प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के 12 वर्ष : बारह बरस की करवट
June 15, 2026
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होम भारत

पाञ्चजन्य विशेष : बारह बरस की करवट

वर्ष 2014 से 2026 तक का कालखंड भारतीय लोकतंत्र, शासन और राष्ट्रीय मानस में आए व्यापक परिवर्तन का साक्षी रहा है। आज जब विकसित भारत 2047 का लक्ष्य सामने है, तब इसे केवल उपलब्धियों के लेखे-जोखे से नहीं, बल्कि उस नींव के रूप में देखा जाना चाहिए जिस पर भविष्य का भारत निर्मित होगा

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jun 14, 2026, 09:13 pm IST
in भारत

26 मई, 2014 की शाम को केवल एक शपथ ग्रहण समारोह कह देना उस क्षण के अर्थ को छोटा कर देना होगा। दिल्ली की गर्म हवा में राष्ट्रपति भवन का प्रांगण उस दिन भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी करवट का साक्षी था। वहां सत्ता बदल रही थी, लेकिन उससे अधिक कुछ और भी बदल रहा था। लंबे समय से जमा जनता की उम्मीदें, व्यवस्था से उपजी थकान, और एक निर्णायक नेतृत्व की प्रतीक्षा उस शाम एक साथ दिखाई दे रही थी।

लोगों के चेहरों पर उत्साह था, लेकिन वह किसी पार्टी की जीत का उत्साह भर नहीं था। उसमें यह भाव था कि देश ने अपने लिए एक नई दिशा चुनी है। भारत में पहले भी सरकारें बदली थीं, लेकिन 2014 का जनादेश कुछ अलग था। यह निराशा से आशा की ओर, अस्थिरता से स्थिरता की ओर, और निर्णयहीनता से निर्णय की ओर बढ़ने का जनादेश था।

उस शाम दो बातें ऐसी थीं, जो मेरी समझ से पहली बार इतनी स्पष्टता के साथ सामने आईं। पहली बात यह थी कि पुराने वायसराय हाउस, यानी आज के राष्ट्रपति भवन ने अपने प्रांगण में हजारों लोगों के बीच ‘भारत माता की जय’ के गगनभेदी नारे सुने। संभवतः इससे पहले राष्ट्रपति भवन ने ऐसा दृश्य नहीं देखा था, जहां सत्ता के औपचारिक केंद्र में जनता की राष्ट्रीय चेतना इस तरह खुलकर व्यक्त हुई हो।

दूसरी बात यह थी कि भारत के नए लोकतांत्रिक अध्याय का श्रीगणेश होते समय भारत के सभी पड़ोसी देशों का नेतृत्व वहां उपस्थित था। दक्षिण एशिया के नेताओं की उपस्थिति ने इस शपथ ग्रहण को केवल घरेलू राजनीतिक घटना नहीं रहने दिया, बल्कि इसे क्षेत्रीय कूटनीति और नए भारत की आत्मविश्वासी शुरुआत का प्रतीक बना दिया। पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी उपस्थित थे। हालांकि उस दिन तेज गर्मी के कारण उनका स्वास्थ्य अचानक कुछ लड़खड़ा गया था।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने बहुत कुछ हासिल किया। लोकतंत्र बचा, संस्थाएं खड़ी हुईं, विज्ञान और अर्थव्यवस्था ने आगे बढ़ना सीखा। फिर भी कहीं न कहीं भारतीय राज्य अपनी पूरी क्षमता से काम करता हुआ दिखाई नहीं देता था। ब्रिटिश प्रशासनिक ढांचे की छाया, परिवारवादी राजनीति, गठबंधन की मजबूरियां, धीमी फाइलें, बिचौलियों की व्यवस्था और निर्णय लेने में झिझक ने भारत की गति को कई बार रोका।

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने इस ठहराव को तोड़ने की कोशिश की थी। सड़क, दूरसंचार, परमाणु आत्मविश्वास और संवाद की राजनीति ने देश को नई दिशा दिखाई। किन्तु वह दौर विशिष्ट होकर भी संख्या और गठबंधन की सीमाओं से बंधा रहा।
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पहली बार जनता की आकांक्षा, राजनीतिक स्थिरता और प्रशासनिक दृढ़ता एक साथ आए। यहीं से पिछले बारह वर्ष की कहानी शुरू होती है।

भारत का जहाज और बारह साल की यात्रा

मुझे लगता है, इस यात्रा को समझने के लिए भारत को हिंद महासागर में आगे बढ़ते एक विशाल जहाज की तरह देखना चाहिए। यह जहाज केवल सरकार का प्रतीक नहीं है। यह भारतीय समाज, राज्य, लोकतंत्र, स्मृति और संकल्प का प्रतीक है। 2014 में जब इस जहाज ने नई दिशा पकड़ी, तब समुद्र शांत नहीं था। आर्थिक चुनौतियां थीं, वैश्विक दबाव थे, आतंकवाद था, सीमा पर तनाव था, महामारी थी, ऊर्जा संकट था, आपूर्ति श्रृंखला टूट रही थी, और भीतर से राजनीतिक प्रतिरोध भी था।

फिर भी यह जहाज रुका नहीं। उसने तूफानों को देखा, दिशा सुधारी, अपनी गति बदली, लेकिन मार्ग नहीं छोड़ा। यही पिछले बारह वर्ष का सबसे बड़ा सार है। भारत ने केवल योजनाएं नहीं बनाईं। उसने राज्य की मानसिकता बदली। पहले भारत कई बार प्रतिक्रिया देने वाला राष्ट्र दिखता था। अब वह पहल करने वाला राष्ट्र दिखता है। पहले वह कई मंचों पर अपनी बात समझाने में संकोच करता था। अब वह अपने हितों की भाषा स्पष्ट रूप से बोलता है। पहले गरीब तक पहुंचना राज्य की कठिनाई थी। अब राज्य डिजिटल साधनों से सीधे नागरिक तक पहुंच रहा है।

2014 का जनादेश : स्थिरता की वापसी

2014 का जनादेश केवल चुनाव परिणाम नहीं था। यह जनता का स्पष्ट संदेश था कि देश को स्थिरता, गति और जवाबदेही चाहिए। भ्रष्टाचार, नीति लकवे और थके हुए शासन से जनता ऊब चुकी थी। नरेंद्र मोदी ने विकास, सुशासन और निर्णायक नेतृत्व की जो भाषा रखी, उसने विशेष रूप से गरीब, युवा, मध्यम वर्ग और आकांक्षी समाज को आकर्षित किया।

‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ उस समय केवल नारा नहीं था। यह शासन के चरित्र में बदलाव का संकेत था। जनता यह देखना चाहती थी कि क्या सरकार योजनाओं की घोषणा से आगे बढ़कर परिणाम दे सकती है। क्या दिल्ली की शक्ति गांव, गरीब, किसान, महिला और युवा तक पहुंच सकती है। यही प्रश्न 2014 के जनादेश की आत्मा था।

जन धन, आधार, मोबाइल और डीबीटी :

गरीब और राज्य की दूरी कम हुई

भारत में गरीब और सरकार के बीच हमेशा दूरी रही। योजनाएं बनती थीं, घोषणाएं होती थीं, बजट भी आता था, लेकिन लाभार्थी तक पहुंचते पहुंचते बहुत कुछ रास्ते में छूट जाता था। जन धन, आधार, मोबाइल और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने इस दूरी को कम किया।
जन धन खातों ने गरीब को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा। आधार ने पहचान को मजबूत किया। मोबाइल ने संवाद को सरल बनाया। डीबीटी ने सहायता को सीधे खाते में पहुंचाया। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं था। यह गरीब नागरिक के प्रति राज्य के व्यवहार में बदलाव था।

पहले गरीब सरकारी दफ्तरों, स्थानीय बिचौलियों और अनिश्चित प्रक्रियाओं पर निर्भर था। अब सहायता सीधे खाते में पहुंचने लगी। यह अंत्योदय की नई प्रशासनिक रीढ़ बनी। इससे कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता आई और राज्य की विश्वसनीयता बढ़ी।

स्वच्छ भारत से जल जीवन मिशन तक: गरिमा का नया अध्याय

स्वच्छ भारत, उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास और जल जीवन मिशन को केवल योजनाओं की सूची की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। इनका सीधा संबंध गरीब परिवारों की गरिमा, स्वास्थ्य और आत्मसम्मान से है। शौचालय का निर्माण केवल निर्माण कार्य नहीं था। यह ग्रामीण महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा विषय था। उज्ज्वला ने धुएं से भरी रसोई में काम करने वाली महिलाओं को राहत दी। प्रधानमंत्री आवास ने कच्चे घरों में रहने वाले परिवारों को स्थायित्व दिया। जल जीवन मिशन ने घर तक नल से जल पहुंचाने की दिशा में बड़ा प्रयास किया।

इन योजनाओं ने यह बताया कि विकास केवल बड़े पुलों और राजमार्गों का नाम नहीं है। विकास वह भी है जब किसी गरीब परिवार के घर में पहली बार गैस चूल्हा आता है, जब बेटी को अंधेरा होने से पहले खुले में शौच जाने की मजबूरी से मुक्ति मिलती है, जब मां को पानी लाने में रोज घंटों नहीं लगाने पड़ते, जब परिवार को अपना पक्का घर मिलता है।

यहीं मोदी शासन की गरीब कल्याण दृष्टि का मानवीय पक्ष दिखाई देता है। यह दया की भाषा नहीं है। यह गरिमा की भाषा है।

डिजिटल इंडिया और यूपीआई: तकनीक आम आदमी के हाथ में

एक समय भारत में तकनीक को शहरी, अंग्रेजी बोलने वाले और संपन्न वर्ग की सुविधा माना जाता था। डिजिटल इंडिया ने इस धारणा को बदला। यूपीआई ने इसे पूरी तरह पलट दिया। आज छोटा दुकानदार, सब्जी बेचने वाला, चायवाला, रिक्शा चालक, छात्र, किसान, गृहिणी और युवा उद्यमी डिजिटल भुगतान से जुड़ चुके हैं। क्यूआर कोड ने बड़े बैंकिंग ढांचे को सड़क किनारे की दुकान तक पहुंचा दिया। यह केवल लेनदेन का परिवर्तन नहीं था। यह आर्थिक व्यवहार का लोकतंत्रीकरण था।

डिजिलॉकर, उमंग, आधार आधारित सेवाएं, ऑनलाइन प्रमाणपत्र, डिजिटल भुगतान, कोविन और सरकारी सेवाओं के ऑनलाइन माध्यमों ने नागरिक और राज्य के संबंध को अधिक सरल बनाया। तकनीक अब केवल सुविधा नहीं रही। वह शासन की भाषा बन गई। भारतीय जहाज का यह नया इंजन था। इसने गति भी दी और भरोसा भी।

जीएसटी, आईबीसी और कर सुधार : अर्थव्यवस्था को नया ढांचा

भारत की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक जटिल कर व्यवस्था, असंगठित ढांचे और धीमी प्रक्रियाओं से जूझती रही। जीएसटी का उद्देश्य भारत को अनेक छोटे आंतरिक बाजारों से एक राष्ट्रीय बाजार में बदलना था। इसका आरंभ आसान नहीं था। इतने बड़े संघीय देश में कर व्यवस्था को एकीकृत करना स्वाभाविक रूप से कठिन था। लेकिन इसका राजनीतिक और आर्थिक महत्व बड़ा था।

दिवाला और दिवालियापन संहिता ने पूंजी और जिम्मेदारी के संबंध को नया अर्थ दिया। पहले ऋ ण लेकर न चुकाने की संस्कृति और वर्षों तक चलने वाले मुकदमे आर्थिक संसाधनों को रोकते थे। आईबीसी ने संदेश दिया कि उद्यमिता का सम्मान होगा, लेकिन वित्तीय अनुशासन भी जरूरी होगा।

कर सुधारों, डिजिटल फाइलिंग, अनुपालन में सरलता और औपचारिक अर्थव्यवस्था के विस्तार ने राज्य और नागरिक के बीच एक नए अनुबंध को जन्म दिया। यह रास्ता अभी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन दिशा स्पष्ट है। भारत अधिक पारदर्शी, संगठित और भविष्यगामी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ा है।

कोविड काल : संकट में राज्य की परीक्षा

कोविड महामारी ने दुनिया की बड़ी-बड़ी व्यवस्थाओं की परीक्षा ली। भारत जैसा विशाल और विविध देश इस संकट से कैसे निपटेगा, इस पर गंभीर सवाल थे। लेकिन भारत ने इस दौर में प्रशासनिक क्षमता, सामाजिक अनुशासन और मानवीय संवेदना का संयोजन दिखाया।

मुफ्त राशन ने करोड़ों परिवारों को खाद्य सुरक्षा दी। वैक्सीन निर्माण और टीकाकरण अभियान ने भारत की वैज्ञानिक और प्रशासनिक क्षमता को सामने रखा। कोविन प्लेटफॉर्म ने दिखाया कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना संकट के समय कितनी उपयोगी हो सकती है। वैक्सीन मैत्री ने भारत को केवल अपने नागरिकों की रक्षा करने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि विश्व के लिए सहायक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया। इस दौर में भारत का जहाज तूफान के बीच था। लेकिन उसने अपने भीतर के यात्रियों को बचाने के साथ-साथ दूसरे जहाजों की ओर भी हाथ बढ़ाया। यही भारत की सभ्यतागत दृष्टि है।

राष्ट्रीय सुरक्षा : जवाब की नई भाषा

राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में पिछले बारह वर्ष में भारत की भाषा बदली है। उरी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक, पुलवामा के बाद बालाकोट और पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर ने यह संदेश दिया कि भारत आतंकवाद को केवल बयानबाजी का विषय नहीं बनाएगा।
यह नीति युद्धोन्माद की नहीं थी। यह संतुलित, सटीक और स्पष्ट जवाब की नीति थी। भारत ने यह बताया कि वह अपने नागरिकों की हत्या को केवल कूटनीतिक पत्राचार में सीमित नहीं करेगा। आतंकवाद और उसे संरक्षण देने वाली संरचनाओं को अब पहले जैसी सुरक्षा नहीं मिलेगी। इस बदलाव का मनोवैज्ञानिक प्रभाव बड़ा है। सैनिक के मनोबल से लेकर नागरिक के आत्मविश्वास तक, यह संदेश गया कि राज्य अपने लोगों की सुरक्षा को सर्वोच्च मानता है।

विदेश नीति : झिझक से रणनीतिक स्वायत्तता तक

भारत की विदेश नीति ने भी पिछले बारह वर्ष में नया आत्मविश्वास पाया है। पुरानी गुटनिरपेक्षता का अपना ऐतिहासिक महत्व था, लेकिन बदलती दुनिया में केवल निष्क्रिय संतुलन पर्याप्त नहीं था। आज भारत बहु संरेखण (अलाइनमेंट) की नीति पर आगे बढ़ रहा है।
भारत अमेरिका से तकनीक और रक्षा सहयोग करता है। रूस से ऊर्जा और रणनीतिक संबंध बनाए रखता है। क्वाड में सक्रिय है। ब्रिक्स में भी अपनी भूमिका निभाता है। वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज बनता है। यूरोप से व्यापार और तकनीकी संवाद करता है। खाड़ी देशों से संबंध मजबूत करता है। अफ्रीका और प्रशांत द्विपीय देशों के साथ भी संपर्क बढ़ाता है। विदेश मंत्री एस.जयशंकर का यूरोप को लेकर दिया गया प्रसिद्ध कथन भारत की नई कूटनीतिक भाषा का प्रतीक बना। उसका सार यह था कि दुनिया अब यूरोप केंद्रित दृष्टि से नहीं चल सकती। भारत अपनी समस्याओं, हितों और प्राथमिकताओं को स्वयं परिभाषित करेगा। यह भाषा न टकराव की थी, न समर्पण की। यह आत्मविश्वासी राष्ट्र की भाषा थी।

रक्षा और आत्मनिर्भर भारत : खरीदार से निर्माता राष्ट्र तक

रक्षा क्षेत्र में भारत लंबे समय तक आयात पर निर्भर रहा। इससे सामरिक स्वायत्तता सीमित होती थी। पिछले वर्षों में स्वदेशी रक्षा उत्पादन, रक्षा निर्यात, आईएनएस विक्रांत, ब्रह्मोस, आकाश, रक्षा स्टार्टअप, आईडेक्स, निजी क्षेत्र की भागीदारी और सीमाई अवसंरचना ने इस क्षेत्र में नया परिवर्तन दिखाया है।

रक्षा निर्यात में तेज वृद्धि और स्वदेशीकरण सूचियों ने यह स्पष्ट किया कि भारत केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता। वह रक्षा निर्माण का केंद्र बनना चाहता है। सीमाओं पर सड़कें, पुल और सुरंगें केवल निर्माण परियोजनाएं नहीं हैं। वे सुरक्षा तैयारी का आधार हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमा पर खड़े सैनिक की बहादुरी से नहीं बनती। वह कारखानों, प्रयोगशालाओं, स्टार्टअप, नीति, बजट और राजनीतिक इच्छाशक्ति से भी बनती है।

अनुच्छेद 370 : लंबित प्रश्नों पर राजनीतिक इच्छाशक्ति

अनुच्छेद 370 भारतीय राज्य की सबसे जटिल और लंबी बहसों में से एक था। 5 अगस्त 2019 को इसे हटाने का निर्णय समर्थकों के लिए राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम था। आलोचकों ने अपने प्रश्न उठाए, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह स्पष्ट था कि भाजपा सरकार कठिन और लंबे समय से लंबित विषयों को टालने के पक्ष में नहीं है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की नई प्रशासनिक संरचना, समान अधिकारों का विस्तार, पंचायतों और स्थानीय लोकतंत्र की सक्रियता, निवेश, कनेक्टिविटी और सुरक्षा व्यवस्था के नए ढांचे ने इस प्रश्न को नए रूप में रखा। यह निर्णय इस बात का संकेत था कि भारतीय राज्य कठिन मुद्दों से बचने के बजाय उनका समाधान खोजने की इच्छा रखता है।

सांस्कृतिक आत्मविश्वास : विकास और विरासत साथ-साथ

आजादी के बाद दशकों तक भारतीय सार्वजनिक जीवन में संस्कृति को या तो निजी आस्था का विषय माना गया या आधुनिकता के विरोध में खड़ा किया गया। पिछले वर्षों में यह दृष्टि बदली है। काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल लोक, अयोध्या का राम मंदिर, केदारनाथ पुनर्विकास, योग का वैश्विक विस्तार, भारतीय भाषाओं का सम्मान, प्राचीन धरोहरों की वापसी और सांस्कृतिक स्थलों का पुनरुद्धार इसी परिवर्तन का हिस्सा हैं। यह अतीत में लौटने की कोशिश नहीं है। यह भविष्य की यात्रा में स्मृति को ऊर्जा बनाने की प्रक्रिया है। एक आधुनिक राष्ट्र अपनी जड़ों से कटकर मजबूत नहीं बनता। वह तभी स्थिर होता है जब उसकी आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक आत्मविश्वास साथ चलते हैं।

इस कालखंड की एक बड़ी विशेषता यही है कि विकास और विरासत को विरोधी नहीं माना गया। आधुनिक अवसंरचना और प्राचीन आस्था, डिजिटल तकनीक और सभ्यतागत स्मृति, वैश्विक मंच और स्थानीय परंपरा, इन सबको साथ रखने की कोशिश हुई है।

विकसित भारत 2047 : उपलब्धियों से आगे भविष्य की दिशा

बारह वर्ष की यात्रा का अंतिम अर्थ उपलब्धियों की सूची में नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ 2047 की दिशा में बने आधार में है। भारत जब विकसित भारत की बात करता है, तो वह केवल जीडीपी या बड़े शहरों की बात नहीं कर रहा। वह ऐसे भारत की बात कर रहा है जहां युवा अवसर पाएं, महिलाएं आर्थिक भागीदारी बढ़ाएं, किसान तकनीक और बाजार से जुड़ें, उद्यमी वैश्विक प्रतिस्पर्धा करें, मध्यम वर्ग अधिक सुरक्षित और सक्षम बने, और गरीब गरिमा के साथ आगे बढ़ें।

स्टार्टअप, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, रक्षा निर्माण, मेट्रो नेटवर्क, एक्सप्रेसवे, पोर्ट, एयरपोर्ट, जलमार्ग, उत्तर पूर्व का विकास, कौशल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ये सब 2047 की नींव के अलग-अलग पत्थर हैं।

भारत आज केवल गरीबी हटाने की भाषा में नहीं सोच रहा। वह समृद्धि बनाने की भाषा में सोच रहा है। यह बड़ा बदलाव है। नीति का केंद्र अब केवल जीवन रक्षा नहीं, बल्कि आकांक्षा है।

विपक्ष और बदलती जनचेतना

इस पूरी यात्रा में विपक्ष की भूमिका पर भी विचार करना जरूरी है। लोकतंत्र में विपक्ष अनिवार्य है। मजबूत विपक्ष शासन को सजग रखता है। लेकिन विपक्ष तभी प्रभावी होता है जब वह जनता की बदलती भाषा को समझे। पिछले वर्षों में विपक्ष कई बार इस समझ में पीछे दिखा। उसने गरीब कल्याण को केवल चुनावी लाभ की दृष्टि से देखा, जबकि लाभार्थी के लिए वह घर, राशन, गैस, पानी और स्वास्थ्य सुरक्षा का अनुभव था। उसने डिजिटल इंडिया को शुरुआती दौर में कमतर आंका, जबकि आम नागरिक ने डिजिटल भुगतान को तुरंत अपनाया। उसने सांस्कृतिक पुनर्जागरण को केवल पहचान की राजनीति कहा, जबकि बड़ी संख्या में लोगों ने इसे सम्मान और आत्मगौरव से जोड़ा।

राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर भी कई बार विपक्ष की भाषा जनता की सहज भावना से दूर दिखाई दी। यह कहना ठीक नहीं होगा कि विपक्ष के सभी प्रश्न निरर्थक हैं। लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है। रोजगार, महंगाई, शिक्षा, कृषि, संघीय संबंध और नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रश्न पूछना विपक्ष का अधिकार भी है और कर्तव्य भी। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब आलोचना वैकल्पिक दृष्टि में नहीं बदलती। केवल नकारात्मकता, क्षणिक नारे और गढ़े हुए आंदोलन स्थायी राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बनाते। आज की जनता विरोध भी सुनती है, लेकिन समाधान अधिक सुनना चाहती है। वह आरोप भी देखती है, लेकिन भरोसा उसी पर करती है जो दिशा दिखाए। यही कारण है कि मोदी नेतृत्व का सामाजिक आधार केवल भावनात्मक नहीं है। उसमें योजनाओं का अनुभव, राष्ट्र सुरक्षा का भरोसा, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और भविष्य की आकांक्षा शामिल है।

चुनौतियां भी हैं, लेकिन दिशा भी है

कोई यह दावा नहीं कर सकता कि भारत की सभी चुनौतियां समाप्त हो गई हैं। रोजगार की गुणवत्ता, कृषि आय की स्थिरता, शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता, शहरों का दबाव, पर्यावरणीय चुनौतियां, न्यायिक देरी, वैश्विक व्यापार की अनिश्चितता और तकनीक से पैदा होने वाली असमानताएं वास्तविक प्रश्न हैं। किन्तु अंतर यह है कि भारत अब इन प्रश्नों के सामने निष्क्रिय नहीं दिखता। वह बड़े पैमाने पर सोचता है। डिजिटल अवसंरचना बनाता है। सड़क, रेल, बंदरगाह और ऊर्जा में निवेश करता है। निजी उद्यम को स्थान देता है। कल्याण को लक्षित वितरण से जोड़ता है। तकनीक को शासन का हिस्सा बनाता है। और सबसे महत्वपूर्ण, वह अपने भविष्य को लेकर संकोच में नहीं दिखता। जहाज अभी मंजिल पर नहीं पहुंचा है। कई लहरें आगे भी आएंगी। लेकिन अब उसके पास दिशा भी है, गति भी है और अपने गंतव्य की स्पष्ट कल्पना भी है।

2047 की ओर बढ़ता आत्मविश्वासी भारत

2014 से 2026 तक की यात्रा भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण करवट है। यह केवल नरेंद्र मोदी या भाजपा की राजनीतिक कहानी नहीं है। यह भारतीय राज्य की कार्य संस्कृति, जनता की आकांक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, गरीब कल्याण, डिजिटल शक्ति, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक भूमिका के पुनर्गठन की कहानी है।

बारह वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री की भाषा में जो आत्मविश्वास दिखाई देता है, वह केवल उपलब्धियों का बखान नहीं है। उसमें अगले चरण का लक्ष्य है। विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत, विश्व बंधु भारत, ऐसा भारत जो अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, ऐसा भारत जो अपने सैनिक को आधुनिक शक्ति दे, ऐसा भारत जो अपने उद्यमी को अवसर दे, ऐसा भारत जो अपनी संस्कृति से संकोच न करे, और ऐसा भारत जो दुनिया से बराबरी की भाषा में बात करे।

भारतीय लोकतंत्र की सुंदरता यही है कि जनता बड़े विमर्शों को अपने अनुभव से परखती है। जिस गरीब ने पहली बार पक्का घर देखा, जिस महिला ने धुएं से मुक्ति पाई, जिस किसान को सीधे खाते में सहायता मिली, जिस दुकानदार ने क्यूआर कोड से भुगतान लेना शुरू किया, जिस युवा ने स्टार्टअप या कौशल से नया रास्ता देखा, जिस सैनिक ने नए उपकरण और स्पष्ट राजनीतिक समर्थन महसूस किया, जिस प्रवासी भारतीय ने विदेश में भारत की बदलती प्रतिष्ठा देखी, उसके लिए ये बारह वर्ष केवल दिल्ली की कहानी नहीं है। ये उसके जीवन में राज्य की नई उपस्थिति की कहानी है।

भारत अब प्रतिक्रियाशील राष्ट्र नहीं रहना चाहता। वह अपना मार्ग स्वयं बनाने वाला आत्मविश्वासी लोकतंत्र बनना चाहता है। यह यात्रा आसान नहीं है, पूर्ण भी नहीं है, लेकिन ऐतिहासिक अवश्य है। हिंद महासागर में आगे बढ़ता भारतीय जहाज अभी भी तूफानों से घिर सकता है, पर उसके पास अब दिशा-सूचक यंत्र भी है, अनुभवी नेतृत्व भी है, करोड़ों नागरिकों की भागीदारी भी है और दूर दिखाई देती 2047 की रोशनी भी है।

गढ़े हुए आंदोलनों का दौर कमजोर पड़ रहा है। भविष्य उस राजनीति का है जो संस्कारों में पगी हो, विकासोन्मुख हो, राष्ट्रहित को केंद्र में रखे और नागरिक की आकांक्षा को शासन की प्राथमिकता बनाए। बारह वर्ष की यह करवट बताती है कि भारत ने केवल सरकार नहीं बदली थी। उसने अपने आत्मविश्वास का नया अध्याय खोला था। यह अध्याय अभी लिखा जा रहा है, और इसकी अगली पंक्तियां विकसित भारत 2047 की मंजिल की ओर बढ़ते हुए भारत के संकल्प, श्रम और राष्ट्रीय चेतना से लिखी जाएंगी।

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हितेश शंकर
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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