हम सब रोज UPI से पेमेंट करते हैं—चायवाले से लेकर अमेजन-फ्लिपकार्ट तक। ये पेमेंट मुफ्त लगते हैं। लेकिन असल में मुफ्त नहीं है। बैंक, पेमेंट कंपनियां और सरकार सालों से इसकी लागत उठा रहे हैं। अब संसद में एक नया बिल आया है, जो इस स्थिति को बदलने का रास्ता खोल सकता है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को संसद में कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया। इसमें भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 के सेक्शन 10A में बदलाव का प्रस्ताव है।
अभी तक क्या व्यवस्था थी?
जनवरी 2020 से यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) नहीं लगता। एमडीआर वो फीस है जो दुकानदार या कंपनी बैंकों को देती है, ताकि ट्रांजेक्शन प्रोसेसिंग, सेटलमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत निकल सके। सरकार ने डिजिटल पेमेंट बढ़ाने के लिए इसे जीरो कर दिया था।
कानून में साफ लिखा था कि बैंक या पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर इन तरीकों पर कोई चार्ज नहीं लगा सकते। ये तरीके थे—रुपे डेबिट कार्ड, भीम-यूपीआई और यूपीआई-क्यूआर कोड।
नया बिल क्या बदल रहा है?
नया बिल इस स्थायी छूट को हटा रहा है। अब सरकार नोटिफिकेशन जारी करके तय कर सकेगी कि कौन से इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड्स पर चार्ज नहीं लगेगा और किन पर लग सकता है। मतलब, अभी तुरंत कोई चार्ज नहीं लग रहा। बिल सिर्फ कानूनी ढांचा बदल रहा है। आगे सरकार चाहे तो बड़े मर्चेंट्स पर एमडीआर लगा सकती है।
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किन पर चार्ज लग सकता है?
बात बड़े मर्चेंट्स की है—जिनका सालाना टर्नओवर 50 करोड़ रुपये से ज्यादा हो, जैसे अमेजन, फ्लिपकार्ट। छोटे दुकानदार या आम पर्सन-टू-पर्सन ट्रांसफर पर असर नहीं पड़ने की उम्मीद है। कुछ एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि बड़े मर्चेंट्स पर 0.3 से 0.6 प्रतिशत एमडीआर हो सकता है। कुछ दूसरे अनुमान 0.05 से 0.07 प्रतिशत की बात कर रहे हैं, लेकिन थ्रेशोल्ड थोड़ा कम (1-1.5 करोड़ टर्नओवर) हो सकता है। तुलना के लिए, क्रेडिट कार्ड पर एमडीआर 1-3 प्रतिशत और डेबिट कार्ड पर 0.9 प्रतिशत तक होता है।
एक महत्वपूर्ण बात—यह चार्ज शायद सिर्फ 2,000 रुपये से ऊपर के ट्रांजेक्शन पर लगे। 2025-26 में पर्सन-टू-मर्चेंट यूपीआई पेमेंट्स में सिर्फ 4 प्रतिशत ट्रांजेक्शन 2,000 रुपये से ज्यादा थे, लेकिन वैल्यू में ये दो-तिहाई हिस्सा बनाते थे। कुल यूपीआई ट्रांजेक्शन 24,000 करोड़ से ज्यादा हुए, वैल्यू 314 लाख करोड़ रुपये।
लागत कितनी है?
यूपीआई चलाने में मोबाइल ऐप डेवलपमेंट, कस्टमर सपोर्ट, बैंकों की ऑथराइजेशन-सेटलमेंट, साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड डिटेक्शन, क्लाउड स्टोरेज जैसी कई चीजें शामिल हैं। इंडस्ट्री अनुमान के मुताबिक, सालाना लागत 10,000 से 20,000 करोड़ रुपये तक हो सकती है। सरकार की इंसेंटिव स्कीम (छोटे मर्चेंट्स के लिए 2,000 रुपये तक के ट्रांजेक्शन पर 0.15 प्रतिशत तक सब्सिडी) ने 2021-22 से 2024-25 तक सिर्फ 8,730 करोड़ दिए, जो कुल लागत का करीब 11 प्रतिशत था।

















