बहुआयामी वीर सावरकर (5वीं) कड़ी
वीर सावरकर ने तर्क, विज्ञान और राष्ट्रचेतना को अपनी लेखनी का आधार बनाया।उनके निबंध केवल विचार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय पुनर्जागरण के घोषणापत्र हैं
डॉ. नीरज देव
निबंध-विधा के संदर्भ में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार वि. स. खांडेकर का कथन है- ‘यूरोप ने निबंध-रचना की, इसलिए उसके लिए राष्ट्र-रचना करना भी संभव हुआ।’ इस कथन से स्पष्ट होता है कि निबंध केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने, जनचेतना जागृत करने तथा राष्ट्र-निर्माण का प्रभावी साधन भी है।
आधुनिक निबंध-विधा का जनक माइकल द मॉन्तेन को माना जाता है। फ्रांसिस बेकन, चार्ल्स लैम्ब और जॉर्ज ऑरवेल ने इस विधा को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं। भारतीय साहित्य में राजा राममोहन राय, विष्णुशास्त्री चिपलूणकर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, लोकमान्य तिलक तथा गोपाल गणेश आगरकर ने निबंध-साहित्य को वैचारिक दिशा दी। सावरकर की चिंतन-परंपरा पर विशेषतः लोकमान्य तिलक और शिवराम महादेव परांजपे का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है।
अंडमानोत्तर निबंध-लेखन
सावरकर की लेखन-प्रतिभा किशोरावस्था से ही प्रकट हो गई थी। मात्र चौदह वर्ष की आयु में उनका ‘हिंदू संस्कृति का गौरव’ निबंध नाशिक वैभव में संपादकीय के रूप में प्रकाशित हुआ, जो उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है। इसके पश्चात हरिभाऊ आपटे की पत्रिका करमणूक में प्रकाशित उनका निबंध ‘सब पेशवाओं में सबसे श्रेष्ठ पेशवा कौन और क्यों?’ प्रथम पुरस्कार से सम्मानित हुआ। नानासाहेब फडणवीस शतसांवत्सरिक समिति द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में भी उनके निबंध को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। इस प्रकार अल्पायु में ही उनकी वैचारिक परिपक्वता और मौलिक चिंतन स्थापित हो चुका था।
अंडमान से लौटने के पश्चात उनके निबंध-लेखन का सर्वाधिक परिपक्व चरण प्रारंभ हुआ। इसी काल में उन्होंने ‘हिंदुत्व’ जैसे महत्वपूर्ण प्रबंध की रचना की तथा केसरी, मनोहर, किर्लोस्कर, स्त्री, प्रतिभा और श्रद्धानंद जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में अनेक वैचारिक निबंध प्रकाशित किए। उनके प्रमुख निबंध-संग्रहों में ‘विज्ञाननिष्ठ निबंध’, ‘जात्युच्छेदक निबंध’, ‘क्ष-किरणें’ तथा ‘प्राचीन-अर्वाचीन महिला’ उल्लेखनीय हैं। इन कृतियों में उनकी वैज्ञानिक दृष्टि, सामाजिक प्रतिबद्धता और व्यापक वैचारिक चिंतन का सशक्त परिचय मिलता है।
लेखन का उद्देश्य
सावरकर के साहित्य का मूल उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय जागरण और सामाजिक पुनरुत्थान था। उनके मत में हिंदुत्व भारत की सांस्कृतिक अस्मिता का आधार है; अतः हिंदू समाज में स्वाभिमान, संगठन और आत्मविश्वास का जागरण आवश्यक था। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने ‘हिंदुत्व के पंचप्राण’ के माध्यम से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, ‘जात्युच्छेदक निबंध’ द्वारा जातिभेद-उन्मूलन तथा ‘विज्ञाननिष्ठ निबंध’ और ‘क्ष-किरणें’ के माध्यम से अंधविश्वास, रूढ़ियों और अवैज्ञानिक मान्यताओं के विरुद्ध वैचारिक अभियान चलाया।
यद्यपि माझिनी के भाषांतरित आत्मचरित्र की उनकी प्रस्तावना भी स्वतंत्र निबंध का स्वरूप ग्रहण करती है, तथापि यहां केवल उन रचनाओं का विवेचन किया जा रहा है जिन्हें प्रकाशक ने निबंध के रूप में प्रस्तुत किया है।
प्रमुख निबंध
(1) दो शब्दों में दो संस्कृतियां
यह निबंध विज्ञाननिष्ठ निबंध संग्रह में संकलित है। इसमें सावरकर भारतीय और पाश्चात्य संस्कृतियों का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए लिखते हैं- “वे आज के पूजक हैं, हम कल के; वे नए के, हम पुराने के; वे ताजगी के, हम बासी के। एक दृष्टि से देखें तो उनकी संस्कृति अद्यतन है और हमारी पुरातन।” उनके अनुसार भारतीय समाज परंपराओं से इतना आबद्ध हो गया है कि वह नवीन विचारों को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता। जिस प्रकार यूरोप ने बाइबिल की रूढ़ व्याख्याओं से मुक्त होकर आधुनिकता को अपनाया, उसी प्रकार भारत को भी धर्मग्रंथों की अविवेकपूर्ण व्याख्याओं से मुक्त होकर वैज्ञानिक और युगानुकूल दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि हिंदुत्व के समर्थक होते हुए भी सावरकर यहां हिंदुत्व का निषेध नहीं करते, बल्कि उसकी प्रगतिशील और वैज्ञानिक पुनर्व्याख्या का आग्रह करते हैं।
(2) मनुष्य का देव और विश्व का देव
यह निबंध सावरकर के दार्शनिक चिंतन का परिचायक है। यद्यपि वे ‘ईश्वर’ शब्द का प्रयोग करते हैं, किंतु उनका दृष्टिकोण पारंपरिक आस्तिकता से भिन्न है। वे ‘मनुष्य का देव’ और ‘विश्व का देव’ की दो अवधारणाएं प्रस्तुत करते हैं। पहला मानव के हित से संबंधित है, जबकि दूसरा प्रकृति के सार्वभौमिक नियमों का प्रतीक है, जिसके अंतर्गत सुख और दुःख दोनों समान रूप से निहित हैं। उनके अनुसार मनुष्य का सुख विश्व-व्यवस्था का मात्र उप-परिणाम है; इसलिए मनुष्य को ईश्वर की इच्छा जानने के बजाय मानव-हित और मानव-कल्याण को अपने जीवन का आधार बनाना चाहिए। इस प्रकार उनका चिंतन व्यावहारिक मानवतावाद का स्वर ग्रहण करता है।
(3) जात्युच्छेदक निबंधमाला
सावरकर की ‘जात्युच्छेदक निबंधमाला’ उनके समाज-सुधारक व्यक्तित्व की सर्वाधिक प्रभावशाली अभिव्यक्ति है। लगभग पंद्रह निबंधों में उन्होंने जातिभेद की उत्पत्ति, उसके दुष्परिणाम और उसके उन्मूलन की आवश्यकता का ऐतिहासिक एवं तार्किक विवेचन किया है। वज्रसूचि जैसे ग्रंथों के आधार पर वे जन्मना जातिभेद का खंडन करते हुए तर्क देते हैं कि यदि जातियां जन्म से निश्चित होतीं, तो मनुष्य भी पशु-पक्षियों की भांति शारीरिक रूप से भिन्न दिखाई देता। चूंकि ऐसा नहीं है, इसलिए जन्माधारित जाति-व्यवस्था का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
इसी क्रम में वे स्पर्शबंदी, रोटीबंदी, बेटीबंदी, वेदोक्तबंदी, सिंधुबंदी, शुद्धिबंदी और व्यवसायबंदी जैसी ‘सात बेड़ियों’ को तोड़ने का आह्वान करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि जाति-व्यवस्था का समूल उच्छेदन कर एक संगठित, जाति-विहीन और एकरूप हिंदू समाज की स्थापना करना था। इस निबंधमाला में वैज्ञानिक दृष्टि, तार्किकता और व्यावहारिक समाज-सुधार का उत्कृष्ट समन्वय दिखाई देता है।
इसके अतिरिक्त ‘गोपालन चाहिए, गोपूजन नहीं’, ‘क्या यंत्रों से बेकारी बढ़ती है?’, ‘धर्मांधता की नागिन का फन कुचलने वाला विज्ञानबल’ तथा ‘मुसलमानों के विभिन्न पंथों और उपपंथों का परिचय’ जैसे निबंध भी अत्यंत पठनीय एवं मननीय हैं।
समाज-परिवर्तन के घोषणापत्र
सावरकर के निबंधों की सबसे प्रमुख विशेषता उनकी प्रज्ञा और प्रतिभा का अद्वितीय समन्वय है। उनकी तीक्ष्ण बुद्धि प्रत्येक विषय का तार्किक एवं निष्पक्ष विश्लेषण करती है, जबकि उनकी साहित्यिक प्रतिभा जटिल विचारों को ओजस्वी, प्रभावशाली और सहज भाषा में अभिव्यक्त करती है। भारतीय शास्त्रों, इतिहास, पश्चिमी दर्शन, विज्ञान तथा विश्व-क्रांतियों के व्यापक अध्ययन ने उनकी वैचारिक दृष्टि को असाधारण गहराई और व्यापकता प्रदान की। परिणामतः उनके निबंध केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति न होकर ज्ञान, तर्क और वैचारिक प्रखरता का उत्कृष्ट समन्वय बन जाते हैं।
उनके निबंधों का मूलाधार बुद्धिप्रामाण्यवाद है। वे प्रत्येक सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक प्रश्न का मूल्यांकन तर्क, विज्ञान और विवेक की कसौटी पर करते हैं। स्वतंत्रता के संदर्भ में वे लिखते हैं- “बड़ी-बड़ी क्रांतियां तलवार से अधिक तत्त्वों के बल पर घटित होती हैं।” किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट करते हैं- “लेकिन तलवार के बिना तत्त्वों की विजय कभी नहीं होती।” इस प्रकार वे आदर्श और शक्ति, दोनों की समान आवश्यकता प्रतिपादित करते हैं। इसी प्रकार अस्पृश्यता के संदर्भ में उनका व्यंग्यपूर्ण कथन- “गोमांस-भक्षक विधर्मी का स्पर्श स्वीकार्य है, कुत्ते-बिल्ली का स्पर्श भी स्वीकार्य है; लेकिन तुम्हारे ही धर्म के, तुम्हारे राम-कृष्ण को भजने वाले धर्मबंधु का स्पर्श स्वीकार्य नहीं-यह कितना बड़ा व्यंग्य है!”- सामाजिक रूढ़ियों की तार्किक विसंगति को उजागर करता है और पाठक को अपनी मान्यताओं पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करता है।
सावरकर के निबंध मूलग्राही चिंतन के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। वे किसी भी सामाजिक समस्या का विश्लेषण केवल उसके बाह्य स्वरूप तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसकी जड़ों तक पहुंचते हैं। जातिभेद और अस्पृश्यता के प्रश्न पर वे दोष किसी एक जाति पर आरोपित करने के स्थान पर पूरे समाज के संयुक्त उत्तरदायित्व की बात करते हैं। उनके अनुसार यदि ब्राह्मण महार को अछूत मानता है, तो महार भी मांग को और मांग भंगी को अछूत मानता है। अर्थात् छुआछूत की मानसिकता किसी एक वर्ग तक सीमित न होकर संपूर्ण समाज में विभिन्न स्तरों पर विद्यमान थी; अतः उसके उन्मूलन का दायित्व भी पूरे समाज का है। यह निष्कर्ष उनकी तथ्यनिष्ठा, निष्पक्षता तथा सामाजिक यथार्थ की गहरी समझ का परिचायक है। उल्लेखनीय है कि वे केवल सामाजिक समरसता के पक्षधर नहीं थे, बल्कि जाति-व्यवस्था के समूल उच्छेदन द्वारा हिंदू समाज की पूर्ण एकरूपता के समर्थक थे।
उनके मूलग्राही चिंतन की एक विशिष्ट विशेषता यह भी थी कि वे किसी सामाजिक प्रश्न को एकांगी दृष्टि से नहीं देखते थे, बल्कि उसके विविध आयामों का समग्र विश्लेषण करते थे। वे किसी समस्या के धार्मिक या सामाजिक पक्ष तक सीमित न रहकर उसके वैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्षों पर भी विचार करते थे। अस्पृश्यता के संदर्भ में वे लिखते हैं- “सभी प्रकार की छुआछूत को हम निषिद्ध मानते हैं; केवल वैद्यकीय दृष्टि से आवश्यक सावधानियां ही स्वीकार्य हैं।” इस कथन में वे सामाजिक अस्पृश्यता और चिकित्सकीय कारणों से बरती जाने वाली सावधानियों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वे इस प्रश्न का मूल्यांकन केवल जातिगत या धार्मिक संदर्भ में नहीं, बल्कि बहुस्तरीय दृष्टि से करते हैं। सामाजिक समस्याओं के इस प्रकार के समग्र विश्लेषण की प्रवृत्ति उनके चिंतन की विशिष्ट पहचान है।
सावरकर की लेखनी का एक प्रभावशाली पक्ष उपहास, उपरोध और व्यंग्य है। वे सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों और विसंगतियों पर तीखे व्यंग्य के माध्यम से प्रहार करते हैं। उनके लिए व्यंग्य केवल आलोचना का उपकरण नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण का माध्यम है। इसी प्रकार उनके निबंधों की रचना तर्कशुद्ध कोटिक्रम पर आधारित है। वे अपने प्रतिपाद्य को क्रमबद्ध तर्कों, ऐतिहासिक प्रमाणों तथा व्यावहारिक उदाहरणों के आधार पर सिद्ध करते हैं। विरोधी पक्ष के संभावित आक्षेपों का समाधान प्रस्तुत करना उनकी विशिष्ट शैली है। जातिभेद के संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि सामाजिक विखंडन राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र-निर्माण के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है।
सावरकर केवल वैचारिक निबंधकार नहीं, बल्कि कृतिशील समाज-सुधारक भी थे। उनके निबंधों के पीछे सदैव ठोस सामाजिक कार्यक्रम निहित रहते थे। रत्नागिरी प्रवास के दौरान उन्होंने सहभोज, सर्वजातीय मंदिर-प्रवेश तथा जातिभेद-उन्मूलन जैसे अनेक सामाजिक प्रयोगों द्वारा अपने विचारों को व्यवहार में परिणत किया। इस प्रकार उनकी लेखनी और कर्म में पूर्ण सामंजस्य दिखाई देता है।
सावरकर के निबंधों की इसी प्रभावशीलता का उल्लेख करते हुए वि. स. खांडेकर लिखते हैं-
“सावरकर के प्रत्येक निबंध से लेखक के अटूट आत्मविश्वास का साक्षात्कार होता है।” इससे भी आगे बढ़कर पु. भा. भावे का मत है कि ‘सावरकर के शब्द आत्मश्लाघा या उद्दंडता के नहीं, बल्कि उस मृत्युंजय पुरुष के थे जिसने जीवन भर मृत्यु को ललकारा। उनके अनुसार सावरकर के प्रत्येक शब्द में असीम तड़प, प्रखर निष्ठा और नैतिक अधिकार का संचार है; यही अंतःप्रेरणा उनके उपरोध, उपहास, वक्रोक्ति और प्रहार की वास्तविक शक्ति है।’
सावरकर के निबंध प्रज्ञा, बुद्धिप्रामाण्यवाद, मूलग्राही चिंतन, तर्कशुद्ध कोटिक्रम, प्रभावशाली व्यंग्य तथा कृतिशील दृष्टि का अद्वितीय समन्वय प्रस्तुत करते हैं। उनके निबंध केवल वैचारिक साहित्य नहीं, बल्कि समाज-परिवर्तन के घोषणापत्र हैं, जिनकी प्रासंगिकता सामाजिक सुधार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के संदर्भ में आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है।

















