सोमनाथ मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और पवित्र शिव मंदिरों में से एक है। यह मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में समुद्र के किनारे स्थित है। सोमनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह भारत की आस्था, संस्कृति और आत्मसम्मान का प्रतीक भी माना जाता है। इस मंदिर का इतिहास बहुत उतार-चढ़ाव भरा रहा है। इसे कई बार तोड़ा गया, लूटा गया, जलाया गया, लेकिन हर बार यह फिर से खड़ा हुआ। यही कारण है कि सोमनाथ मंदिर को “न टूटने वाली आस्था” का प्रतीक कहा जाता है।
आस्था पर आघात- इतिहास के अनुसार, सन 1024 ईस्वी में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला किया। उसने मंदिर को बुरी तरह लूटा और नष्ट कर दिया। मंदिर के 56 खंभों में सोना, चांदी, हीरे, मोती और कीमती रत्न जड़े हुए थे, जिन्हें लूट लिया गया। इसके बाद मंदिर और उसके आसपास आग लगा दी गई। इसके बाद भी कई इस्लामी आक्रांताओं जैसे अलाउद्दीन खिलजी, मुजफ्फरशाह, अहमदशाह, औरंगजेब और नादिरशाह ने अलग-अलग समय पर इस मंदिर को तोड़ा और लूटा। इस तरह सोमनाथ मंदिर बार-बार बना और बार-बार तोड़ा गया।
आस्था की जीत- इसके बावजूद, हिंदू समाज की आस्था कभी कमजोर नहीं पड़ी। हर बार लोगों ने मिलकर इस मंदिर को फिर से खड़ा किया। भारत की स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रश्न फिर से उठा। उस समय केंद्र सरकार में मंत्री के.एम. मुंशी और एन.वी. गाडगिल इस विषय को लेकर गंभीर थे। उन्होंने इस विषय पर सरदार वल्लभभाई पटेल से चर्चा की। सरदार पटेल ने स्पष्ट रूप से कहा कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होना चाहिए, क्योंकि यह देश की सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ा हुआ है। महात्मा गांधी का भी मानना था कि मंदिर का पुनर्निर्माण जरूर होना चाहिए, लेकिन इसके लिए सरकारी धन का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। उनका विचार था कि यह काम जनता के सहयोग और दान से होना चाहिए, जबकि सरकार को पूरा सहयोग देना चाहिए। गांधीजी की इसी सोच को ध्यान में रखते हुए 9 अगस्त 1948 को सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रस्ताव रखा गया।
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जय सोमनाथ- 23 जनवरी 1949 को गांधीजी की इच्छा के अनुसार एक आठ सदस्यीय न्यासी मंडल का गठन किया गया। इस न्यासी मंडल में सरदार पटेल और एन.वी. गाडगिल भी शामिल थे। इसके बाद 18 अक्टूबर 1949 को न्यासी मंडल के सदस्यों के नामों की आधिकारिक घोषणा की गई। जनता ने इस कार्य के लिए बढ़-चढ़कर दान दिया और 1949 के अंत तक सोमनाथ कोष में लगभग 25 लाख रुपये एकत्र हो गए। मंदिर की नई रूपरेखा प्रसिद्ध वास्तुकार प्रभाशंकर सोमपुरा ने तैयार की। यह मंदिर प्राचीन भारतीय वास्तुकला के अनुसार बनाया गया। 8 मई 1950 को चांदी के नंदी की स्थापना के साथ सोमनाथ मंदिर का पुनर्शिलान्यास किया गया। दुर्भाग्यवश, 15 दिसंबर 1950 को सरदार वल्लभभाई पटेल का निधन हो गया और वे मंदिर के पूर्ण निर्माण को नहीं देख सके।
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उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे। वे चाहते थे कि राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल न हों। उन्होंने इस संबंध में राष्ट्रपति को पत्र भी लिखा। लेकिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू के विरोध के बावजूद 11 मई 1951 को गर्भगृह में शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की।

पुनर्निर्माण के बाद भी समय-समय पर मंदिर को और भव्य रूप दिया गया। अंततः दिसंबर 1995 में राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सोमनाथ मंदिर को राष्ट्र को समर्पित किया। आज सोमनाथ मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान, आस्था और आत्मविश्वास का प्रतीक है।

















