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मदरसों की आड़ में बाल अधिकारों का हनन

स्वतंत्रता के आठ दशक बाद भी वास्तव में यह स्थिति शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। हाल ही में मध्यप्रदेश में मदरसों के संचालन में बहुत बड़े पैमाने पर अनियमितता दर्ज की गई। इसमें श्योपुर में बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ

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अमित गजकेश्वर

मदरसा शिक्षा को लेकर समय-समय पर विवाद उठते ही रहते हैं, कभी विवाद मदरसों की संदिग्ध कार्यप्रणाली को लेकर होता है, तो कभी बच्चों को कट्टरपंथी शिक्षा देने के मामले में होता है, कभी अनियमितता या भ्रष्टाचार के कारण चर्चा बरकरार रहती है तो कभी मदरसों की गंभीर अपराधों में संलिप्तता विवाद के मूल में दिखाई देती है। हाल ही में, मध्यप्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश देते हुए उनके कार्यक्षेत्र में स्थित मदरसों के भौतिक सत्यापन के निर्देश दिए। ये आदेश उस रिपोर्ट के प्रकाश में आने के बाद जारी किए गए, जिसमें श्योपुर में संचालित मदरसों के संचालन में बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ।

श्योपुर जिले में शासन से अनुदान प्राप्त करने वाले 80 मदरसों में से 56 मदरसे धरातल पर थे ही नहीं। जबकि, इस अवधि में शासन से मिलने वाला अनुदान उन्हें लगातार मिल रहा था। इसी प्रकार का फर्जीवाड़ा प्रदेश के अन्य जिलों भिंड, मुरैना, रीवा सहित अनेक स्थानों पर देखने को मिला। मुरैना और भिंड के मदरसों में एक अलग तरह का फर्जीवाड़ा देखने को मिला। इन जिलों के मान्यता प्राप्त मदरसों में अन्य विद्यालयों मे पढ़ने वाले हिंदू बच्चों की समग्र जानकारी चुराकर उनका दाखिला मदरसों में दिखाकर शासन से अनुदान वसूला जा रहा था। जिन हिंदू बच्चों का फर्जी दाखिला मदरसों में दिखाया गया। उनके अभिभावकों को इसकी जानकारी नहीं थी।

इंदौर में जब मदरसों का भौतिक सत्यापन हुआ तो पता चला कि मदरसों द्वारा दिए गए पते पर या तो खंडहर थे या वहां खाली मैदान था। वे अब तक सरकार द्वारा मिलने वाला लाखों का अनुदान भी हड़प चुके थे। प्रशासन ने ऐसे 27 संदिग्ध मदरसों को चिन्हित किया। संविधान में वर्णित अधिकारों का लाभ लेकर जिन मदरसों की स्थापना और संचालन किया जाता है उसमें इस प्रकार की अनियमितता उजागर होना न केवल एक आर्थिक अपराध है बल्कि बाल अधिकारों के सुरक्षा के प्रति एक गंभीर चुनौती भी है।

भ्रष्टाचार के केंद्र

प्रदेश के मदरसों में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनियमितता, बाल अधिकारों का उल्लंघन एवं गंभीर अपराधों में संलिप्तता के कई मामले बीते दिनों सामने आए हैं। गत माह मंदसौर के बादाखेड़ी गांव में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा एक मुस्लिम शैक्षणिक संस्थान के परिसर में छापा मारने की कार्रवाई की गई। इसके पूर्व आयोग को संबंधित संस्थान की अनियमितता के संबंध में अनेक शिकायतें मिली थी। आयोग की टीम ने जांच के दौरान पाया कि मोहनिया एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी द्वारा स्कूल शिक्षा विभाग से छठी से आठवीं कक्षा तक के संचालन की अनुमति प्राप्त की थी लेकिन वहां 12वीं तक कक्षा संचालित होने का साक्ष्य मिला। साथ ही गैर आवासीय अनुमति होने पर भी परिसर का आवासीय उपयोग किया जा रहा था।

स्कूल की अनुमति की आड़ में इस परिसर में अवैध रूप से मदरसे को संचालित होता पाया गया। इसके अतिरिक्त शासकीय पोर्टल पर और स्कूल के स्कॉलर रजिस्टर में दर्ज छात्राओं की संख्या में भी बड़ा अंतर देखने को मिला। आयोग ने गंभीरता दिखाते हुए संबंधित विभागों को पूरे मामले की गहनता से जांच करने के निर्देश दिए हैं।

मध्यप्रदेश के मदरसों पर दूसरे मतों के बच्चों की धार्मिक मान्यताओं को अनदेखा करते हुए उन्हें मुस्लिम शिक्षा देने के आरोप अनेक बार लगे हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने मध्यप्रदेश सरकार को पत्र लिखकर जानकारी दी है कि प्रदेश के 1755 पंजीकृत मदरसों में 9417 हिंदू विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इन विद्यार्थियों को सामान्य विद्यालयों में स्थानांतरित करने की बात भी पत्र में है। इतनी बड़ी संख्या में हिंदू बच्चों का मदरसों में पढ़ना संदेहास्पद है। मुस्लिम शिक्षा के केंद्र के रूप में कार्यरत मदरसों में हिंदू बच्चों की उपस्थिति क्यों? अपनी धार्मिक मान्यताओं से परे उन्हें इस्लामिक शिक्षा देने के पीछे का उद्देश्य जांच का विषय है।

मदरसों की संदिग्ध कार्य प्रणाली

अनेक मदरसों पर अवैध गतिविधियों के संचालन और यौन शोषण के गंभीर आरोप भी लगे हैं। खंडवा के एक अन्य मदरसे में शिक्षिका के पद पर कार्यरत मुसलमान महिला ने आरोप लगाया कि मदरसा संचालक द्वारा उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया गया और उसे बंदी बनाकर रखा गया। इस प्रकार की घटनाओं की सूची बहुत लंबी है लेकिन इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि मदरसों में अबोध और मासूम बच्चों के अधिकारों को गंभीर खतरा बना हुआ है। मदरसों में इस प्रकार की अवैध, अनैतिक और भ्रष्ट गतिविधियों के पीछे का मुख्य कारण मदरसों की कार्य प्रणाली है।

मदरसों का संचालन अत्यंत गोपनीय एवं संदिग्ध तरीके से किया जाता है और बाहरी व्यक्ति सामान्यतः वहां पहुंच नहीं पाता। मदरसों पर निगरानी के लिए यूं तो अनेक राज्यों में मदरसा बोर्ड की स्थापना की गई है, जिसमें प्रत्येक मदरसे का पंजीयन करना एवं प्रत्येक वर्ष पंजीयन का नवीनीकरण अनिवार्य होता है, परंतु अधिकांश मदरसों का संचालन बिना पंजीयन ही किया जाता है। ऐसे में अनेक मदरसे शासन के निगरानी तंत्र से बच जाते हैं। इन मदरसों के द्वारा शासन द्वारा निर्धारित मापदंडों का कितना पालन होता होगा, यह अहम प्रश्न है।

मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की आयु 16 वर्ष से कम होती है अर्थात वे नाबालिग होते हैं। ऐसे में उनके अधिकारों का संरक्षण करना, उनके अभिभावकों, समाज एवं सरकार की बड़ी जिम्मेदारी होती है। धार्मिक और सामाजिक बंदिशों के कारण मुस्लिम अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों को मदरसे में भेजना एक विवशता बन जाता है। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप असंख्य मुस्लिम बच्चे आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के अपने मूल अधिकार से हमेशा के लिए वंचित रह जाते हैं, जिससे उनका दृष्टिकोण संकुचित ही बने रहने की संभावना अधिक रहती है और वे भविष्य के प्रति अधिक महत्वकांक्षी नहीं बन पाते।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने अपने सोशल मीडिया पेज पर एक मदरसे का वीडियो शेयर किया जिसमें वे मदरसों के बच्चों से पूछते नजर आते हैं कि किसे इंजीनियर बनना है और किसे डॉक्टर बनना है? इन प्रश्नों के उत्तर में किसी भी बच्चे ने हाथ नहीं उठाया। जैसे ही कानूनगो ने बच्चों से पूछा कि मौलवी किसे बनना है? सभी बच्चों ने हाथ खड़ा कर दिया। यह घटना दर्शाती है कि कैसे मदरसा शिक्षा वहां पढ़ने वाले बच्चों के सोच को संकीर्ण बना रही है।

निर्धारित पाठ्यक्रम से भी दूरी

मध्यप्रदेश के स्कूली शिक्षा विभाग की जांच से ज्ञात होता है कि गत वर्ष मदरसों में पांचवीं और आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या पच्चीस हजार थी, लेकिन परीक्षा देने केवल दस हजार विद्यार्थी ही पहुंचे। बड़ी संख्या में मुख्य परीक्षा में अनुपस्थित रहने का कारण अज्ञात बना है। मदरसों की राष्ट्रविरोधी एवं आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता भी सामने आई है। भोपाल एटीएस द्वारा गिरफ्तार किए गए आतंकियों से पूछताछ में सामने आया कि एक मदरसे में उनका ट्रेनिंग कैंप संचालित होता था। मध्यप्रदेश के खंडवा के एक मदरसे से महाराष्ट्र पुलिस ने नकली नोटों का बड़ा जखीरा भी बरामद किया था।

मध्यप्रदेश के खंडवा, बुरहानपुर, जबलपुर, रीवा सहित अनेक जिलों में शासकीय भूमि पर अवैध रूप से अतिक्रमण कर मदरसों के निर्माण की भी अनेक शिकायतें प्रशासन को प्राप्त हुई। इस पर त्वरित कार्रवाई करते हुए प्रशासन द्वारा ऐसे अनेक मदरसों को या तो निर्माणाधीन अवस्था में अथवा बनने के बाद जमींदोज करने की कार्रवाई की। मौलानाओं द्वारा मदरसों की स्थापना और संचालन को संविधान प्रदत्त अधिकार बताया जाता है लेकिन उसी संविधान के अनुच्छेद 21 ए के अनुसार “6 से 14 वर्ष के बच्चे को अनिवार्य शिक्षा के अधिकार” को मदरसे की मजहबी किताबों के शिक्षा के माध्यम से दबा देना अनुचित है। महत्वपूर्ण तथ्य रहा है कि बड़ी संख्या में मदरसे पंजीकृत नहीं हैं। क्या शासन द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम का पालन इन मदरसों में होता होगा? स्वतंत्रता के दशकों बाद भी आज यह एक यक्ष प्रश्न है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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