फिल्म सतलुज किसका एजेंडा ? सतलुज के दूसरे किनारे पड़ी हजारों लाशों की अनदेखी क्यों ?
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फिल्म सतलुज किसका एजेंडा ? सतलुज के दूसरे किनारे पड़ी हजारों लाशों की अनदेखी क्यों ?

दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज पर रवनीत सिंह बिट्टू का बड़ा हमला। जसवंत खालड़ा, 25 हजार अज्ञात लाशों का दावा और पंजाब आतंकवाद काल में हिंदू नरसंहार की सच्ची घटनाएं जानिए।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Jul 9, 2026, 01:33 pm IST
in पंजाब
Film Satluj

स्वयंभू मानवाधिकारवादी जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज को लेकर न केवल मुख्यधारा का मीडिया बल्कि सोशल मीडिया भी आपस में बंटा हुआ दिख रहा है। एक तरफ जसवंत खालड़ा के दावों अनुसार, पंजाब में आतंकवाद के दौरान कथिततौर पर पुलिस के हाथों मारे गए हजारों लोगों की बात की जा रही है तो दूसरी ओर लोग सतलुज का दूसरा किनारा देखने की भी बात कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि फिल्म में बातों को न केवल बढ़ा-चढ़ा कर बल्कि, एकतरफा तौर पर पेश किया गया है।

फिल्म के तथ्यों को लेकर खालिस्तानी आतंकवादियों के हाथों शहीद हुए स. बेअंत सिंह के पौत्र व केंद्रीय रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने सवाल उठाए हैं। जालंधर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए बिट्टू ने कहा कि उनके दादा स. बेअंत सिंह फरवरी 1992 में पंजाब के मुख्यमंत्री बने और 31 अगस्त 1995 को शहीद हुए थे। उससे पहले खालड़ा  पर कोई केस भी नहीं था। खालड़ा को 6 सितम्बर, 1995 को अज्ञात लोगों ने उनके घर के बाहर से उठाया अक्तूबर में उनकी लाश मिली। खालड़ा को उनके दादा स. बेअंत सिंह की शहादत के बाद कथिततौर पर उठाया गया था तो इसको लेकर यह क्यों कहा जा रहा है कि खालड़ा को स. बेअंत सिंह के आदेश पर उठाया गया।

25,000 अज्ञात लाशों के दावे संदिग्ध

केवल इतना ही नहीं, बिट्टू ने फिल्म में बताई जा रही 25000 अज्ञात लाशों के अंतिम संस्कार के दावों को भी संदिग्ध बताया है। उन्होंने कहा कि उन दिनों आतंकवादी अपने घरों में आते-जाते रहते और लूट का माल रखते थे। सूचना मिलने पर पुलिस वाले उनके परिवार वालों को हिरासत में ले कर पूछताछ करते। पुलिस के इस झंझट से बचने के लिए आतंकियों के परिजन समाचार पत्रों में विज्ञापन दे कर उन्हें बेदखल कर देते। जब यह आतंकी पुलिस मुठभेड़ में मारे जाते तो परिवार वाले डर के मारे उनकी लाशें लेने भी नहीं आते थे ताकि किसी झमेले में न पड़ जाएं।

इन लाशों का अंतिम संस्कार पुलिस ही करती थी। केवल इतना ही नहीं आतंकियों के हाथों मारे जाने वाले अज्ञात लोगों का अंतिम संस्कार भी पुलिस करती थी। बिट्टू ने कहा कि दोसांझ ने उस दौर का एकपक्षीय हिस्सा ही क्यों दिखाया। बिट्टू ने कहा, मैं दलजीत सिंह दुसांझ और डायरेक्टरों को यही कहता हूं कि आप फिल्में बनाए, पर पंजाब की रियालिटी पर। दोनों तरफ दिखाए। जिन पुलिस वालों को पदश्री मिले, गैलेंटरी अवार्ड मिले उन्हें भी तो दिखाएं। या फिर पंजाब में सिर्फ आग ही लगानी है या हथियार ही चुकवाने हैं। बिट्टू ने हिंदुओं को भी जागने के लिए कहा कि तब 25 हजार से अधिक हिंदू मारे गए थे। अब नहीं तो फिर कब जागोगे।

हिन्दुओं को हिन्दू होने के कारण मारा

तथ्य भी बताते हैं कि उस समय पंजाब में हिन्दुओं को केवल इसीलिए मारा गया क्योंकि वे हिंदू थे। पंजाब में हिन्दुओं के नरसंहार की बहुत लम्बी फेरहिस्त है परंतु कुछ घटनाओं का जिक्र किया जाए तो भी सामान्य नागरिक के रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

1. लुधियाना ट्रेन नरसंहार (15 जून 1991), 120 लोग मारे। यह उस दौर के सबसे भीषण हमलों में से एक था जो लुधियाना के पास हुआ था। आतंकियों ने लुधियाना आ रही दो यात्री ट्रेनों को रोका उन्होंने बोगियों के अंदर मौजूद यात्रियों की धार्मिक पहचान की और निहत्थे हिन्दू यात्रियों पर अंधाधुंध एके-47 चला दीं। इस कायरतापूर्ण हमले में 110 से ज्यादा निर्दोष लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और भारी संख्या में लोग घायल हुए

2. ढिलवां बस हत्याकांड (5 अक्टूबर 1983) : पहला बड़ा बस कांड कपूरथला जिले के ढिलवां में हुआ था, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। अमृतसर जा रही एक एक्सप्रेस बस को उग्रवादियों ने हाईजैक कर लिया। उन्होंने सिख यात्रियों और महिलाओं को छोडक़र, केवल हिन्दू पुरुषों को अलग निकाला और उन्हें गोली मार दी। इस घटना में 6 हिन्दुओं की हत्या की गई थी। इस कांड के ठीक अगले दिन पंजाब में कानून-व्यवस्था बिगड़ने के कारण राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा था।

3. मुक्तसर बस नरसंहार (25 जुलाई 1986) : यह हमला मुक्तसर में हुआ था। चार हथियारबंद आतंकी चंडीगढ़ जा रही एक सरकारी बस में सवार हुए। एक रेलवे क्रॉसिंग के पास उन्होंने बस को रुकवाया और पगड़ी व दाढ़ी देखकर सिख यात्रियों को नीचे उतरने को कहा। इसके बाद बस के अंदर बचे 14 हिन्दू यात्रियों को बेहद करीब से गोलियों से भून दिया गया।

4. खुड्डा (होशियारपुर) बस कांड (30 नवंबर 1986) : आतंकियों ने एक पब्लिक बस को जबरन रुकवाया। उन्होंने हिन्दू यात्रियों को बस से नीचे उतारा और लाइन में खड़ा करके अंधाधुंध फायरिंग कर दी। इस बर्बर हमले में 24 निहत्थे हिन्दू यात्रियों की जान चली गई
5. बटाला धार्मिक जुलूस बम धमाका (3 अप्रैल 1990) : हिन्दू समुदाय द्वारा निकाली जा रही रामनवमी शोभा यात्रा को निशाना बनाया गया। उग्रवादियों ने भारी भीड़ के बीच एक साइकिल पर भीषण बम धमाका किया। इस हमले में 36 निर्दोष श्रद्धालुओं की मौत हो गई और 100 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल और अपाहिज हो गए।

6. कबरवाला रेलवे स्टेशन कांड (27 अगस्त 1989) : जब ट्रेन फाजिल्का जिले के कबरवाला स्टेशन पर रुकी, तो करीब 10 उग्रवादी हथियारों के साथ श्रीगंगानगर से बठिंडा जा रही ट्रेन के डिब्बों में घुस गए। उन्होंने वहां मौजूद आम यात्रियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसमें 18 यात्रियों की जान गई और 14 बुरी तरह घायल हुए।

7. लालड़ू और फतेहाबाद बस कांड (जुलाई 1987) – 48 घंटे का तांडव। जुलाई 1987 में आतंकियों ने लगातार दो दिन दो बड़े नरसंहारों को अंजाम दिया।

6 जुलाई 1987 (लालड़ू): पटियाला के पास लालड़ू में एक बस को रोककर 38 हिन्दू यात्रियों की हत्या की गई। 7 जुलाई 1987 हरियाणा के फतेहाबाद में एक और बस को निशाना बनाकर 34 हिन्दू यात्रियों को मार दिया गया।

8. थापर इंजीनियरिंग कॉलेज हॉस्टल हत्याकांड, पटियाला : यह घटना 10-11 नवंबर 1989 की रात को प्रसिद्ध थापर इंजीनियरिंग कॉलेज में हुई थी। कॉलेज में एक नेशनल यूथ फेस्टिवल चल रहा था, जिसके कारण देश के अलग-अलग हिस्सों (जैसे उत्तर प्रदेश और हरियाणा) से छात्र वहां आए हुए थे। रात के करीब 2.30 बजे, आतंकी परिसर का गेट तोडक़र हॉस्टल में घुसे। उन्होंने गार्ड को गनपॉइंट पर लिया और कमरों में घुसकर सो रहे निहत्थे छात्रों पर एके-47 से अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं। इस कायरतापूर्ण हमले में 19 निर्दोष छात्रों की मौत हो गई थी और कई गंभीर रूप से घायल हुए थे। मारे गए अधिकांश छात्र हिन्दू थे, जिन्हें सिर्फ उनकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया।

9. मोगा में 25 जून, 1989 को आतंकियों ने पार्क में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा पर निहत्थे स्वयंसेवकों पर भारी गोलाबारी कर 25 स्वयंसेवकों को शहीद कर दिया।

10. डबवाली के पास किल्लेयांवाली में 17 नवंबर, 1990 को खालिस्तानी आतंकियों ने संघ की शाखा पर हमला कर 11 स्वयंसेवकों को शहीद कर दिया और 12 स्वयंसेवक गंभीर रूप से घायल हुए।

11. सात मार्च, 1990 को फाजिल्का जिले के अबोहर कस्बे में आतंकियों ने सदर बाजार में गोलियां चला कर 31 युवाओं को मौत के घाट उतार दिया और 65 को जख्मी कर दिया था।

12. आतंकी गांवों में सिख परिवारों के घरों में रात को जबरदस्ती घुस कर हथियार दिखा कर खाना खाने के बहाने घुसते और बहु बेटियों के साथ बलात्कार करते या उन्हें उठा ले जाते थे।

यह केवल कुछ घटनाओं का जिक्र है। पंजाब में लगभग दो दशकों तक चले आतंकवाद के काले दौर ने कितने निहत्थे हिन्दू-सिखों का खून बहाया उसे कालमों में सीमित नहीं किया जा सकता। पंजाब को लेकर सतलुज फिल्म बनाने वालों को इन बेकसूरों की आवाज भी उठानी चाहिए थी।
–

Topics: खालिस्तानी आतंकवादरवनीत सिंह बिट्टूसतलुज फिल्मदिलजीत दोसांझ सतलुजजसवंत सिंह खालड़ा
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