विभाजन की विभीषिका ने 1947 में केवल देश की सीमाएँ ही नहीं बदलीं, बल्कि सदियों से विकसित भारत की आर्थिक, सामाजिक और व्यापारिक संरचना को भी गहरे तक प्रभावित किया। जिन बंदरगाहों, व्यापारिक मार्गों और शहरों ने अखंड भारत की समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उनमें कराची पोर्ट का स्थान विशेष था।
कराची केवल एक बंदरगाह नहीं था, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की कृषि और व्यापारिक अर्थव्यवस्था को विश्व बाजार से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी था। गेहूँ, कपास, अनाज और अन्य कृषि उत्पाद इसी मार्ग से देश के विभिन्न हिस्सों से निकलकर दुनिया के बाजारों तक पहुँचते थे। 1930-40 के दशक में कराची, बंबई और कलकत्ता के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा बंदरगाह माना जाता था और देश के समुद्री व्यापार में इसकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी थी। लेकिन 1947 के विभाजन ने इस आर्थिक भूगोल को भी दो हिस्सों में बाँट दिया। सिंध और कराची पाकिस्तान का हिस्सा बन गए और भारत ने अपने एक महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक द्वार को खो दिया।

हमने खोया
कराची पोर्ट
1947 से पहले कराची पोर्ट अखंड भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र, विशेषकर पंजाब, सिंध और उत्तर भारत के व्यापार का प्रमुख समुद्री प्रवेश एवं निर्यात केंद्र था।Karachi Port Trust की वार्षिक रिपोर्टों के अनुसार, 1930–40 के दशक में कराची, बंबई और कलकत्ता के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा बंदरगाह था। 1930–40 के दशक में कराची पोर्ट भारत के समुद्री निर्यात का लगभग 15–25% हिस्सा संभालता था। गेहूँ, कपास, अनाज तथा अन्य कृषि उत्पादों का बड़ा भाग इसी बंदरगाह के माध्यम से विश्व के विभिन्न देशों तक पहुँचता था।
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