यात्रा

हर साल नए क्यों बनाए जाते हैं भगवान जगन्नाथ का रथ? जानिए धार्मिक मान्यता, इतिहास और यात्रा की पूरी जानकारी

जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे अनोखी परंपरा यह है कि तीनों रथ हर वर्ष नए बनाए जाते हैं। रथ निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया से शुरू होता है। इसे स्थानीय कारीगर पारंपरिक तकनीकों से तैयार करते हैं।

Published by
Mahak Singh

Jagannath Rath Yatra:  विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ रथ यात्रा भारत के सबसे बड़े और प्राचीन धार्मिक आयोजनों में से एक है। साल 2026 में यह पावन यात्रा 16 जुलाई से शुरू हो चुकी है और 27 जुलाई तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ संपन्न होगी। हर वर्ष ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली इस यात्रा में देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन करने और उनके रथ की रस्सी खींचने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है।

क्यों खास है जगन्नाथ रथ यात्रा?

पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर हिंदू धर्म के चार प्रमुख धामों में शामिल है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ वर्ष में केवल एक बार स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। रथ यात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने-अपने विशाल रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। यह यात्रा इस बात का प्रतीक है कि भगवान अपने भक्तों से मिलने स्वयं उनके बीच आते हैं, ताकि हर व्यक्ति उनके दर्शन कर सके।

तीनों रथों की क्या है खासियत?

रथ यात्रा के दौरान तीन अलग-अलग रथ निकाले जाते हैं।

  • भगवान जगन्नाथ का रथ-  नंदीघोष (यह तीनों रथों में सबसे बड़ा होता है और लाल-पीले रंग के वस्त्रों से सजाया जाता है।)
  • भगवान बलभद्र का रथ- तालध्वज (यह हरे और लाल रंग से सुसज्जित होता है और अपनी सुंदर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।)
  • देवी सुभद्रा का रथ- दर्पदलन (यह काले और लाल रंग के वस्त्रों से सजाया जाता है और बेहद आकर्षक दिखाई देता है।)

इन तीनों रथों को लाखों श्रद्धालु मोटी रस्सियों से खींचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा से रथ की रस्सी खींचने वाले व्यक्ति को भगवान का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

हर साल नए रथ क्यों बनाए जाते हैं?

जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे अनोखी परंपरा यह है कि तीनों रथ हर वर्ष नए बनाए जाते हैं। रथ निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया से शुरू होता है। इसे स्थानीय कारीगर पारंपरिक तकनीकों से तैयार करते हैं। खास बात यह है कि रथ बनाने में लोहे की कीलों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। लकड़ी की विशेष जोड़ाई और पारंपरिक शिल्पकला से इनका निर्माण होता है। इससे सदियों पुरानी भारतीय कारीगरी और संस्कृति आज भी जीवित है।

पर्यावरण संरक्षण का भी देता है संदेश

रथ यात्रा केवल आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देती है। रथों के निर्माण में परंपरागत रूप से चयनित लकड़ी का उपयोग किया जाता है और पूरी प्रक्रिया पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखकर की जाती है। इससे स्थानीय कारीगरों को रोजगार मिलता है और भारतीय लोक कला को भी बढ़ावा मिलता है।

रथ यात्रा से जुड़ी प्रमुख धार्मिक कथाएं

रथ यात्रा को लेकर कई पौराणिक मान्यताएं हैं। एक कथा के अनुसार देवी सुभद्रा ने अपने भाइयों भगवान जगन्नाथ और बलभद्र से नगर भ्रमण की इच्छा जताई थी। तभी से तीनों भाई-बहन रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार गुंडिचा देवी ने भगवान जगन्नाथ के लिए कठोर तप किया था। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने हर वर्ष उनके मंदिर आने का वचन दिया। इसी कारण भगवान नौ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में रहते हैं और बाद में बहुदा यात्रा के माध्यम से श्रीमंदिर लौटते हैं।

रथ यात्रा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं के लिए जरूरी बातें

धार्मिक मान्यता है कि रथ की रस्सी श्रद्धा और सेवा भाव से खींचने पर भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यात्रा के दौरान धैर्य और अनुशासन बनाए रखना बेहद जरूरी है। महाप्रसाद का सम्मान करें, उसे व्यर्थ न जाने दें और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। भीड़ में धक्का-मुक्की करने से बचें और प्रशासन के निर्देशों का पालन करें।

पुरी कैसे पहुंचें?

यदि आप जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल होना चाहते हैं तो पुरी पहुंचना काफी आसान है।

रेल मार्ग

पुरी रेलवे स्टेशन देश के कई बड़े शहरों से सीधे जुड़ा हुआ है। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलुरु, लखनऊ, पटना, प्रयागराज और वाराणसी से नियमित ट्रेनें उपलब्ध रहती हैं। रथ यात्रा के दौरान भारतीय रेलवे कई स्पेशल ट्रेनें भी चलाता है।

अगर सीधी ट्रेन न मिले

यदि पुरी के लिए सीधी ट्रेन उपलब्ध न हो तो पहले भुवनेश्वर पहुंच सकते हैं। भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन पुरी से लगभग 60 किलोमीटर दूर है। यहां से नियमित ट्रेन, सरकारी बस, निजी बस और टैक्सी आसानी से मिल जाती है।

हवाई मार्ग

निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर का बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। यहां से सड़क मार्ग द्वारा करीब डेढ़ से दो घंटे में पुरी पहुंचा जा सकता है।

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