‘सवाल करना जरूरी है…’ साबरमती संवाद में हितेश शंकर जी ने युवाओं को बताया संवाद और तर्क-विमर्श का महत्व
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‘सवाल करना जरूरी है…’ साबरमती संवाद में हितेश शंकर जी ने युवाओं को बताया संवाद और तर्क-विमर्श का महत्व

श्री हितेश शंकर जी ने कहा कि जो लोग राष्ट्रीय विचार को कोई पुरानी अवधारणा मानते हैं, वे भारत के वास्तविक विचार और उसकी परंपरा को समझने में चूक करते हैं। भारत में हमेशा से बच्चों से संवाद, सामयिक विषयों पर संवाद और सत्य के संधान का संवाद होता रहा है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Sep 13, 2026, 12:44 pm IST
inगुजरात, पाञ्चजन्य इवेंट
पाञ्चजन्य, संपादक श्री हितेश शंकर जी

पाञ्चजन्य, संपादक श्री हितेश शंकर जी

अहमदाबाद में आज ‘साबरमती संवाद 2026’ का भव्य आगाज हुआ। ‘बात भारत की’ थीम पर आयोजित पाञ्चजन्य के इस प्रतिष्ठित संवाद में देश के विकास, संस्कृति, शिक्षा और राष्ट्रीय चिंतन से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर मंथन हो रहा है। कार्यक्रम का शुभारंभ पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर जी ने दीप प्रज्वलित कर किया। दीप प्रज्वलन के साथ ही भारत के वर्तमान और भविष्य को लेकर विचारों के इस विशेष मंच की शुरुआत हुई। दीप प्रज्वलन के साथ ही परिसर में भारत के वर्तमान और भविष्य से जुड़े गंभीर विमर्श का मंच सज गया है। देश के प्रबुद्धजन, नीति-निर्माता, लेखक, विचारक और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विशिष्ट अतिथि इस संवाद में अपने विचार साझा कर रहे हैं।

‘साबरमती संवाद 2026’ में युवाओं की बड़ी भागीदारी और उनकी सकारात्मक ऊर्जा का उल्लेख करते हुए पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने कहा कि हाल के समय में ‘युवा शक्ति’ के नाम पर अराजकता और उपद्रव के कुछ दृश्य सामाजिक विमर्श और सोशल मीडिया पर देखने को मिले हैं। लेकिन आज यहां मौजूद युवाओं के चेहरे, उनकी उपस्थिति और सकारात्मकता देश के सामने युवा शक्ति की एक अलग तस्वीर प्रस्तुत कर रही है। उन्होंने कहा कि यह अपने आप में अनूठा अवसर है कि विश्वविद्यालयों से संपर्क कर युवाओं का पंजीकरण कराया गया और बड़ी संख्या में युवा स्वेच्छा से इस संवाद का हिस्सा बनने पहुंचे। उन्होंने कहा कि हाल के समय में किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में बिना किसी ‘कैप्टिव ऑडियंस’ के विश्वविद्यालयों से संपर्क कर इतनी बड़ी संख्या में युवाओं का एक साथ जुटना अपने आप में महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रीय विचार कोई पुरानी अवधारणा नहीं

श्री हितेश शंकर जी ने कहा कि जो लोग राष्ट्रीय विचार को कोई पुरानी अवधारणा मानते हैं, वे भारत के वास्तविक विचार और उसकी परंपरा को समझने में चूक करते हैं। भारत में हमेशा से बच्चों से संवाद, सामयिक विषयों पर संवाद और सत्य के संधान का संवाद होता रहा है। उन्होंने कहा कि अगली पीढ़ी कोई अलग दुनिया से नहीं आती। आने वाली पीढ़ी इसी समाज और इसी परंपरा की निरंतरता है। भारत की परंपरा किसी पहचान को इस तरह गढ़ने की नहीं रही है, जिससे अपने ही घर और समाज में संघर्ष पैदा हो। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा संवाद, जिज्ञासा और सत्य की खोज की रही है।

अष्टावक्र की कथा से समझाया प्रश्न और सत्य का महत्व

युवाओं की जिज्ञासा और प्रश्न करने की प्रवृत्ति को समझाने के लिए उन्होंने अष्टावक्र की कथा का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जब अष्टावक्र अपनी माता के गर्भ में थे, तब उनके पिता वेदों का पाठ कर रहे थे। उस समय गर्भस्थ अष्टावक्र ने पाठ में अशुद्धि की ओर संकेत किया। बार-बार टोकने से क्रोधित होकर उनके पिता ने उन्हें शाप दे दिया, जिसके परिणामस्वरूप अष्टावक्र का शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा हो गया। बाद में अष्टावक्र राजा जनक की सभा में पहुंचे। वहां विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ और सत्य का संधान होता था। उनके शरीर को देखकर कुछ लोगों ने उनका उपहास किया। इसके जवाब में अष्टावक्र ने वहां मौजूद लोगों पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यहां विद्वान नहीं, बल्कि चमड़े के व्यापारी बैठे हुए प्रतीत होते हैं। हितेश शंकर जी ने कहा कि इस कथा का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि अष्टावक्र अपने पिता से क्रुद्ध नहीं हुए और न ही राजा जनक से। उन्होंने अपने प्रश्न और सत्य के संधान को प्राथमिकता दी। यही भारतीय परंपरा की विशेषता है।

नचिकेता की कथा भी देती है प्रश्न करने का संदेश

उन्होंने नचिकेता की कथा का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रश्न पूछने की परंपरा बहुत पुरानी है। नचिकेता ने अपने पिता से पूछा था कि यज्ञ में बूढ़ी और अनुपयोगी गायों को दान में देने से क्या पुण्य प्राप्त होगा। जब उनके पिता ने क्रोध में उन्हें मृत्यु को दान देने की बात कह दी, तो नचिकेता यमराज के पास पहुंच गए। हितेश शंकर जी ने कहा कि नचिकेता ने भी अपने प्रश्न से पीछे हटने से इनकार किया। भारतीय परंपरा हमें यह सिखाती है कि हमारे बच्चे जिज्ञासु हों, वे प्रश्न पूछें और समाज उनके प्रश्नों से पीछे न हटे। साथ ही प्रश्न करने के साथ मर्यादा भी बनी रहे। उन्होंने कहा कि अष्टावक्र और नचिकेता की कथाएं यह बताती हैं कि भारतीय परंपरा में जिज्ञासा, प्रश्न और सत्य की खोज का हमेशा सम्मान रहा है। यही पाञ्चजन्य की संवाद परंपरा भी है।

देशभर में संवादों की श्रृंखला, गुजरात का ‘साबरमती संवाद’ मजबूत स्तंभ

पाञ्चजन्य की ओर से देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित किए जा रहे संवाद कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में ‘अहिल्या बाई सुशासन संवाद’, छत्तीसगढ़ में ‘मां दंतेश्वरी संवाद’ और देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न विषयों तथा राष्ट्रीय विभूतियों के नाम पर संवादों की एक पूरी श्रृंखला आयोजित की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस पूरी श्रृंखला में गुजरात का ‘साबरमती संवाद’ एक मजबूत स्तंभ के रूप में खड़ा है। साबरमती संवाद पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है और अपनी यात्रा को लगातार आगे बढ़ा रहा है। हितेश शंकर जी ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि आने वाले समय में राष्ट्रीय विमर्श के बड़े मुद्दे, चाहे उनके लिए कितना भी बड़ा मंच क्यों न सजे, उनमें से कई महत्वपूर्ण विषय और विचार ‘साबरमती संवाद’ जैसे मंचों से निकलकर सामने आएंगे। उन्होंने कहा कि यह संवाद महज एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत के विचार, उसकी परंपरा, युवा शक्ति और भविष्य को लेकर गंभीर विमर्श की एक निरंतर यात्रा है।

Topics: Sabarmati Samvad 2026 Panchjanyaश्री हितेश शंकर जीAhmedabad Today NewsAhmedabad NewsGujarat Newsपाञ्चजन्यSabarmati Samvad
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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