालकर विकास, शिक्षा, युवा, इतिहास, आस्था, संस्कृति और राष्ट्र-निर्माण के व्यापक भारतीय संदर्भ में रखा। इसका स्पष्ट संदेश है कि भारत में सुशासन का अंतिम लक्ष्य केवल बेहतर शासन नहीं, बल्कि सक्षम नागरिक, संस्कारित समाज और समर्थ राष्ट्र का निर्माण होना चाहिए।

















