कंजरूर दत्तां कस्बा शकरगढ़ तहसील जिला गुरदासपुर का हिन्दू बाहुल्य इलाका था, परन्तु यह तहसील पाकिस्तान में आने के कारण पिता जी को घर छोड़ना पड़ा। मैं छह साल का था। मैंने अपनी घर की छत से गांवों में घरों को जलते देखा। दानामण्डी में काजी लोग मस्जिद में गुप्त बैठकें करते थे, लेकिन हिंदू समाज बेपरवाह बना रहा। 18 अगस्त को दो घुड़सवारों ने कस्बे में आकर आने वाले खतरे के बारे बताया।
लोग दीवान लखमीचन्द के नेतृत्व में गुरु नानक देव जी के जीवन से जुड़े स्थान करतारपुर साहिब की तरफ चल पड़े, लेकिन वहां कोई नहीं था। जत्थे ने रावी नदी पार कर डेरा बाबा नानक जाना बेहतर समझा। सुरक्षा की दृष्टि से मार्ग का मुआयना करने गए दीवान के बेटे कुलबीर दत्त व नत्थूराम पता चला कि 50 हजार मुसलमानों का जत्था भारत की तरफ से रावी नदी पार कर इधर आने वाला है।
दोनों जत्थों के नदी के पुल पार करने को लेकर बलूच रेजिमेंट व गोरखा रेजिमेंट में टकराव हो गया और दोनों तरफ गोलियां चलने लगीं। बचने के लिए हम खेतों में लेट गए और गोलियां उनके ऊपर से निकल रही थीं। अंत में समझौता होने पर हमारे जत्थे ने पुल पार किया और हमने डेरा बाबा नानक पहुंच कर चैन की सांस ली।
अमृतसर पहुंचने के लिए हम रेलवे स्टेशन पहुंचे जहां बहुत ज्यादा भीड़ थी। इस बीच सेना ने स्टेशन को घेर लिया और यात्रियों को कमरों में बन्द कर दिया। उसी समय वहां से रेलगाड़ी गुजरी जिसमें पाकिस्तान के जस्सर रेलवे स्टेशन पर मारे गए हिन्दू-सिखों की लाशें भरी पड़ी थीं। सेना ने लाशों को नदी में बहा दिया और गाड़ी की सफाई कर अमृतसर की ओर रवाना कर दिया।
22 अगस्त को हम माल गाड़ी की तपती हुई छत पर सवार हो कर अमृतसर पहुंचे, लेकिन वहां हैजा फैला हुआ था। उसके बाद हम बटाला आ गए। पिताजी ने किसी तरह एक खाली पड़े मकान में रहने की व्यवस्था तो कर ली, परन्तु मेरा छोटा भाई रोशन लाल हैजे से चल बसा। हमारे पास पाकिस्तान स्थित कंजरूर कस्बे से लाया हुआ एक खेस था। पिताजी उसे खेस में लपेटकर भाई को श्मशान में दफना आए।















