भारतीय शिक्षा प्रणाली परिपक्व और जीवन को सही दिशा देने वाली थी, जीवन जीना सिखाती है। इसी शिक्षा व्यवस्था पर प्रहार किए गए और स्वदेशी से दूर कर दिया गया। आज का श्लोक भारतीय शिक्षा का विस्तार बताता है।
श्लोक-
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः।
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश।।
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गन्धर्वश्चेति ते त्रयः।
अर्थशास्त्रं चतुर्थं च विद्या ह्यष्टादशैव ताः।। (शिवपुराण)
भावार्थ –
विद्या अठारह प्रकार की होती है। चार वेद, छह अंग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष) मीमांसा, न्यायदर्शन, पुराण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद (संगीत) अथ च अर्थशास्त्र (राजनीति)।
आज क्यों है इसकी आवश्यकता
यह श्लोक भारतीय शिक्षा प्रणाली का मूल आधार है। यह बताता है कि प्राचीन भारत में विज्ञान (आयुर्वेद), रक्षा (धनुर्वेद), कला (गंधर्ववेद) और अर्थशास्त्र को धर्म व दर्शन के साथ समान महत्व देकर पूर्ण मानव विकास की नींव रखी गई थी।

















