इन दिनों गालियों को लेकर घमासान मचा हुआ है। काक्रोच पार्टी के आंदोलनकारी युवक-युवतियों द्वारा दी गईं गालियों को लेकर समाज का प्रबुद्धजन दो वर्गों में बंट गया। एक वर्ग उनका है जो अश्लील और भद्दी गालियों के समर्थन में खड़े हैं, तो दूसरे वे जो इस तरह सार्वजनिक रूप से गालियां दिए जाने का विरोध कर रहे हैं।
दोनों के अपने-अपने तर्क हैं। गाली समर्थकों का कहना है कि यह युवाओं की गुस्से और आक्रोश में भरी हुई अभिव्यक्तियां हैं, जिन्हें व्यर्थ ही तूल दिया जा रहा है। भारतीय जनजीवन में गालियां आम बात है। ये गालियां इन युवाओं ने समाज से ही ली हैं, जो आज से नहीं सदियों से प्रचलित हैं। तथा संसार का कोई ऐसा समाज नहीं जिसमें गालियों का चलन नहीं हो। तो इन बच्चों पर ही सारा प्रकोप क्यों? इनको ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है?
इधर दूसरी ओर जो गालियों की रील्स सामने आ रही हैं, नग्न फूहड़ता को महिमामंडित किया जा रहा है, इससे क्षुब्ध हो रहे लोगों का कहना है कि ऐसी घोर अश्लील गालियां कैसी सुनी जा सकती हैं, जिनको हम अपने घरों में कभी नहीं बोलते? यदि कोई बोलता भी है तो स्त्रियां पुरुषों के सामने और पुरुष स्त्रियों के सामने बोलने में सकुचाते हैं, उनको कोई भी सभ्य व्यक्ति सार्वजनिक रूप से कैसे बोल सकता है? किसी की मां, बहन या बेटी को लक्षित करके गाली देना, सभ्य समाज में ऐसे अमर्यादित शब्दों को उचित कैसे ठहराया जा सकता है?
इस सारे प्रकरण में एक ओर यह प्रश्न खड़ा होता है कि जिस समाज में लोग बात-बात में मां, बहन की गाली देते पाए जाते हैं, वहां गालियों का विरोध किया जाना कितना प्रासंगिक है? तो दूसरी ओर यह भी प्रश्न खड़ा होता है कि जो बुद्धिजीवी स्त्री के जननांगों से संबंधित गालियों को पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता से उत्पन्न मानते आए हैं, विशेषकर स्त्रीवादी महिलाएं जो मां, बहिन की गालियों को पुरुषसत्ता के वर्चस्व को प्रकट करने का उपकरण मानती हैं, वे भी मोदी की मां, बहन करने वाली लड़कियों के समर्थन में आ खड़ी हुईं। बड़ी अंतर्विरोध पूर्ण स्थिति दोनों ओर दिखाई पड़ती है।
ऐसे में संत कवि तुलसीदास याद आते हैं। ऐसे उलझाऊ मुद्दों पर तुलसीदास कुछ न कुछ समाधान अवश्य देते हैं। वे इसीलिए महाकवि हैं कि विषम से विषम परिस्थितियों में भी वे कोई न कोई राह अवश्य सुझाते हैं। गाली को लेकर उन्होंने एक अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण दोहा लिखा है।
अमिय गारि गारेउ गरल,
गारि कीन्ह करतार।
प्रेम बैर की जननि युग,
जानहिं बुध न गंवार॥ (दोहवली)
अर्थात् विधाता ने मानो अमृत और विष दोनों को मिलाकर गाली रची है। यह प्रेम और बैर, दोनों की जननी है। इस रहस्य को बुद्धिमान लोग ही समझ सकते हैं, मूर्ख नहीं।
तुलसीदास भारतीय समाज के मन और लोक व्यवहार को जितनी गहराई के साथ पढ़ते हैं वह विस्मयजनक है। गाली पर सूत्ररूप में ऐसी गहरी बात शायद ही किसी कवि ने कही हो। वे कहते हैं कि गाली में अमृत जैसी मिठास भी है और जहर जैसा कड़वापन भी। इससे प्रेम भी बढ़ सकता है और शत्रुता भी। यह गाली देने वाले की मंशा, गाली के स्वरूप और जिसको दी जा रही है उसके साथ संबंध पर निर्भर है। पर इस बात को विवेकी व्यक्ति समझता है, मूर्ख नहीं। तुलसीदास गाली के मनोविज्ञान को समझते हैं। वे गाली को लेकर कोई फतवा नहीं देते पर मनुष्य के विवेक सम्मत होने और भाषा प्रयोग में समझदारी बरतने का एक सूत्र अवश्य पकड़ा देते हैं कि गाली कब मीठी लगती है और कब विष बुझे तीर जैसी।
तुलसी का एक-एक शब्द सचाई से भरा हुआ है। हमने अपने आस-पास कुछ लोगों को बात-बात में मां, बहिन की गालियां देते देखा होगा। ठेठ गांव के आदमी ही नहीं, महानगर के अभिजात लोग भी गाली देते देखे जा सकते हैं। कुछ लोग तो अपने मित्रों पर गालियों को भी प्रेमोपाहार की तरह बरसाते हैं और खिलखिला कर हंस पड़ते हैं। कोई बुरा नहीं मानता। किन्तु यदि वही गाली अपने शत्रु को दे दी जाए, या शत्रु की तरफ से आ जाए तो तलवारें खिंच जाती हैं।
वस्तुतः समाज में सामान्यतया गाली देना अनुचित और अनैतिक ही माना जाता है। कोई इसका समर्थन भी नहीं करता। तो भी यदि कोई कितनी भी अश्लील या जुगुप्साप्रद गाली दे, महत्व उसके शब्दार्थ का कम, प्रयोगकर्ता की मंशा और परिस्थिति का ही होता है। होली, शादी विवाह, समधी-समधिन के हास परिहास आदि विशेष अवसरों की गाली किसी को नहीं चुभती। चुभती भी हो तो वह उपेक्षणीय मानी जाती है। किन्तु यदि दैनिक जीवन में आप किसी का अपमान करने, उसे नीचा दिखाने अथवा उस पर क्रोध प्रकट करने के लिए किसी को गाली देते हैं तो वह उसके प्रतीकार के लिए खङ्गहस्त हो जाता है। और तब आपको उसका फल भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
जंतर मंतर पर देश के प्रधानमंत्री मोदी जी को जिस तरह अश्लील गालियां दी गईं उनको तुलसीदास के इस गालीसूक्त की कसौटी पर कस कर देखें तो यह तो स्पष्ट ही है कि वे कोई मोदी जी के प्रेम में पड़े लोग नही थे। वे मोदी विरोध में अंधे हो चुके विवेकहीन लोगों का मेला था जो अपनी घृणा, वैर और आक्रोश अश्लील गालियों के रूप में प्रकट कर रहा था।
और आज पूरे देश में जो दो वर्ग गाली समर्थकों और गाली विरोधियों के बन गए, उसके पीछे भी सामान्य मनोविज्ञान यह है कि जो लोग मोदीद्रोह और सरकार के विरोध में इतने अंधे हो चुके कि उनका अंधेरे उजाले का भेद समाप्त हो गया, वे केवल इसलिए खुश हैं कि चलो और कुछ नहीं तो उनके शत्रु को गाली ही पड़ी। ‘वैरी का कुछ बिगाड़ न सके तो वैरी के कुत्ते को ही पत्थर मारा’ की तर्ज पर वे इन अमर्यादित और अश्लील गालियों पर तालियां बजा रहे हैं। इनका समर्थन कर रहे हैं, इनके पक्ष में तर्क गढ़ रहे हैं।
और इधर जो लोग इन घटनाओं का विरोध कर रहे हैं वे केवल इसलिए नहीं कर रहे कि वे अश्लीलता से उद्विग्न हैं। वह तो है ही पर ध्यान रखिए ये वे लोग हैं जो देश के प्रधानमंत्री से प्रेम करते हैं, उसके नेतृत्व में भरोसा रखते हैं। मोदी जिस दल और संगठन का प्रतिनिधित्व करते हैं, ये उसमें भी आस्था रखते हैं। वे यह मानते हैं कि मोदी ने देश का गौरव बढ़ाया है तथा देश विरोधियों की नाक में नकेल कसी है। ऐसे में जो भी व्यक्ति मोदी को सार्वजनिक रूप से गाली दे रहा है वह उनकी नजर में शत्रु है, अनैतिक, अमर्यादित और गैर कानूनी तो खैर है ही।
कहने की जरूरत नहीं कि देश का बहुत बड़ा समूह गालियों के विरोध में आज इसलिए भी खड़ा है कि ये गालियां उसके नायक को दी गईं हैं जिसे वह प्रेम करता है। सोचिए, अपने को या अपनों को गाली कौन सहन करता है! आश्चर्य है, कुछ लोग इतनी सीधी सी बात भी नहीं समझ पा रहे। तुलसीदास सही कह गए ‘जानहिं बुध न गंवार’।
















