देश के बड़े महानगरों और शहरों में स्थित निजी अस्पतालों में इलाज कराने वाले को अक्सर भारी-भरकम बिलों की वजह से आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है। इसी समस्या को गंभीरता से लेते हुए संसद की स्वास्थ्य संबंधी स्थायी समिति ने एक बेहद महत्वपूर्ण और राहत देने वाला सुझाव दिया है।
समिति ने केंद्र सरकार से सिफारिश की है कि बड़े शहरों में स्थित प्राइवेट हॉस्पिटल के कमरों का किराया 3-स्टार होटल के कमरे की दर से अधिक नहीं होना चाहिए। समिति का मानना है कि यदि इस नियम को प्राइवेट अस्पतालों के लिए अनिवार्य बना दिया जाए तो आम जनता पर इलाज के दौरान पड़ने वाला आर्थिक बोझ काफी हद तक कम हो जाएगा।
समिति ने क्यों दिया यह सुझाव?
संसदीय समिति ने अलग-अलग निजी अस्पतालों के बिलों की समीक्षा करने के बाद यह कदम उठाया है। समीक्षा में पाया गया कि कई बड़े निजी अस्पतालों में केवल कमरे में रहने का शुल्क ही इतना अधिक होता है कि वह मरीज के पूरे बिल का एक बहुत बड़ा हिस्सा बन जाता है।
समिति ने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि देश में सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने के खर्च के बीच बहुत बड़ा फासला है। जहां सरकारी अस्पताल में मरीज के भर्ती होने का औसतन खर्च 6631 रुपये आता है, वहीं किसी निजी अस्पताल में यही खर्च बढ़कर औसतन 50508 रुपये तक पहुच जाता है।
देश में स्वास्थ्य सेवाओं की महंगाई हर साल 10-13 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। इस वजह से आम नागरिकों पर इलाज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों में सिर्फ 1 दिन के कमरे का किराया 7000 से 11500 रुपये तक वसूला जाता है, जबकि उसी शहर या इलाके के किसी अच्छे 3-स्टार होटल में एक दिन का कमरा 2100-3500 रूपये के बीच आसानी से मिल जाता है।
पहले से ही महंगे मेडिकल प्रोसीजर, दवाओं और टेस्ट्स के बीच कमरे का अनियंत्रित किराया मरीज के परिजनों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। समिति का मानना है कि अस्पतालों के कमरों के किराए की एक अधिकतम सीमा तय होनी चाहिए और इसके लिए 3-स्टार होटल के कमरों की औसत कीमत को एक व्यावहारिक पैमाना बनाया जा सकता है।
कमरे का किराया बढ़ने से कैसे प्रभावित होते हैं अन्य चार्ज?
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया है कि अस्पताल का कमरा केवल रहने की जगह नहीं तय करता बल्कि यह पूरे बिल का आधार बन जाता है। कई निजी अस्पतालों में कमरे की कैटेगरी जनरल वार्ड, ट्विन शेयरिंग, सिंगल प्राइवेट रूम या डीलक्स रूम के हिसाब से अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के रेट बदल जाते हैं। अगर कोई मरीज महंगी श्रेणी का कमरा चुनता है तो डॉक्टर की कंसल्टेशन फीस, नर्सिंग चार्ज, आईसीयू शुल्क और सर्जिकल प्रोसीजर की लागत भी अपने आप बढ़ा दी जाती है।
अगर कमरे का बेस रेंट कंट्रोल कर दिया जाएगा तो उससे जुड़े अन्य मेडिकल चार्जेस भी अपने आप किफायती दायरे में आ जाएंगे। अगर केंद्र सरकार संसदीय समिति की इस सिफारिश को स्वीकार कर लेती है और इसके लिए स्पष्ट नीतियां बनाती है तो इलाज सस्ता होगा। इलाज शुरू कराने से पहले ही मरीज के परिजनों को संभावित खर्च का सटीक अंदाजा लगाने में आसानी होगी। अस्पतालों द्वारा मरीजों से ऐंठे जाने वाले अतिरिक्त पैसों पर रोक लगेगगी।
हालांकि, इस सिफारिश को लागू करने के लिए सरकार को एक मजबूत निगरानी तंत्र बनाना होगा जो यह तय कर सके कि हर शहर के हिसाब से कमरों की सीमा कैसे तय की जाएगी और प्राइवेट हॉस्पिटल इसका पालन कर रहे हैं या नहीं।

















