विभाजन की विभीषिका : सत्ता के लिए अखंडता की बलि
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होम भारत

विभाजन की विभीषिका : सत्ता के लिए अखंडता की बलि

भारत का विभाजन केवल दो राजनीतिक पक्षों के टकराव का परिणाम नहीं था। सत्ता हस्तांतरण के दौर में लिए गए कुछ निर्णय, नेतृत्व की प्राथमिकताएं और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी उस त्रासदी की दिशा तय कर रही थीं, जिसकी परिणति 1947 में देश के विभाजन के रूप में हुई

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी
Aug 20, 2026, 09:49 am IST
inभारत
बंटवारे के दाैरान भारत की सीमा की ओर बढ़ते हिदू शरणार्थी

बंटवारे के दाैरान भारत की सीमा की ओर बढ़ते हिदू शरणार्थी

15 अगस्त 1947 की उस ऐतिहासिक मध्यरात्रि को, जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था और लाल किले की प्राचीर से ‘नियति से साक्षात्कार’ का दंभ भरा जा रहा था, ठीक उसी समय पंजाब और बंगाल की सीमाओं पर लाखों बेगुनाह इंसान अपनों के ही खून में तर-बतर हो रहे थे। स्वतंत्रता का वह उजाला सदियों पुरानी अखंड सांस्कृतिक पहचान की चिता पर उगा था। आज जब आप इस 15 अगस्त को तिरंगा फहराते हुए आजादी का उत्सव मना रहे होंगे, तो एक कसक और एक तीखा सवाल आपके मन को ज़रूर झकझोरेगा-आखिर भारत माता के टुकड़े क्यों हुए ? क्या ये विभाजन टाला जा सकता था? क्या अखंड भारत का यह अंग-भंग सचमुच अपरिहार्य था? या फिर यह महज सत्ता के भूखे और ढलती उम्र के थके हुए कुछ राजनेताओं की राजनीतिक आतुरता का परिणाम था?

इतिहास की किताबों में अक्सर इस महात्रासदी को केवल ‘अंग्रेजों की चाल’ और ‘जिन्ना की हठधर्मिता’ का नाम देकर दबा दिया गया, लेकिन इतिहास के वे पन्ने, जिन्हें दशकों तक राजनीति के तहखानों में दफन रखा गया, एक बिल्कुल अलग और कड़वी सच्चाई कहते हैं। जब हम उन पन्नों को पलटते हैं, तो चेहरा किसी और का नहीं, बल्कि आजाद भरत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का उभरता है। उनकी सत्ता-केंद्रीकरण की जिद, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और जिन्ना के साथ सत्ता न बांटने की अड़चन ने सदियों पुरानी अखंडता की बलि चढ़ा दी।

साम्यवाद और धर्मनिरपेक्षता के आवरण में ढकी नेहरू की राजनीतिक सोच ने कई ऐसे ऐतिहासिक अवसर गंवाए, जहां
भारत के अखंड अस्तित्व को बचाया जा सकता था। मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. राममनोहर लोहिया, एच.वी. शेषाद्री और वीर सावरकर जैसे समकालीन नेताओं व विचारकों के साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि नेहरू की नीतियों ने किस प्रकार विभाजन की राह को सुगम बनाया।

सत्ता न बांटने की जिद

विभाजन के वैचारिक बीज 1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद ही बो दिए गए थे। इन चुनावों में संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में कांग्रेस को भारी जीत मिली। चुनाव से पूर्व कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच एक साझा सरकार बनाने की अनौपचारिक सहमति बनी थी। परंतु चुनाव परिणामों के बाद अपनी प्रचंड सफलता के अहंकार में नेहरू ने मुस्लिम लीग के साथ सत्ता साझा करने से स्पष्ट इंकार कर दिया। नेहरू का रुख यह था कि केवल वही लीगी सदस्य सरकार में शामिल हो सकते हैं जो कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार करेंगे और मुस्लिम लीग को भंग करेंगे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का मानना था कि कांग्रेस न तो लीगी राजनीति का जमीनी मुकाबला कर पा रही है और न ही उसे राजनीतिक रूप से साध पा रही है। डॉ. हेडगेवार ने तभी कह दिया था कि नेहरू की यह ‘अहंकारपूर्ण और अदूरदर्शी रणनीति’ मुस्लिम लीग को और अधिक आक्रामक बनाएगी। उसे अलग-थलग महसूस कराकर कट्टरपंथ की ओर धकेलेगी। इतिहासकार बी. आर. नंदा और एम.ए.एच. इसफहानी के अनुसार- नेहरू के इस कठोर रवैये ने जिन्ना को यह अहसास कराया कि एक एकीकृत भारत में हिंदू बहुसंख्यक कांग्रेस कभी भी मुस्लिम लीग को शासन में बराबर की भागीदार नहीं बनने देगी। इसके बाद ही जिन्ना ने आक्रामक रूप से ‘मुसलमानों के लिए अलग देश’ के विचार को जन-आंदोलन में बदलना शुरू किया।

नेहरू की ऐतिहासिक ‘भूल’

अखंड भारत को बचाने का अंतिम और सबसे व्यवहारिक मौका मई 1946 में आया. तब ‘कैबिनेट मिशन प्लान’ भारत आया था। इस योजना में भारत को एक ऐसा संघ बनाने का प्रस्ताव था, जहां केंद्र के पास केवल रक्षा, विदेश और संचार जैसे विषय होते। जबकि प्रांतों को व्यापक स्वायत्तता दी गई थी। इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसने पाकिस्तान की मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया था। अत्यंत अनिच्छा के बावजूद मोहम्मद अली जिन्ना और मुसलिम लीग ने इस प्लान को स्वीकार कर लिया था। कांग्रेस कार्यसमिति ने भी इसे मंजूरी दे दी थी, लेकिन 10 जुलाई 1946 को बॉम्बे में आयोजित एक प्रेस कान्फ्रेंस में कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने एक ऐसा बयान दिया जिसने पूरे देश का भविष्य बदल दिया। नेहरू ने घोषणा की- “कांग्रेस संविधान सभा में जाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है और वह कैबिनेट मिशन की किसी भी शर्त से बंधी हुई नहीं है।

संविधान सभा में बहुमत के आधार पर कोई भी निर्णय लिया जा सकता है।” इस एक बयान ने कैबिनेट मिशन की पूरी नींव हिला दी, जिन्ना को लगा कि अंग्रेजों के जाते ही नेहरू अपने बहुमत के बल पर प्रांतीय स्वायत्तता के वादों को निरस्त कर देंगे। अब यह बड़बोलापन था या कैबिनेट मिशन को पटरी से उतारने की कोशिश, इस पर बहस हो सकती है। नेहरू के यह घोषणा करते ही जिन्ना बिदक गए। जिन्ना ने कैबिनेट मिशन में अपनी सहमति वापस ले ली. 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का आह्वान किया. इसके बाद कलकत्ता, नोआखली और पंजाब में जो भयानक दंगे हुए, उनमें हिंदुओं का नरसंहार हुआ।

नेहरू की इन गलतियों को जिन्ना ने खूब भुनाया। मुसलमानों को भी इन दलीलों में दम लगा और वे कांग्रेस से छिटककर पूरी तरह मुस्लिम लीग के पाले में चले गए। जब 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग से सत्ता बांटने से इंकार किया, तो जिन्ना ने 1937 के लखनऊ अधिवेशन में इसे बहुमत (यानी हिंदू) की तानाशाही करार दिया। जिन्ना ने कहा, ‘’कांग्रेस का यह सोचना कि वे मुसलमानों को कुचल सकते हैं, उनकी सबसे बड़ी भूल है। कांग्रेस केवल हिंदू बहुमत के बल पर पूरे भारत पर अपना एकछत्र राज स्थापित करना चाहती है। उनके लिए लोकतंत्र का मतलब केवल ‘बहुमत की तानाशाही’ है।’’

कैबिनेट मिशन के विषय में नेहरू के बयान के बाद मुस्लिम लीग के तेवर बहुत तीखे हो गए। आल इंडिया मुस्लिम लीग काउंसिल में 29 जुलाई 1946 को जिन्ना ने कहा, नेहरू के बयान ने कैबिनेट मिशन की पूरी योजना को ध्वस्त कर दिया है। अब यह साबित हो गया है कि जब अंग्रेज चले जाएंगे, तो कांग्रेस अपने बहुमत के जोर पर संविधान सभा में मुस्लिम बहुल प्रांतों के अधिकारों को खत्म कर देगी। हमने कैबिनेट मिशन स्वीकार करके शांति का रास्ता अपनाया था, लेकिन नेहरू के अहंकार ने हमें धक्का देकर बाहर कर दिया है।

इतिहास नहीं करेगा माफ

स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस का मुस्लिम चेहरा माने जाने वाले मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ में नेहरू की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए हैं। मौलाना आजाद की इस किताब के 30 पन्नों को तीस साल तक गुप्त रखा गया। कथित रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चैंपियन नेहरू पर सवाल उठाने की छूट किसी को नहीं थी। इन पन्नों पर मौलाना आजाद ने लिखा है, “10 जुलाई 1946 की प्रेस कान्फ्रेंस में जवाहरलाल नेहरू का वो बयान इतिहास की उन सबसे बड़ी गलतियों में से एक था। इसने विभाजन की प्रक्रिया को गति दी। अगर नेहरू ने वह बयान न दिया होता, तो कैबिनेट मिशन सफल हो सकता था और भारत अखंड रहता।” मौलाना ने लिखा- “नेहरू एक केंद्र की अपार शक्तियों से लैस सरकार के प्रधानमंत्री बनने के लिए इतने उत्सुक थे कि वे एक कम संघीय नियंत्रण वाले अखंड भारत के लिए तैयार ही नहीं हुए। इसकी जगह वह एक विभाजित लेकिन अपनी पूर्ण सत्ता वाले भारत को चुनने के लिए तुरंत तैयार हो गए।”

एच.वी. शेषाद्री का विश्लेषण

संघ के वरिष्ठ विचारक एच.वी. शेषाद्री ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘द ट्रैजिक स्टोरी ऑफ पार्टिशन’ में दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ नेहरू के नेतृत्व की प्राथमिकताओं का गंभीर विश्लेषण किया है। उन्होंने लिखा है कि 1946-47 तक आते-आते नेहरू जिन्ना की हिंसक धमकियों के आगे मानसिक रूप से टूट चुके थे। उन्होंने संघर्ष करने और राष्ट्रीय अखंडता के लिए अडिग रहने के बजाय “हिंसा रोकने के नाम पर शांति का सौदा” किया और मातृभूमि के विभाजन को स्वीकार कर लिया। शेषाद्री ने दस्तावेजों से सिद्ध किया कि नेहरू को लगता था कि यदि कैबिनेट मिशन लागू हुआ, तो प्रांतों को मिली स्वायत्तता के कारण वे भारत में अपना ‘समाजवादी मॉडल’ और ‘केंद्रीकृत योजना’ लागू नहीं कर पाएंगे। एक सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री बनने के सपने के लिए नेहरू ने अखंड भारत के विचार की बलि दे दी।

वीर सावरकर ने चेताया था

अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर विभाजन की पूरी प्रक्रिया के सबसे प्रखर और निरंतर आलोचक थे। वीर सावरकर ने 1930 और 1940 के दशक में ही नेहरू और कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति पर गंभीर चेतावनियां दी थीं। सावरकर का मानना था कि नेहरू की किसी भी कीमत पर मुस्लिम लीग को शांत रखने की नीति ने ही जिन्ना को यह विश्वास दिलाया कि यदि वे हिंसा का सहारा लेंगे, तो कांग्रेस झुक जाएगी. सावरकर ने उसी समय कह दिया था कि कांग्रेस की यह जिद कि लीग की सहमति के बिना स्वतंत्रता नहीं मिल सकती, जिन्ना को वीटो पावर दे रही है।

सावरकर ने कहा कि नेहरू ने माउंटबेटन योजना को स्वीकार करके न सिर्फ भारतभूमि की प्राकृतिक सीमाओं का सौदा किया है, बल्कि ये मातृभूमि का अंग-भंग है। नेहरू एक पंगु अंतरिम सरकार से तंग आ चुके थे और जल्द से जल्द एक ‘संप्रभु’ देश के निर्विरोध प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। सावरकर का तर्क था कि यदि कांग्रेस जिन्ना की शर्तों के आगे झुकने के बजाय बहुसंख्यक आबादी को एकजुट करती, एक व्यक्ति, एक वोट के लोकतांत्रिक सिद्धान्त पर अडिग रहती, तो जिन्ना के पास अलग देश मांगने का कोई नैतिक या राजनीतिक आधार नहीं बचता।

लोहिया, राजाजी और कृपलानी

आजादी का जिस तरह से सौदा हुआ, उसमें नेहरू की इस कार्यशैली की आलोचना केवल राष्ट्रवादी विचारक या मुस्लिम नेताओं ने ही नहीं की। कांग्रेस और समाजवादी पृष्ठभूमि के नेताओं ने भी नेहरू की भूमिका को कटघरे में खड़ा किया। डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक ‘गिल्टी मेन ऑफ इंडियाज पार्टीशन’में लिखा है कि नेहरू की सत्ता पाने की भूख और ढलती उम्र की थकान ने उन्हें अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने पर मजबूर किया। नेहरू की मंडली देश की अखंडता की रक्षा के लिए और अधिक संघर्ष करने का जज्बा खो चुकी थी और वह किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द सत्ता की कुर्सी पर बैठना चाहते थे।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) ने आजादी के बाद स्वीकार किया कि 1937 में प्रांतीय सरकारों के गठन के समय नेहरू द्वारा मुस्लिम लीग को सत्ता से बाहर रखने का निर्णय एक भारी भूल थी। इसी भूल ने जिन्ना को पृथकतावादी राजनीति का मुख्य आधार दिया। आचार्य जे.बी. कृपलानी विभाजन के समय कांग्रेस अध्यक्ष रहे। कृपलानी ने लिखा है कि अंतरिम सरकार (1946-47) में नेहरू का अपने वित्त मंत्री लियाकत अली खान से टकराव रोजाना की बात थी। इससे तंग आकर नेहरू जिन्ना के साथ किसी भी प्रकार के समझौते के बजाय देश के बंटवारे को बेहतर मानने लगे थे।

माउंटबेटन से घनिष्ठता और विभाजन

ब्रिटिश हुकूमत ने मूल रूप से पूर्ण आजादी और सत्ता हस्तांतरण के लिए जून, 1948 की समयसीमा तय की थी, लेकिन तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने इस तारीख को 10 महीने खिसकाकर 15 अगस्त 1947 कर दिया। इस जल्दबाजी का विरोध करने के बजाय सत्ता के लिए आतुर नेहरू ने इसे तोहफे की तरह स्वीकार कर लिया। कई विचारकों का तो ये भी मत है कि इस जल्दबाजी के पीछे मूल रूप से नेहरू की ही प्रेरणा थी।

नेहरू और माउंटबेटन परिवार के बीच रिश्ता बहुत गहरा था और इसी का असर फैसले लेने की प्रक्रिया पर पड़ा। नतीजतन, पंजाब और बंगाल के विभाजन के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ को बुलाया गया। किसी ने नहीं पूछा कि रेडक्लिफ को भारत का भौगोलिक या सांस्कृतिक ज्ञान कितना है। रेडक्लिफ ने इस ज्ञान को जुटाने की जरूरत भी नहीं समझी। मेज पर ही कुछ हफ्ते के अंदर कागजों पर सीमाएं खींच दी गई हैं. इन सीमाओं को भी गुप्त रखा गया और 17 अगस्त 1947 को सार्वजनिक किया गया।

लाखों मौत की जिम्मेदार ये जल्दबाजी

इस बारे में अब कोई दो राय नहीं हैं कि सत्ता लोलुपता ही बंटवारे के नरसंहार के लिए जिम्मेदार है। बंटवारा इतनी जल्दबाजी में हुआ कि दोनों ओर से आबादी के स्थानांतरण की कोई पुख्ता योजना या सुरक्षा व्यवस्था न हो सकी। लाखों लोगों का नरसंहार हुआ। डेढ़ करोड़ लोग अपनी ही जन्मभूमि पर शरणार्थी बन गए। यदि सत्ता का हस्तांतरण जून, 1948 तक योजनाबद्ध तरीके से होता, तो शरणार्थियों को लाने व ले जाने के ज्यादा सुरक्षा प्रबंध किए जा सकते थे।

यदि हम 1947 के विभाजन के घटनाक्रम की तार्किक समीक्षा करते हैं, तो साफ नजर आता है कि ये ऐतिहासिक अनिवार्यता नहीं थी। ये रणनीतिक और वैचारिक, दोनों ही मोर्चों पर विफलता थी। अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति जगजाहिर थी। जिन्ना की कट्टरता और इरादे भी जगजाहिर थे। लेकिन भारत का भावी नेतृत्व संभालने वाले पंडित नेहरू की भूमिका भी कम आत्मघाती नहीं थी।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषTragedy of Partitionआनन-फाननशोरगुलकच्चा रास्ताओढ़नीजैसे-तैसेविभाजन की विभीषिकालाशों से पटे होनाशरणार्थी शिविरबलिसत्ताअखंडता
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