किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी संप्रभुता, उसके कानून, सामाजिक ताना-बाना, सांस्कृतिक पहचान और अपने नागरिकों के लिए नीतियां तय करने का अधिकार उसका अपना होता है, यही संप्रभुता की गारंटी है। ऐसे में जब कोई विदेशी संस्था किसी देश की आंतरिक नीतियों, कानूनों या सामाजिक संस्थाओं को प्रभावित करने के लिए लगातार अभियान चलाए तो सवाल उठना स्वभाविक है। भारत के संदर्भ में कई वर्षों से यही कार्य अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) करता हुआ नजर आ रहा है। इसमें भी सबसे बड़ी बात यह है कि विपक्ष ऐसे मामलों पर राजनीति कर देश के आम लोगों को कथित रूप से गुमराह करने में जुट जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) की भारत को लेकर सक्रियता इसी संदर्भ में लगातार चर्चा में रहती आ रही है, अब जब 20 अगस्त 2026 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत की अमेरिका यात्रा प्रस्तावित है, तब उसने एक बार फिर खुलकर जहर उगला है। उसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है, जबकि USCIRF की भारत संबंधी टिप्पणियों को लेकर नई दिल्ली पहले भी तीखी आपत्ति दर्ज कराती रही है।
Chair @DrMahmood40: “India’s PM Modi is a member of the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS), an Indian umbrella organization whose sub-groups have perpetrated attacks on religious minorities, incl. Christians & Muslims. Now the RSS leader, Mohan Bhagwat, plans to visit the U.S."
— USCIRF (@USCIRF) August 19, 2026
यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से ही अपनी प्रतिक्रिया को तीखा किया है और भारत के खिलाफ नकारात्मक टिप्पणियां करते हुए उसे “विशेष चिंता का देश” (Country of Particular Concern – CPC) घोषित करने की सिफारिश की है।
हालांकि इससे पहले भी वह भारत को लेकर लगातार नकारात्मक टिप्पणियां करता रहा है और बीच-बीच में भारत को ‘वॉच लिस्ट’ में डालता रहा है, लेकिन मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद तो यह बहुत आक्रामक नजर आया है। जिसमें कि इसका भारत के खिलाफ सबसे कड़ा और लगातार नकारात्मक रुख साल 2020 से शुरू हुआ है, जो अब तक (2026) जारी है। सीएए (CAA), एनआरसी (NRC) और हाल के वर्षों के घटनाक्रमों के बाद से आयोग लगातार भारत को ब्लैकलिस्ट करने की जिद पर अड़ा हुआ है।
USCIRF की संरचना और उसके कथित वैचारिक झुकाव पर सवाल
USCIRF स्वयं को एक स्वतंत्र और निष्पक्ष अमेरिकी सलाहकार निकाय के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन इसकी संरचना, नियुक्तियों और विभिन्न सदस्यों की वैचारिक पृष्ठभूमि को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। भारत के संदर्भ में आयोग की रिपोर्टिंग कई बार एकतरफा दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है और भारत के सामाजिक एवं संवैधानिक संदर्भ को पर्याप्त रूप से नहीं देखती।
आयोग के अध्यक्ष आसिफ महमूद की पृष्ठभूमि को लेकर भी भारतीय कूटनीतिक और विश्लेषक हलकों में सवाल उठे हैं। उनके पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी होने के कारण से भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़े उनके दृष्टिकोण में भारत-पाकिस्तान संबंधों की जटिलताओं का प्रभाव दिखाई देता है। विशेष रूप से सरसंघचालक की प्रस्तावित अमेरिका यात्रा के ठीक पहले सामने आया उनका आक्रामक रुख इस बहस को और तीखा करता है।
USCIRF के नौ कमिश्नरों की नियुक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति तथा कांग्रेस के दोनों सदनों के नेतृत्व द्वारा की जाती रही है। आयोग की संरचना को लेकर एक अन्य बहस अमेरिका के प्रभावशाली रूढ़िवादी और इवेंजलिकल समूहों की भूमिका को लेकर भी रही है। आयोग में कई ऐसे कमिश्नर और सदस्य शामिल रहे हैं जो अमेरिका के रूढ़िवादी या इवेंजलिकल चर्च समूहों से जुड़े रहे हैं, जिनका मुख्य एजेंडा वैश्विक स्तर पर ईसाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों के नाम पर अपनी नीतियों को आगे बढ़ाना होता है। ऐसे समूह रिलीजन प्रचार और ईसाई मतांतरण के मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं और जब भारत जैसे देश विदेशी फंडिंग तथा जबरन या धोखाधड़ी से होने वाले धर्मांतरण पर नियंत्रण के लिए कानूनी कदम उठाते हैं, तो उनके हित प्रभावित होते हैं।
भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि USCIRF पूरी तरह से “चुनिंदा स्रोतों और वैचारिक नैरेटिव (Ideological Narratives)” पर भरोसा करता है। भारतीय विचारकों के अनुसार, ये ‘वैचारिक नैरेटिव’ और कुछ नहीं बल्कि भारत-विरोधी और धार्मिक लॉबिंग समूहों (जिसमें इवेंजलिकल ताकतें भी शामिल हैं) द्वारा तैयार किया गया एजेंडा है।
श्री मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा और टाइमिंग की राजनीति
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष पूर्ण कर चुका है। ऐसे समय में श्री मोहन भागवत का 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क में आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशंस’ में शामिल होना भारतीय प्रवासी समाज के बीच महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक संदेश रखता है। अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक संगठनों से जुड़े हुए हैं। ऐसे आयोजन वैश्विक भारतीय समुदाय के भीतर भारत की सांस्कृतिक पहचान और संघ के विचारों को लेकर संवाद का अवसर भी प्रदान करते हैं।
इसी पृष्ठभूमि में यात्रा से ठीक पहले USCIRF की ओर से प्रतिबंध की मांग करना एक तरह की ‘प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक’ है। भारत में कई लोग ये मान रहे हैं कि इसका उद्देश्य यात्रा के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव को सीमित करने के साथ-साथ अमेरिकी प्रशासन, थिंक-टैंक और नागरिक समाज के बीच संघ को लेकर नकारात्मक धारणा तैयार करना हो सकता है। दूसरी ओर, इस पूरे विवाद के बीच अमेरिका और कनाडा के 100 से अधिक स्थानीय हिंदू तथा भारतीय-अमेरिकी नागरिक संगठनों द्वारा यात्रा के समर्थन का दावा यह संकेत देता है कि प्रवासी भारतीय समुदाय ने USCIRF को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है।
FCRA को लेकर भी नाराज है USCIRF
भारत में विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम यानी FCRA लंबे समय से विदेशी धन प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों की गतिविधियों को नियंत्रित करने का प्रमुख कानूनी माध्यम रहा है। सरकार द्वारा इसके प्रावधानों को कठोर बनाए जाने के बाद विदेशी फंडिंग के इस्तेमाल, प्रशासनिक खर्च और धन के हस्तांतरण पर निगरानी बढ़ी है।इसके बाद बड़ी संख्या में ऐसे NGOs के FCRA लाइसेंस रद्द हुए या उनके नवीनीकरण पर रोक लगी, जिनकी गतिविधियों और वित्तीय लेन-देन को लेकर सरकार ने आपत्तियां दर्ज कीं।
Compassion International जैसी अमेरिकी ईसाई संस्था की भारत में गतिविधियों पर भी कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई हुई। जिसके चलते विदेशी धार्मिक संस्थाओं और उनसे जुड़े हित समूहों पर बढ़ी निगरानी ने भारत के खिलाफ अमेरिकी लॉबिंग को तेज किया है। इसी संदर्भ में USCIRF की रिपोर्टों और बयानों को देखने पर यह बहस उठती है कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न कहीं विदेशी फंडिंग और धार्मिक प्रचार के हितों से भी जुड़ जाता है।
कन्वर्जन विरोधी कानूनों पर विवाद
भारत के कई राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश सहित ने जबरन, धोखाधड़ी या प्रलोभन के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए कानून बनाए हैं। इन कानूनों का संवैधानिक संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। 1977 के रेवरेंड स्टेनिस्लॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म का प्रचार करने का अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति को बलपूर्वक धर्मांतरित करने के अधिकार के समान नहीं है। यही न्यायिक दृष्टिकोण धर्मांतरण को लेकर भारत में होने वाली कानूनी बहस का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है।
इसके बावजूद USCIRF अपनी रिपोर्टों में भारत के इन कानूनों को धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरा और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध इस्तेमाल होने वाला कानून बताता रहा है। क्योंकि पश्चिमी इवेंजलिकल समूहों के लिए भारत के कठोर धर्मांतरण कानून उनके धार्मिक प्रचार और मतांतरण की गतिविधियों के लिए एक बड़ी कानूनी बाधा हैं और इसी कारण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इनके खिलाफ दबाव बनाया जाता रहा है।
यहां अमेरिकी दोहरे मानदंड का प्रश्न भी उठता है। अमेरिका स्वयं विदेशी राजनीतिक प्रभाव और विदेशी एजेंटों की गतिविधियों पर निगरानी के लिए Foreign Agents Registration Act यानी FARA जैसे कानून लागू करता है। ऐसे में भारत द्वारा विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए FCRA को कठोर बनाना या जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए राज्य स्तर पर कानून बनाना अपने आप में लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध कैसे हो सकता है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक सदी से भी अधिक पुराना संगठन है जिसकी जड़ें सेवा, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण में निहित हैं। बेशक, अमेरिकी प्रणाली के अंतर्गत वहां के किसी भी आयोग को सिफारिशें करने का पूरा अधिकार है, लेकिन वह ईमानदार, नीतिगत और न्यायप्रिय होना चाहिए।
ऐसा नहीं होना चाहिए कि यूएससीआईआरएफ को संयुक्त राज्य अमेरिका में हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ और हमले दिखाई नहीं दें, जो यह कर रहे हैं, उनको कानूनी तौर पर सख्त सजा मिले, इसके लिए वह कोई प्रयास करता हुआ न दिखे, लेकिन वहीं वह भारत को चुनिंदा रूप से निशाना बनाने बार-बार आगे आ जाए। अमेरिका में भारतीय प्रवासी समुदाय के सदस्यों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता और धमकी के बाद भी चुप रहने का काम करता हुआ जो यह यूएससीआईआरएफ दिखाई दे रहा है, यह वास्तव में अमेरिका के लोकतंत्र के लिए भी बेहद खतरनाक है।
आप सोच सकते हैं कि संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भगवत अभी तक अमेरिका नहीं पहुंचे हैं। उनसे कौन मिलेगा और उनके नेतृत्व वाले संगठन का मूल्यांकन कौन करेगा, इस पर बहस पहले ही शुरू हो चुकी है। यूएससीआईआरएफ नैरेटिव बना रहा है, USCIRF ने महमूद और मिल्स की टिप्पणियों को प्रकाशित किया है। “अध्यक्ष @DrMahmood40: ‘भारत के प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सदस्य हैं, जो एक भारतीय संगठन है जिसके उपसमूहों ने ईसाई और मुस्लिम सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले किए हैं। अब RSS नेता मोहन भगवत अमेरिका की यात्रा की योजना बना रहे हैं।’”
एक अन्य पोस्ट में, यूएससीआईआरएफ ने लिखा, “कमिश्नर @जीन_मिल्स: ‘आरएसएस नेताओं को, भले ही वे भारतीय सरकार से संबद्ध हों, उच्च स्तरीय बैठकों या राजनयिक शिष्टाचारों से सम्मानित नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय, अमेरिकी सरकार को उन आरएसएस सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो अधिकार क्षेत्र के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार पाए जाते हैं।’” निश्चित ही ये धूर्तता की पराकाष्ठा है, जिस पर भारत सरकार को भी सख्त जवाब देना चाहिए।
During congressional hearings following the revocation of Jammu & Kashmir's special status, much of the focus was on allegations of human rights violations, restrictions on media, and the lack of independent access in Indian-administered Kashmir.
Today, serious concerns are also…— Dr. Asif Mahmood (@DrMahmood40) August 1, 2026
यहां पाकिस्तानी मूल के यूएससीआईआरएफ अध्यक्ष डॉ. आसिफ महमूद की निकृष्टता की हद यहां तक देख सकते हैं कि उन्होंने अपने एक्स सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर इस अगस्त माह की एक तारीख को जम्मू-कश्मीर को लेकर भी भारत सरकार को घेरा है और तमाम आरोप लगाए हैं। जोकि सच नहीं हैं।

















