स्वतंत्रता के साथ एक ऐसा विभाजन भी साथ आया, जिसने उपमहाद्वीप के भूगोल, समाज और अर्थव्यवस्था को स्थायी रूप से बदल दिया। पंजाब के विभाजन की त्रासदी जितनी व्यापक रूप से चर्चित रही, उतनी ही गहरी और दूरगामी समस्या बंगाल के विभाजन ने भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र पर डाली। असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम और आसपास के क्षेत्र, जो पहले पूर्वी बंगाल, बर्मा और शेष भारत से सहज ढंग से जुड़े हुए थे, अचानक एक नई अंतरराष्ट्रीय सीमा पूर्वी पाकिस्तान (बाद में बांग्लादेश) से घिर गए।
पूर्वोत्तर भारत, जो सात राज्यों (असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड और त्रिपुरा अब सिक्किम सहित आठ राज्यों के रूप में गिना जाता है) का समूह है, इस विभाजन का प्रभाव केवल सीमा-रेखा खींचने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने भूमि उपयोग, जनसंख्या संरचना, व्यापारिक मार्गों, सांस्कृतिक जुड़ाव और सुरक्षा परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया। आज, लगभग आठ दशक बाद भी, उस बंटवारे की छाया पूर्वोत्तर भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इस ऐतिहासिक घटनाओं की जड़ें आज की समस्याओं अवैध प्रवास, उग्रवाद, आर्थिक विषमता और सीमा सुरक्षा की चुनौतियों में किस प्रकार गहराई से जमी हुई हैं।
विभाजन की प्रक्रिया
विभाजन की योजना, जिसे माउंटबेटन योजना (3 जून योजना) के नाम से जाना जाता है, में यह तय हुआ था कि बंगाल और पंजाब जैसे मिश्रित-आबादी वाले प्रांतों का विभाजन स्थानीय मतदान के आधार पर होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बंगाल का एक हिस्सा पश्चिम बंगाल के रूप में भारत में जुड़ा, जबकि पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बना और आगे चलकर 1971 में स्वतंत्र बांग्लादेश बना। असम के संदर्भ में स्थिति विशेष रूप से जटिल थी। असम का सिलहट जिला, माउंटबेटन योजना के अंतर्गत एक अलग जनमत संग्रह के दायरे में रखा गया। जुलाई 1947 – परिणामस्वरूप, सिलहट असम से अलग होकर पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बन गया, जबकि करीमगंज उपखंड जैसे क्षेत्रों को रैडक्लिफ आयोग की सीमा-रेखा के आधार पर भारत के साथ रखा गया।
रैडक्लिफ रेखा जिसे सर सिरिल रैडक्लिफ ने मात्र कुछ सप्ताहों में, बिना पर्याप्त भौगोलिक और जनसांख्यिकीय अध्ययन के खींचा, इस रेखा ने बंगाल और भारत की प्राकृतिक भौगोलिक इकाई को छिन्न-भिन्न कर दिया। नदियों, रेल पटरियों, सड़कों और यहां तक कि गांवों के बीच से यह सीमा-रेखा गुजरी, जिससे एक ऐसा भूगोल बना जिसमें आर्थिक और सामाजिक तर्क की जगह राजनीतिक मजबूरी हावी हो गई। इस उतावली और अवैज्ञानिक सीमांकन प्रक्रिया के दुष्परिणाम आने वाले दशकों में पूर्वोत्तर भारत को झेलने पड़े।
यह उल्लेखनीय है कि विभाजन-पूर्व असम, बंगाल की खाड़ी और पूर्वी बंगाल के बंदरगाहों विशेष रूप से चटगांव और नारायणगंज के माध्यम से कोलकाता और शेष विश्व से जुड़ा हुआ था। ब्रह्मपुत्र और सूरमा नदी घाटियों से होकर गुजरने वाले जल-मार्ग तथा असम बंगाल रेलवे पूर्वी बंगाल के भीतर से होकर गुजरते थे। बंटवारे के बाद यह पूरा नेटवर्क एक झटके में एक विदेशी, और बाद में अलग राष्ट्र की सीमाओं के भीतर चला गया।
जनसांख्यिकीय बदलाव के प्रयोग व अवस्था
पंजाब की तरह पूर्वी सीमा पर बड़े पैमाने की हिंसक हलचल तात्कालिक रूप से नहीं हुई, परंतु शरणार्थियों का प्रवाह दशकों तक निरंतर चलता रहा। सांप्रदायिक तनाव, आर्थिक असुरक्षा और बाद में 1950, 1964 और 1971 की सांप्रदायिक व राजनीतिक उथल-पुथल की घटनाओं के कारण पूर्वी पाकिस्तान से लाखों शरणार्थी असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल की ओर पलायन करते रहे। त्रिपुरा में इस प्रवास का प्रभाव सबसे नाटकीय रहा। 1941 की जनगणना में त्रिपुरा की जनजातीय आबादी लगभग साठ प्रतिशत से अधिक थी, परंतु शरणार्थियों के लगातार आगमन के कारण अगले कुछ दशकों में यह अनुपात पूरी तरह उलट गया और बंगाली आबादी बहुसंख्यक हो गई। इस जनसांख्यिकीय परिवर्तन ने त्रिपुरा की मूल जनजातियों में असुरक्षा का कारण बनी।
विभाजन के फलस्वरूप भूमि-बद्ध बन जाने की एक मिथ्या ने जन्म लिया, जो एक भारत से अलग होने का भाव उत्तपन्न कर रहीं थी।, जिसके कारण बाहरी शक्तियों को अपने पैर जमाने की एक वजह मिली और अलगाव की भावना को जन्म दिया। जो आगे चलकर सशस्त्र उग्रवादी आंदोलनों की एक बड़ी वजह बनी।
जब विभाजन की चर्चा पूरे राष्ट्र में बढ़ने लगी तब असम में भी विभाजन के पूर्व से इस प्रकार की नीति लाई जाने लगी, जिससे मुस्लिम जनसंख्या बढ़ सके, ताकि असम को पूर्वी पाकिस्तान में लिया जा सके। उदाहरण के तौर पर देखें तो 1940 के दशक की Grow More Food (अधिक अन्न उपजाओ) नीति – पूर्वी बंगाल से मुस्लिमों को कृषि-श्रमिकों को खेती के लिए बुलाना और भूमि व व्यवस्था प्रदान कराना इस नीति का मूल उद्देश्य था। क्योंकि मुस्लिम लीग का असम को पूर्वी पाकिस्तान में मिलाने का उद्देश्य स्पष्ट था, विभाजन के बाद यह प्रवाह धार्मिक और आर्थिक कारणों से और तेज़ हो गया। पूर्वी बंगाल के मुस्लिम मुख्यतः बराक घाटी और निचले असम में बसे, मुस्लिम प्रवासियों की एक धारा लगातार सीमा पार करती रही। यह प्रक्रिया इतनी संवेदनशील बन गई कि आगे चलकर 1979-1985 के ‘असम आंदोलन’ का प्रमुख आधार ही ‘विदेशी घुसपैठियों’ की पहचान और निष्कासन की मांग बनी।
जनसंख्या के इस बड़े स्थानांतरण ने पूर्वोत्तर के निवासियों, चाहे वे असमिया हों या विभिन्न समुदाय सभी की भाषिक और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित किया। बड़ी संख्या में घुसपैठ होने पर असम में तनाव उत्पन्न हुए, जिसकी परिणति 1960 के दशक के भाषा आंदोलन और बाद में विभिन्न जातीय संघर्षों में हुई। इसी प्रकार त्रिपुरा और मेघालय में भी समुदायों को अपनी सांस्कृतिक पहचान और भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ा।
अंग्रेजों की बड़ी साजिश
ब्रिटिश सरकार की एक बड़ी चाल यह थी कि भारत के विभिन्न भागों को अलग-अलग बाँटने के लिए उन्होंने ‘ग्रुपिंग सिस्टम’ योजना बनाई। उन्होंने यह योजना कांग्रेस के प्रतिनिधियों के सामने रखी। उन्हीं दिनों 6 जुलाई और 7 जुलाई को मुम्बई में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। कांग्रेस ने योजना पर विचार किया और दुःख की बात यह है कि कांग्रेसी नेता ब्रिटिश सरकार की चाल को समझ नहीं पाए और उन्होंने योजना के लिए स्वीकृति दे दी। गोपीनाथ बोरदोलोई इस योजना के सर्वथा विरुद्ध थे। उनका कहना था कि असम के सम्बन्ध में जो भी निर्णय किया जाएगा अथवा उसका जो भी संविधान बनाया जाएगा, उसका पूरा अधिकार केवल असम की विधानसभा और जनता को होगा।
वे अपने इस निर्णय पर डटे रहे। उनकी इसी दूरदर्शिता के कारण असम इस षड़यंत्र का शिकार होने से बच सका। गोपीनाथ बोरदोलोई ने अपने देश के प्रति सच्ची निष्ठा के कारण राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में इतना महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था कि वे इनकी बात मानने को तैयार हुए। इस प्रकार असम भारत का अभिन्न अंग बना रहा। यही कारण है कि भारत और असम के लोग उनके इस महत्त्वपूर्ण कार्य को समझ सके। असम के लोग आज बड़े प्यार से गोपीनाथ बोरदोलोई को शेर-ए-असम के नाम से पुकारते हैं।
विभाजन की विरासत
● नोआखली दंगे (नरसंहार): 10 अक्टूबर 1946 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसीडेंसी (अब बांग्लादेश) के नोआखली और त्रिपुरा क्षेत्रों में हुए थे। यह हिंसक घटना 16 अगस्त 1946 के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ (कलकत्ता नरसंहार) के बाद हुई थी, जिसमें हिंदू समुदाय को मुख्य रूप से निशाना बनाया गया और बड़े पैमाने पर हत्या, लूटपाट व जबरन धर्मांतरण हुआ।
● गुवाहाटी दंगे: मई 1948 में गुवाहाटी और आसपास के क्षेत्रों में हुए 1948 गुवाहाटी दंगे मुख्य रूप से बंगाली हिंदुओं, विशेषकर बंगाल और असम रेलवे के कर्मचारियों और व्यापारियों को निशाना बनाकर किए गए थे। यह हिंसा असमिया राष्ट्रवादियों और स्थानीय तनावों के कारण भड़की थी।
● चटगांव दंगे (वर्तमान बांग्लादेश में): फजलुल कादर चौधरी द्वारा दंगे भड़काए गए और हिंदुओं की सामूहिक हत्या कर दी गई। पहारतली में, हिंदू यात्रियों से भरी एक पूरी ट्रेन का नरसंहार कर दिया गया। मैमनसिंह (Mymensingh) में, भैरब पुल नामक स्थान पर 2000 हिंदुओं का नरसंहार किया गया और यहां तक कि भाग रहे हिंदुओं पर भी बांग्लादेश के किशोरगंज जिले के वर्तमान सरचर रेलवे स्टेशन पर हमला किया गया।
● पूर्वी पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों जैसे ढाका, नोआखाली, राजशाही, मयमनसिंह, जेसोर और सिलहट में भी दंगे भड़क उठे, जिनमें 56 लाख हिंदुओं का नरसंहार हुआ। अकेले सिलहट में 203 गाँव बर्बाद हो गए और 800 से ज़्यादा हिंदू धार्मिक स्थलों को अपवित्र किया गया। 13 फरवरी को नोआखाली में दंगे हुए, जिनमें 45 हिंदू मारे गए और हिंदुओं के 205 घर जलकर राख हो गए। इसके नतीजतन, 5000 हिंदू भागकर त्रिपुरा चले गए। इन दंगों और सामूहिक हत्याओं के परिणामस्वरूप, 2,12,545 हिंदू पूर्वी पाकिस्तान से सिर्फ 11 वर्षों में असम चले गए।
● बड़े पैमाने पर अवैध प्रवास: बंटवारे के समय लगभग 20 लाख लोगों की मौत हुई और 2 करोड़ लोग विस्थापित हुए। लेकिन असम और पूर्वोत्तर में यह पलायन 1981 तक जारी रहा, और वह भी भारी संख्या में।
● जनसंख्या बदलाव: 1971 की लड़ाई, जिसे आमतौर पर बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई कहा जाता है, के कारण बड़ी संख्या में शरणार्थी आए और आबादी के ढांचे में बड़े बदलाव हुए। सिर्फ़ असम की बात करें तो जनगणना रिपोर्ट के अनुसार, 1941 में असम में जनसंख्या घनत्व 85 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था, जबकि भारत में यह 103 था। 1971 में असम की जनसंख्या घनत्व बढ़कर 186 हो गई, जो पूरे भारत के औसत से अधिक थी। पाकिस्तान प्रस्ताव पारित होने से लेकर बांग्लादेश के गठन तक असम की जनसंख्या घनत्व में 118% की वृद्धि हुई।
● आर्थिक प्रभाव: अगर सही प्रकार से देखे तो 1950-51 में असम की प्रति व्यक्ति आय देश की कुल औसत आय से 4.1 प्रतिशत ज़्यादा थी। 1980-81 तक असम की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 27 प्रतिशत कम हो गई। 1998-99 तक यह अंतर बढ़कर 45.5 प्रतिशत हो गया। इस तेज़ी से आई गिरावट की वजह सिर्फ़ एक ही प्रतीत होती है- पारंपरिक आजीविका का खो जाना और घुसपैठ करने वाली आबादी ने धीरे-धीरे उनके पेशों पर कब्ज़ा कर लिया। एक और बड़ी वजह यह थी कि बंटवारे के बाद, यह इलाका सड़क और जलमार्ग, दोनों ही तरह से भौगोलिक रूप से अलग-थलग पड़ गया।
● भूमि-बद्ध बन जाने का भ्रम: विभाजन से पहले पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर असम, भौगोलिक रूप से बंगाल के मैदानी क्षेत्रों से स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ था। पूर्वी बंगाल के निर्माण ने पूर्वोत्तर को शेष भारत से भूमि सीमा व जल मार्ग कम हुएं। रैडक्लिफ रेखा के जल्दबाजी में खींचे जाने के कारण भारत-पूर्वी पाकिस्तान (बाद में बांग्लादेश) सीमा पर अनेक विसंगतियां पैदा हुईं। त्रिपुरा, मेघालय और असम के बड़े हिस्से बांग्लादेश की सीमा से तीन ओर से घिर गए। त्रिपुरा तो लगभग एक ‘प्रायद्वीप’ जैसी स्थिति में आ गया, जिसकी लगभग 84 प्रतिशत सीमा बांग्लादेश से लगती है। इसी प्रकार, कई भारतीय क्षेत्र बांग्लादेशी भूभाग के भीतर और कुछ बांग्लादेशी क्षेत्र भारतीय भूभाग के भीतर भूखंड के रूप में रह गए।
● कृषि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों: विभाजन ने कृषि योग्य भूमि, जल-संसाधनों और वन क्षेत्रों के परंपरागत उपयोग को भी बाधित किया। सूरमा घाटी और बराक घाटी जैसे उपजाऊ क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा सीमा के उस पार चला गया, जबकि भारतीय हिस्से में रह गई भूमि पर शरणार्थियों के अचानक आगमन का दबाव बढ़ गया। नदियों के जल-बंटवारे को लेकर भी नए सिरे से विवाद खड़े हुए, क्योंकि ब्रह्मपुत्र, बराक, कुशियारा जैसी नदियां अब दो संप्रभु देशों से होकर बहने लगीं।
यह बिंदु मात्र ही नहीं कई ऐसे विषय रहे, जिन्होंने बड़े पैमाने पर पुर्वोत्तर भारत को प्रभावित किया- जैसे की रजवाड़ों का बंटवारा, उग्रवाद और अलगाववादी विचार, सीमा सुरक्षा की चुनौतियां, आर्थिक असंतुलन, पहचान और सांस्कृतिक तनाव आदि।
पिछले दशकों में भारत ने ‘लुक ईस्ट’ और बाद में ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के माध्यम से पूर्वोत्तर को दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ जोड़ने और इसकी भौगोलिक अलगाव की समस्या को दूर करने का प्रयास किया है। भारत-बांग्लादेश के बीच हुए ट्रांजिट और मालवहन समझौतों ने चटगांव व मोंगला बंदरगाहों के सीमित उपयोग की अनुमति दी है, जबकि अगरतला-अखौरा जैसे नए रेल संपर्कों ने त्रिपुरा और बांग्लादेश के बीच सीधी कनेक्टिविटी बहाल की है। इसके अतिरिक्त, कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट परियोजना जैसी पहलों के माध्यम से म्यांमार होते हुए मिज़ोरम तक समुद्री और सड़क संपर्क स्थापित करने का प्रयास हो रहा है, ताकि पूर्वोत्तर की सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता कम की जा सके। भूमि सीमा समझौता, सीमा बाड़बंदी, तथा एन्क्लेव विनिमय जैसे कदमों ने सीमा संबंधी कुछ पुरानी विसंगतियों को भी दूर किया है। फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वोत्तर को वास्तव में विभाजन-पूर्व जैसी सहज कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता बनी रहेगी।
1947 का विभाजन केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह पूर्वोत्तर भारत के लिए एक ऐसा भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक भूकंप था जिसके झटके आज, आठ दशक बाद भी, महसूस किए जा सकते हैं। भूमि का बंटवारा, शरणार्थियों का सतत प्रवाह, व्यापारिक मार्गों का टूटना, और शेष भारत से भौगोलिक कटाव इन सभी ने मिलकर पूर्वोत्तर की एक ऐसी विशिष्ट परिस्थिति गढ़ी, जिसे समझे बिना क्षेत्र की वर्तमान चुनौतियों चाहे वह अवैध प्रवास हो, उग्रवाद हो या आर्थिक पिछड़ापन को सही संदर्भ में नहीं समझा जा सकता।

















