‘विभाजन की विभीषिका’ श्रृंखला में एक और दर्दनाक आपबीती, जो 1947 के विभाजन के दौरान मुल्तान से विस्थापन की भयावह तस्वीर सामने लाती है। गोपाल दास खुराना, चूनेवन, मुल्तान बताते हैं कि जुलाई-अगस्त 1947 में मुल्तान में हालात इतने भयावह हो गए थे कि हर तरफ मौत का डर दिखाई देता था। परिवार ने अपना कीमती सामान घर के एक कमरे में सुरक्षित रखकर उसके दरवाजे पर प्लास्टर करवा दिया और इस उम्मीद में घर छोड़ दिया कि हालात सामान्य होने पर वापस लौटेंगे। लेकिन उन्हें फिर कभी उस घर में लौटने का मौका नहीं मिला। परिवार एक शिविर पहुंचा और वहां से पुलिस की सुरक्षा में मुल्तान रेलवे स्टेशन ले जाया गया। उन्हें बिना छत वाली मालगाड़ी से रवाना किया गया। रास्ते में रात के समय एक स्टेशन पर ट्रेन पर हमला हुआ। अगले दिन वे फाजिल्का पहुंचे और वहां से भिवानी, गुड़गांव होते हुए दिल्ली पहुंचे। यह सिर्फ एक परिवार के पलायन की कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की पीड़ा की याद है, जिन्हें 1947 में अपना घर-बार छोड़कर अनजान रास्तों पर निकलना पड़ा। विभाजन की विभीषिका—घर छूटा, सफर शुरू हुआ और पीछे रह गईं अनगिनत यादें।
















