गुप्त नवरात्र:  देवी तारा, जो भगवान शिव की माता के रूप में जानी जाती हैं
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गुप्त नवरात्र:  देवी तारा, जो भगवान शिव की माता के रूप में जानी जाती हैं

द्वितीय महाविद्या मां तारा के बारे में जानिये, बौद्ध मत और ऋषि वशिष्ठ से जुड़ी है अनोखी कथा

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Jul 16, 2026, 08:06 pm IST
inधर्म-संस्कृति
देवी तारा

देवी तारा

मां सती ने भगवान शिव को अपनी द्वितीय महाविद्या के सन्दर्भ बताया कि आपके ऊपर नीले रंग की देवी तारा हैं।दस महाविद्याओं में देवी तारा की उत्पत्ति के अनेक पुराणों और शास्त्रों में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। देवी तारा को हिन्दू धर्म और बौद्ध पंथ दोनों में प्रमुखता दी गई है। गुप्त नवरात्र के द्वितीय दिवस में देवी तारा की पूजा-आराधना की जाती है।

देवी तारा को श्मशान की देवी भी कहा जाता है, साथ ही उन्हें मुक्तिदात्री भी कहा जाता है। पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार भगवान बुद्ध ने तारा मां की आराधना की थी, वहीं महर्षि वशिष्ठ ने भी पूर्णता प्राप्त करने के लिए देवी तारा की आराधना की थी।

टोडाला या टोडल (तोडाला या तोडल) तंत्र और मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय जब अमृत प्राप्त हुआ, तब देवताओं और दैत्यों के मध्य इसे प्राप्त करने के लिए संघर्ष हुआ। इसी संघर्ष के मध्य जब भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण कर रहे थे, तभी तारा देवी प्रकट हुईं। उन्हें आदि शक्ति का स्वरूप माना गया है, जो सृष्टि के प्रत्येक तत्व में व्याप्त है।

समुद्र मंथन का रहस्य

मान्यता है कि समुद्र मंथन में “हलाहल” नामक घातक विष निकला, जिससे सर्वत्र हाहाकार मच गया परन्तु भगवान शिव शांत और संयमित रहे और उन्होंने सृष्टि को बचाने के लिए, निडरता से विषपान किया, परन्तु विष की तीव्रता ने उन्हें लगभग अचेतावस्था में कर दिया। ऐसी विषम परिस्थिति में दिव्य मां तारा प्रकट हुईं और भगवान शिव को अपनी गोद में लिया। मां और धात्री की तरह उनकी विष की तीव्रता को क्षीर्ण किया।

ब्रह्मांड को नष्ट होने से बचाया

दस महाविद्याओं में देवी तारा को महासरस्वती और महासिद्धि का रूप भी माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह कहा जाता है कि जब सृष्टि का विनाश हो रहा था और चारों ओर अंधकार सा छा गया था, तब तारा देवी ने अपने शक्तिशाली रूप में प्रकट होकर ब्रह्माण्ड को नष्ट होने से बचाया और सृष्टि का पुनः सृजन किया था।

बौद्ध धर्म में तारिणी के रूप में पूजा

बौद्ध धर्म में, तारा की उत्पत्ति अवलोकितेश्वर के आंसुओं से मानी गई है। एक कथा के अनुसार,अवलोकितेश्वर ने सृष्टि के दुखों को देखकर आंसू बहाए थे और उन आँसुओं से एक कमल का पुष्प प्रकट हुआ, जिससे तारा देवी का प्राकट्य हुआ। तारा देवी ने प्रतिज्ञा ली, कि वो सदैव संसार के प्राणियों की रक्षा करेंगी और उन्हें मुक्ति दिलाएंगी। इसलिए माँ तारा को बौद्ध धर्म में “तारिणी” के रूप में भी पूजा जाता है। महाविद्या माँ तारा का यह रुप उनकी करुणा और दया के लिए जाना जाता है।

क्या है तारा नाम का अर्थ

तारा देवी हिन्दू धर्म में 10 महा विद्याओं में से द्वितीय महाविद्या के रूप में शिरोधार्य हैं। ‘तारा’ का अर्थ है,तारने वाली अर्थात् पार कराने वाली। तारा देवी सती का ही एक रूप हैं। इनके तीन स्वरुप सुप्रसिद्ध हैं- एकजटा, उग्र तारा और नील सरस्वती।

परन्तु मायातंत्र के अनुसार माँ तारा को आठ दिव्य रूपों में पूजा जाता है जो उन्हें उग्र और दयालु दिव्य माँ के रूप में दर्शाता है। माँ तारा के आठ दिव्य रूपों का उल्लेख “मायातंत्र” में किया गया है, ये आठ दिव्य रूप हैं,माँ महोगरा,माँ उग्रतारा,माँ कामेश्वरी तारा,माँ नील सरस्वती,माँ एकजटा,माँ चामुंडा,माँ भद्रकाली,माँ वज्र तारा।

मां तारा के आठ दिव्य रूपों में पूजा करने वाले भक्तों को माँ तारा अज्ञानता पर नियंत्रण पाने और आध्यात्मिक विकास प्राप्त करने के लिए संरक्षण और मार्गदर्शन का आशीर्वाद देती हैं।

धन-संपत्ति प्रदान करती हैं

यह भी सर्वश्रुत है कि तारा देवी लोगों को समस्याओं से बाहर निकलने में सहायता करती हैं और उन्हें धन-संपत्ति भी प्रदान करती हैं। इसलिए, इन्हें धन की देवी भी कहा जाता है। तारा महाविद्या की साधना सिद्धि के बाद साधक को धन की कमी नहीं रहती है। माँ तारा ज्ञान, वाणी में ओज, शक्तिशाली व्यक्तित्व और सीखने के गुणों को प्रदान करती हैं और उनमें आने वाली बाधाओं को दूर करती हैं।

मां सती के 51 शक्ति पीठों में से एक शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में है, जिसे तारापीठ के नाम से जाना जाता है। यहां देवी सती की दाहिनी आँख की पुतली गिरी थी, जिस कारण माँ तारा को नयनतारा के नाम से भी जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के राजगुरु महर्षि वशिष्ठ के द्वारा माँ तारा की पूजा-अर्चना कर सिद्धियाँ प्राप्त की गयी थीं।

महाविद्या देवी तारा हिंदू धर्म के साथ, विविध स्वरूपों में बौद्ध धर्म में भी पूजित हैं, विशेषकर तिब्बती और मंगोलियन बौद्ध जनों के मध्य! वहां तारा देवी को सुरक्षा, मुक्तिदाता और भक्तों का उद्धार करने वाली माता के रूप में पूजा जाता है। वज्रयान संप्रदाय में लाल तारा, जुनून और मोह की देवी हैं, नीली तारा, तीसरी आंख की ऊर्जा और आध्यात्मिक जागृति की देवी हैं, हरी तारा,उपचार और करुणा की देवी हैं, श्वेत तारा, पवित्रता और मुकुट चक्र सक्रियण की देवी हैं और काली तारा,सुरक्षा की देवी के रूप में पूजी जाती हैं।

अंधकार से उबारती हैं मां तारा

महाविद्या मां तारा मुक्ति की ओर मार्गदर्शन करती हैं। मां तारा अपने भक्तों को अज्ञानता के अंधकार और अहंकार के भ्रम से से उबारती हैं। माँ तारा की करुणा असीम है, वो भक्तों के जीवन की अशांत चुनौतियों का शमन करती हैं और अपने दिव्य आशीर्वाद से बाधाओं को दूर करती हैं। माँ तारा की सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने पर साधक आध्यात्मिक मुक्ति की ओर एक परिवर्तनकारी यात्रा प्रारम्भ करने में सक्षम होता है, जहाँ से वह सांसारिक माया मोह से परे जाकर मोक्ष की प्राप्ति कर सके।

Topics: देवी तारादूसरी महाविद्यामां सतीदेवी तारा कौन हैंभगवान शिवगुप्त नवरात्र
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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