आज विभिन्न देशों के बीच भौगोलिक सीमाएं जैसे समाप्त सी होती दिख रही हैं। एक तरह से हम एक वैश्विक गांव में निवास कर रहे हैं। इन परिस्थितियों के बीच एक देश से दूसरे देश में सहायता के रूप में धनराशि को हस्तांतरित करना भी बहुत आसान हो है। धनराशि का हस्तांतरण करने का उद्देश्य सचमुच में यदि छोटे, अविकसित अथवा विकासशील देशों की मदद करना हो तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। परंतु, आज कुछ देश अन्य देशों में राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृति उथल पुथल करने के उद्देश्य से धनराशि का हस्तांतरण करने का प्रयास करने लगे हैं। विशेष रूप से विकसित देश अपनी औपनिवेशिक, विस्तारवादी एवं भूमंडलकारी नीतियों के अंतर्गत इन देशों में गैर सरकारी संस्थाओं (NGO), न्यास एवं सामाजिक संगठनों एवं संस्थानों के माध्यम से अथवा अन्य माध्यमों से भारी मात्रा में धनराशि का हस्तांतरण करते हैं ताकि इन देशों के गरीब नागरिकों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई अथवा मुसलमान बनाया जा सके। हालांकि, धनराशि का हस्तांतरण कुछ अन्य घोषित उद्देश्यों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, धार्मिक, अनुसंधान, मानवीय सेवाओं और आपदा राहत आदि क्षेत्रों में इन देशों की सहायता करने का रहता है। हाल ही में, श्रीलंका, नेपाल, बंगलादेश आदि छोटे विकासशील देशों में सत्ता परिवर्तन करने में भी विदेशी अंशदान की विशेष भूमिका रही है।
विदेशी अंशदान और विभिन्न देशों में कानून
कुछ देशों में जब अन्य देशों द्वारा भेजी जाने वाली राशि का उपयोग धर्म परिवर्तन करने या निर्धारित उद्देश्यों के अतिरिक्त होता हुआ दिखाई देने लगा तो उन्होंने विदेशी अंशदान को नियमित करने के उद्देश्य से कानून बनाने पर विचार किया और कालांतर में इन देशों जैसे कि संयुक्त राज्य अमेरिका (1938), आस्ट्रेलिया (2018), कनाडा (2024), यूनाइटेड किंगडम (2025) में कुछ सख्त कानून बनाए भी गए। यूरोपीय संघ भी वर्तमान में ऐसी ही व्यवस्था को विधिक रूप देने की प्रक्रिया में है। भारत भी इससे अछूता नहीं है एवं भारत में पात्र संस्थानों द्वारा विदेशी योगदान प्राप्त करने और उसके उपयोग को नियमित करने के उद्देश्य से वर्ष 1976 में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act – FCRA) बनाया गया। इस अधिनियम को भारत में लागू करने का मुख्य उद्देश्य भारत में विदेशी अंशदान में पारदर्शिता, जवाबदेही, कानूनी अनुपालन, वैध कार्यों को सक्षम बनाना, जनविश्वास, सुनिश्चित करना है। साथ ही, राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और व्यापक राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। अमेरिका में वर्ष 1938 में बनाए गए कानून में परिस्थिति अनुसार वर्ष 1960 में एवं समय-समय पर संशोधन भी किए गए हैं।
भारत की तुलना में अन्य देशों में कानून सख्त
भारत में एफसीआरए गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और धार्मिक एवं राजनैतिक संगठन, जो विदेशी अंशदान प्राप्त करते हैं, पर लागू होता है। जबकि कुछ अन्य देशों में तुलनीय वैश्विक कानून का कार्यक्षेत्र विस्तृत है एवं यह लॉबिस्ट, जनसंपर्क (पीआर) फर्म, थिंक टैंक, विश्वविद्यालय तथा कंपनियों सहित उन सभी संस्थाओं या व्यक्तियों पर लागू होते हैं, जो किसी विदेशी प्रधान के निर्देश पर कार्य करते हैं, चाहे वे किसी भी क्षेत्र से संबंधित हों।
भारत में एफसीआरए में पूर्व में भी संशोधन हुए हैं
भारत सरकार ने समय-समय पर विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में तात्कालिक परिस्थितियों के अनुरूप संशोधन भी किए हैं। यह परिवर्तन विदेशी अंशदान को निरुत्साहित करने के उद्देश्य से नहीं बल्कि पारदर्शिता को सुदृढ़ करने, अधिक प्रकटीकरण करने, मजबूत जवाबदेही सुनिश्चित करने और बेहतर प्रशासन व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से किए गए। भारत ने विदेशी अंशदान की प्राप्ति और उसके उपयोग के विनियमन के लिए 1976 में पहला विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम लागू किया था। जैसे जैसे अंतरराष्ट्रीय सहभागिता बढ़ी और सीमापार वित्तीय प्रवाह अधिक जटिल होता गया, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए गए।
वर्ष 1984 में संशोधन के माध्यम से विदेशी धन प्राप्त करने वाले सभी गैर-सरकारी संगठनों के लिए गृह मंत्रालय में पंजीकरण कराना अनिवार्य किया गया, न्यायाधीशों को अधिनियम के दायरे में लाया गया, “विदेशी अंशदान” और “राजनीतिक दल” की परिभाषाओं का विस्तार किया गया तथा लेखापरीक्षण संबंधी शक्तियां जोड़ी गईं। एफसीआरए, 2010 ने 1976 के अधिनियम का स्थान लेते हुए उसे समेकित किया और अधिक सुदृढ़ अनुपालन ढांचा स्थापित किया। इसे 26 सितंबर 2010 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इसके माध्यम से किए गए प्रमुख संशोधनों में शामिल है, प्रत्येक पांच वर्ष में पंजीकरण का अनिवार्य नवीनीकरण, पंजीकरण के लिए विस्तृत एवं कठोर शर्तें, पंजीकरण का निलंबन, निरस्तीकरण, परिसंपत्तियों का निहित होना तथा अपराधों का शमन (कम्पाउंडिंग)। वर्ष 2011 में विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम अधिसूचित किए गए, जिनके माध्यम से पंजीकरण, नामित बैंक खातों और प्रतिवेदन प्रारूपों को क्रियान्वित किया गया।
वर्ष 2020 में प्रमुख संशोधन अधिनियम लाया गया। इसके अंतर्गत संस्थानों के पदाधिकारियों के लिए आधार/पासपोर्ट पहचान अनिवार्य की गई; विदेशी अंशदान केवल नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के एकल नामित खाते में प्राप्त करने का प्रावधान किया गया; अन्य संघों को उप-अनुदान (सब-ग्रांटिंग) देने पर प्रतिबंध लगाया गया; प्रशासनिक व्यय की सीमा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई तथा पंजीकरण का नवीनीकरण सरकारी जांच के अधीन कर दिया गया। वर्ष 2022 में एफसीआरए नियमों में पुनः संशोधन किया गया, इसके अंतर्गत विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों से प्राप्त अंशदान की सीमा 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 लाख रुपये प्रति वर्ष कर दी गई, जिससे सामान्य परिवारों के लिए अनुपालन आसान हुआ साथ ही कुछ अपराधों के शमन (कम्पाउंडिंग) से संबंधित प्रावधान भी जोड़े गए। वर्ष 2024 में नियमों में पुनः संशोधन किया गया एवं प्रशासनिक व्यय के लिए आवंटित अप्रयुक्त राशि को आगे ले जाने की अनुमति दी गई; टीडीएस रिफंड के संबंध में प्रावधानों को स्पष्ट किया गया; तथा आवेदनों के शीघ्र निस्तारण के लिए आवेदन के चरण में आवश्यक दस्तावेज संबंधी प्रावधानों को सुदृढ़ किया गया।
अब वर्ष 2026 में प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 में यह प्रस्ताव किया गया है कि किसी पंजीकरण की अवधि समाप्त होने या उसके निरस्त होने की स्थिति में विदेशी वित्तपोषित परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाए। अधिसूचित एफसीआरए (संशोधन) नियम, 2026 के तहत पंजीकरण को निर्दिष्ट उद्देश्यों तथा अनुमोदित राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से जोड़ा गया है तथा अनुमत धार्मिक गतिविधियों के दायरे से धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किए जाने वाले प्रचार-प्रसार (प्रोसिलिटाइजेशन) को बाहर रखा गया है। इस संदर्भ में एक बिल लोक सभा में दिनांक 25 मार्च 2026 को पेश किया गया है, जिसे बाद में 12 अगस्त 2026 को संयुक्त संसदीय समिति को आगे विचार के लिए सौंप दिया गया है। वैसे भी, किसी भी देश में लोकतंत्र बाहरी शक्तियों से प्रभावित नहीं हो, इस हेतु स्थानीय सरकार के लिए यह जरूरी है कि उस देश में आने वाला विदेशी अंशदान जिन उद्देश्यों के लिए देश में आ रहा है, उसी उद्देश्य के लिए उपयोग हो, इसकी निगरानी करना उस सरकार का धर्म है। एफसीआरए भी इसी निगरानी का कानूनी माध्यम है। यह कानून उन गतिविधियों पर रोक लगाता है जो भारत की संप्रुभता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था अथवा अन्य देशों के साथ संबंधों को प्रभावित कर सकती है।
असत्य विमर्श खड़ा करने का प्रयास
उक्त संशोधन बिल के लोक सभा में पेश किए जाने के उपरांत भारत में कुछ बिंदुओं पर विपरीत विमर्श खड़ा करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है। इस संदर्भ में भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय की वेबसाइट पर पर्याप्त जानकारी प्रदान की गई है। इसी उपलब्ध जानकारी के आधार पर असत्य विमर्श को ध्वस्त करने का प्रयास इस लेख में किया गया है। जैसे एक विमर्श यह खड़ा किया जा रहा है कि भारत सरकार अब विदेशी फंडिंग पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना चाहती है, अतः उक्त अधिनियम में संशोधन किया जा रहा है। जबकि, वस्तुस्थिति यह है कि केंद्र सरकार विदेशी फंडिंग को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना चाहती है। इससे राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध विदेशी प्रभाव को रोका जा सकेगा। वर्ष 2024–25 में लगभग 16,200 संस्थाएं भारत में सक्रिय रूप से पंजीकृत थीं और उन्होंने लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त किया, जो किसी प्रतिबंधात्मक व्यवस्था का संकेत नहीं है। हाल ही के समय में ईसाई मिशनरियों द्वारा भारत के जनजातीय इलाकों में हिंदू जनजातियों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाए जाने के मामले ध्यान में आए हैं। इस संदर्भ में भारत सरकार के पूर्व विदेश सचिव और राजदूत श्री कंवल सिब्बल का मत है कि FCRA भारत का घरेलू कानून है। भारत में मिशनरी कामों के लिए विदेशी फंडिंग की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। विदेशी पैसे से मुख्य रूप से हिंदुओं का ही धर्म परिवर्तन कराया जाता है। हमें अपने आंतरिक मामलों में किसी भी तरह के दखल को नकार देना चाहिए। भारत में ईसाई लॉबी को बढ़ावा देने की कोशिश करके अमेरिका धर्मनिरपेक्षता का पालन नहीं कर रहा है।
विदेशी अंशदान का दुरुपयोग होने के मामले प्रकाश में आए
हाल ही में इंटेलिजेन्स ब्यूरो (IB) ने प्रधानमंत्री कार्यालय को प्रस्तुत एक विस्तृत प्रतिवेदन में दर्शाया है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय समर्थनकारी नेटवर्क तथा विदेशी वित्तपोषित स्थानीय गैर-सरकारी संगठन लगातार ऐसे आंदोलनों को प्रोत्साहित करते आ रहे हैं, (जैसे, तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के विरुद्ध लम्बे समय तक चला विरोध) जिससे भारत की रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा तथा कूटनीतिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। सीमापार अनुदानों से प्रेरित सक्रियता द्वारा प्रायः पर्यावरण अथवा मानवाधिकारों की वकालत के नाम पर भारत के औद्योगिक विस्तार, ऊर्जा सुरक्षा तथा विकास की दिशा से सम्बंधित प्रमुख परियोजनाओं को लक्षित किया गया है। इसी संदर्भ में एक अनुमान लगाया गया है कि अंतरराष्ट्रीय समर्थनकारी समूहों द्वारा संचालित समन्वित कानूनी चुनौतियों, विरोध प्रदर्शनों एवं स्थानीय नाकाबंदी ने कोयला आधारित बिजली संयंत्रों और यूरेनियम खनन सहित मेगा परियोजनाओं में अनिश्चित काल तक विलम्ब करके भारत के वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि में अनुमानित 2 से 3 प्रतिशत तक की कमी की है। इसी प्रकार, केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने ऑक्सफैम इंडिया के खिलाफ सीबीआई जांच की सिफारिश की क्योंकि इस संगठन पर वैधानिक प्रतिबंधों की सीमा का उल्लंघन करते हुए विदेशी योगदान को अन्य संस्थाओं (सेंटर फार पॉलिसी रिसर्च) को अंतरित करके नियमों को व्यवस्थित रूप से दरकिनार करने का आरोप लगाया गया है। कभी-कभी विदेशी धनराशि प्राप्त संस्थानों द्वारा देश की निर्वाचन एवं राजनैतिक प्रक्रियाओं में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भी किया जाता है। विदेशी धन का उपयोग गुप्त रूप से जनमत को प्रभावित करने, स्थानीय प्रचार को वित्त पोषित करने अथवा संवेदनशील राजनैतिक अवसरों के दौरान विघटनकारी जन आंदोलनों को संगठित करने के लिए भी किया जाता है। इससे लोकतांत्रिक निर्वाचन प्रक्रियाओं को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने की सम्भावना उत्पन्न होती है। गैर लाभकारी तथा धर्मार्थ क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से हवाला लेनदेन, कर अपवंचन तथा आतंकवादी वित्तपोषण के लिए माध्यम के रूप में दुरुपयोग के प्रति संवेदनशील रहे हैं। इसका एक कारण मानवीय कार्यों से जुड़ी भावनात्मक अपील तथा अपेक्षाकृत अधिक गुमनामी है।
एफसीआरए किसी एक समुदाय को लक्षित नहीं करता है
एक और विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है कि भारत में एफसीआरए विशेष रूप से किसी एक धर्म या समुदाय को लक्षित करता है, जबकि ऐसा नहीं है। यह अधिनियम धर्म, समुदाय या विचारधारा की परवाह किए बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है। आस्था-आधारित कल्याणकारी गतिविधियां, जिनमें धार्मिक शिक्षा, उपासना स्थलों का रखरखाव तथा सभी धर्मों के संगठनों द्वारा किए जाने वाले परोपकारी कार्य शामिल हैं, विदेशी वित्तपोषण प्राप्त करने के लिए निरंतर पात्र बने हुए हैं। भारत में यह भी एक मिथक है कि एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकरण कराने से किसी संगठन की अनुमत गतिविधियां बदल जाती हैं, जबकि एफसीआरए अधिनियम केवल यह चाहता है कि ये गतिविधियाँ पारदर्शी रूप से संचालित हों।
एफसीआरए में सामान्य परिस्थितियों में परिसंपतियां जब्त नहीं होंगी
भारत में कुछ लोगों द्वारा यह झूठा विमर्श फैलाया जा रहा है कि 2026 के संशोधनों के तहत सरकार किसी भी एनजीओ की परिसंपत्तियां जब्त कर सकती है। जबकि संशोधन प्रस्ताव के अनुसार नामित प्राधिकरण विदेशी अंशदान से सृजित परिसंपत्तियों का केवल प्रबंधन करेगा, और वह भी तभी जब किसी संगठन का पंजीकरण विधिसम्मत रूप से समाप्त हो चुका हो। परिसंपत्तियों का निहित होना प्रारंभ में अस्थायी होता है और पंजीकरण के नवीनीकरण पर उन्हें पूर्णतः वापस कर दिया जाता है। प्रत्येक स्थिति में उपासना स्थल विधि द्वारा अपने धार्मिक स्वरूप को बनाए रखते हैं। नामित प्राधिकरण के आदेश पुनरीक्षण तथा जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील के अधीन होते हैं। एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत संगठनों में विदेशी नागरिकों की प्रमुख भूमिकाओं पर अत्यधिक प्रतिबंध है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि भारत में विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों का संचालन ऐसे व्यक्तियों द्वारा किया जाए, जिनका भारत से सत्यापित संबंध हो। यह अधिनियम के उस मूल उद्देश्य के अनुरूप है, जिसके तहत घरेलू मामलों में अनुचित विदेशी प्रभाव को रोकना सुनिश्चित किया गया है।
यह सोच भी उचित नहीं है कि एफसीआरए पंजीकरण का निरस्तीकरण हमेशा यह दर्शाता है कि संगठन ने कोई गलत कार्य किया है। अनेक पंजीकरण निरस्तीकरण और नवीनीकरण न होने के मामले केवल प्रशासनिक कारणों से होते हैं, जैसे वार्षिक विवरणियां दाखिल न करना, अवधि समाप्त होने से पहले नवीनीकरण न कराना या नामित बैंक खाते का अनुरक्षण न करना। किसी भी पंजीकरण निरस्तीकरण की न्यायिक समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार न्यायालयों के पास बना रहता है। यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि राज्य स्तर पर एफसीआरए जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की स्वीकृति की आवश्यकता राज्यों की स्वायत्तता का अतिक्रमण है। एफसीआरए विदेशी संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित एक केंद्रीय कानून है, जो संसद के विशिष्ट विधायी अधिकार-क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विषय हैं। केंद्रीय कानून के अंतर्गत समानांतर या परस्पर विरोधी जांचों को रोकने के लिए समन्वित स्वीकृति का प्रावधान किया गया है, जो अन्य केंद्रीय कानूनों में उपलब्ध समान प्रावधानों के अनुरूप है।
एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत संस्थाएं भारत के नागरिक समाज के अधिकांश हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं। मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार, एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत संस्थाएं भारत में कार्यरत सभी गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) का केवल एक छोटा-सा हिस्सा हैं। सक्रिय एफसीआरए डेटाबेस में लगभग 14,500 संस्थाएं पंजीकृत हैं, जबकि देश में पंजीकृत एनजीओ की संख्या कई लाख है। अतः यह कानून व्यापक नागरिक समाज को नहीं, बल्कि विदेशी वित्तपोषण प्राप्त करने वाले एक विशिष्ट माध्यम को विनियमित करता है। पंजीकरण बनाए रखने के लिए न्यूनतम उपयोग की अनिवार्यता का कोई वास्तविक उद्देश्य नहीं है। 10 लाख रुपये के न्यूनतम उपयोग की अनिवार्यता यह सुनिश्चित करती है कि सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण केवल वास्तव में कार्यरत संगठनों के पास ही बने रहें। इससे निष्क्रिय संस्थाओं को पंजीकरण बनाए रखते हुए बिना किसी घोषित गतिविधि के विदेशी अंशदान प्राप्त करने की वैधानिक पात्रता बनाए रखने से रोका जा सकेगा।

















