Explainer। जगन्नाथ रथयात्रा : उतार-चढ़ाव, विध्वंस और पुनर्निर्माण के बीच अमर है आस्था की परंपरा
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Explainer। जगन्नाथ रथयात्रा : उतार-चढ़ाव, विध्वंस और पुनर्निर्माण के बीच अमर है आस्था की परंपरा

पुरी की विश्वविख्यात भगवान जगन्नाथ रथयात्रा भारत की सांस्कृतिक एकता, सामाजिक समरसता और सनातन परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति है। इस वर्ष रथयात्रा शुरू हो गई है जोकि 24 जुलाई तक आयोजित होगी।

Written byरमेश शर्मारमेश शर्मा — edited by Lalit Fulara
Jul 16, 2026, 12:09 pm IST
in विश्लेषण, ओडिशा

पुरी की विश्वविख्यात भगवान जगन्नाथ रथयात्रा भारत की सांस्कृतिक एकता, सामाजिक समरसता और सनातन परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति है। इस वर्ष रथयात्रा शुरू हो गई है जोकि 24 जुलाई तक आयोजित होगी। 25 जुलाई को नीलाद्री बीजे के साथ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मुख्य मंदिर में वापसी होगी तथा 27 जुलाई से पुनः दर्शन आरंभ होंगे। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस महापर्व में सहभागी बनते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि भारत की आध्यात्मिक चेतना समय, सत्ता और परिस्थितियों से कहीं अधिक शक्तिशाली है।

पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर चार धामों में से एक है तथा आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित गोवर्धन मठ का भी केंद्र है। मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण जगन्नाथ के रूप में अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को तीनों देवता भव्य रथों पर आरूढ़ होकर गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं और कुछ दिनों बाद पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। भगवान जगन्नाथ नंदीघोष, बलभद्र तालध्वज और देवी सुभद्रा दर्पदलन रथ पर विराजते हैं। लाखों श्रद्धालु लगभग 50 मीटर लंबी रस्सियों से इन रथों को हाथों से खींचते हैं। रथ को खींचना ईश्वर की सेवा और पुण्य का कार्य माना जाता है। यही कारण है कि इस अवसर पर जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र की सभी सीमाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

पर्यावरण और लोककला का अद्भुत संदेश
रथयात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया से प्रारंभ होती है। प्रत्येक वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं और उनका निर्माण पूरी तरह पारंपरिक शिल्पकला से होता है। आधुनिक मशीनों के स्थान पर स्थानीय कारीगर अपनी पीढ़ियों से चली आ रही कला का उपयोग करते हैं। रथों के निर्माण में मुख्यतः काष्ठ का प्रयोग होता है और प्रकृति के संतुलन का विशेष ध्यान रखा जाता है। यह परंपरा भारतीय संस्कृति के उस विचार को पुष्ट करती है कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं। साथ ही यह स्थानीय शिल्पकारों और लोककला को जीवित रखने का भी प्रभावी माध्यम है।

सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण
रथयात्रा का सबसे प्रेरक दृश्य वह होता है जब पुरी के गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण झाड़ू से रथों के मार्ग की सफाई करते हैं। इस परंपरा को ‘छेरा पहरा’ कहा जाता है। राजा के साथ राजपुरोहित तथा सबर जनजाति के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहते हैं। राजा द्वारा झाड़ू लगाना यह संदेश देता है कि ईश्वर के समक्ष कोई बड़ा या छोटा नहीं है। मंदिर की सेवा-व्यवस्था में भी विभिन्न समाजों और परंपराओं के लोगों की सहभागिता रहती है। यही कारण है कि जगन्नाथ धाम भारतीय सामाजिक समरसता और समावेशी संस्कृति का अद्वितीय प्रतीक माना जाता है।

पौराणिक कथा में छिपा सांस्कृतिक संदेश
मान्यता है कि यह क्षेत्र प्राचीनकाल में सबर जनजाति का था। उनके प्रमुख विश्ववसु भगवान नीलमाधव के उपासक थे। राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान ने मंदिर निर्माण का आदेश दिया। बाद में समुद्र से प्राप्त दिव्य काष्ठ से भगवान की प्रतिमा बनाने का निर्देश मिला। स्वयं विश्वकर्मा बढ़ई के रूप में प्रतिमा निर्माण के लिए आए और अधूरी प्रतीत होने वाली उन्हीं प्रतिमाओं की स्थापना की गई। आज भी भगवान जगन्नाथ की विशिष्ट काष्ठ प्रतिमाएं उसी परंपरा का प्रतीक हैं।

भारत की सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतीक
जगन्नाथ परंपरा भारत की सांस्कृतिक अखंडता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में, कर्मभूमि द्वारका में और जगन्नाथ रूप में उनका प्रतिष्ठान पुरी में है। मान्यता है कि प्रथम काष्ठ समुद्र के माध्यम से द्वारका से पुरी पहुँचा। दूसरी ओर, देवी सुभद्रा का संबंध हस्तिनापुर से माना जाता है, जबकि विभीषण की आराधना से जुड़ी परंपरा दक्षिण की सांस्कृतिक स्मृतियों को जोड़ती है। इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण- संपूर्ण भारत की सांस्कृतिक चेतना इस एक मंदिर और रथयात्रा में समाहित दिखाई देती है। साथ ही भगवान अपने भाई और बहन के साथ विराजमान होकर भारतीय परिवार व्यवस्था और पारिवारिक समन्वय का भी संदेश देते हैं।

विध्वंस और पुनर्निर्माण का संघर्षपूर्ण इतिहास
जगन्नाथ मंदिर का इतिहास भक्ति के साथ ही संघर्ष और पुनर्जागरण का भी इतिहास है। 14वीं शताब्दी से लेकर मुगल काल तक मंदिर पर अनेक आक्रमण हुए। इलियास शाह, फिरोज शाह तुगलक, इस्माइल गाजी, अफगान आक्रमणकारी काला पहाड़ तथा बाद में कई मुगल सेनापतियों ने मंदिर को क्षति पहुँचाई। सबसे भीषण आक्रमण 1568 में काला पहाड़ और बाद में औरंगज़ेब के शासनकाल में हुआ। अनेक बार मंदिर को ध्वस्त किया गया, लूटपाट हुई और श्रद्धालुओं का नरसंहार भी हुआ। किंतु हर संकट के समय पुजारियों और भक्तों ने भगवान की प्रतिमाओं को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाकर परंपरा को जीवित रखा। यही कारण है कि मंदिर का इतिहास विध्वंस से अधिक पुनर्निर्माण और अटूट आस्था का इतिहास बन गया। मुगल सत्ता के पतन के बाद मराठा शासनकाल में मंदिर के पुनरुद्धार का कार्य गति पकड़ता है। आगे चलकर इंदौर की धर्मपरायण महारानी अहिल्याबाई होल्कर सहित अनेक शासकों और श्रद्धालुओं के प्रयासों से मंदिर को पुनः उसका गौरव प्राप्त हुआ।

आज भी उतना ही प्रासंगिक है यह संदेश
आज जब समाज अनेक प्रकार की विभाजक प्रवृत्तियों का सामना कर रहा है, तब जगन्नाथ रथयात्रा हमें समरसता, सेवा, समानता और राष्ट्रीय एकात्मता का संदेश देती है। लाखों लोग बिना किसी भेदभाव के एक ही रस्सी को पकड़कर भगवान के रथ को आगे बढ़ाते हैं। यही दृश्य भारतीय संस्कृति के उस आदर्श को साकार करता है, जिसमें समूचा समाज एक परिवार माना गया है, इसीलिए जगन्नाथ रथयात्रा केवल ओडिशा का पर्व नहीं, बल्कि भारत की सनातन सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता और अजेय आस्था का महापर्व है। सदियों तक आक्रमण, विध्वंस और विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के बाद भी यह परंपरा आज उसी श्रद्धा, वैभव और उत्साह के साथ जीवित है। यही इसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि और भारत की सांस्कृतिक शक्ति का सबसे सशक्त प्रमाण है।

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