बहुआयामी वीर सावरकर : कड़ी (3)
सावरकर एक निर्भीक तथा यथार्थवादी उपन्यासकार भी थे। उनके साहित्य में कल्पना की अपेक्षा ऐतिहासिक यथार्थ, सामाजिक विश्लेषण और राष्ट्रीय चेतना का अधिक प्रभाव दिखाई देता है। उनके दो प्रमुख उपन्यास- ‘मोपला विद्रोह अर्थात मुझे क्या उसका?’ (1926) तथा ‘कालापानी’ (1937) केवल साहित्यिक कृतियां नहीं, बल्कि तत्कालीन भारतीय समाज, कट्टरता, सामाजिक विघटन और राष्ट्रीय अस्मिता के संघर्ष का सजीव दस्तावेज हैं। इन दोनों उपन्यासों में सावरकर ने बिना किसी भय, संकोच अथवा कृत्रिम उदारतावाद के सत्य को उसी तीव्रता के साथ प्रस्तुत किया है, जैसा उन्होंने अनुभव किया था।
सामाजिक चेतना का घोष
इस उपन्यास का शीर्षक ही उसकी केंद्रीय समस्या को उद्घाटित कर देता है। “मुझे क्या उसका?” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि उस समय के हिंदू समाज की आत्मघाती उदासीनता का प्रतीक है। उपन्यास के प्रारंभ में ‘अरनाड’ क्षेत्र में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों, हत्याओं और स्त्रियों पर हो रहे अमानवीय अत्याचारों का समाचार ‘कुट्टम’ गांव तक पहुंचता है, किंतु वहां के लोग यह कहकर स्वयं को निश्चिंत कर लेते हैं कि ‘घटना तो कहीं और हुई है, उससे मेरा क्या संबंध?’। सावरकर इसी मानसिकता को हिंदू समाज के पतन का मूल कारण मानते हैं।
सामाजिक विषमता
उपन्यास का नायक ‘कंबू’ तथाकथित निम्न जाति से संबंध रखता है, किंतु वह संस्कृत का ज्ञाता, विचारशील और जागरूक हिंदू है। उसके माध्यम से सावरकर हिंदू समाज की आंतरिक विडंबनाओं पर तीखा प्रहार करते हैं। जब कंबू का पुत्र गंभीर रूप से बीमार होता है, तब तथाकथित सवर्ण हिंदू उसे सार्वजनिक तालाब के निकट तक जाने नहीं देते। समय पर जल और सहायता न मिलने के कारण उसके पुत्र की मृत्यु हो जाती है। यह प्रसंग केवल करुणा उत्पन्न नहीं करता, बल्कि हिंदू समाज में व्याप्त अमानवीय छुआछूत पर कठोर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
इसी परिस्थिति का लाभ उठाकर गांव का मौलवी कंबू को कन्वर्जन के लिए प्रेरित करता है। वह उसे समझाता है कि हिंदू समाज उसे ‘अछूत’ मानता है, जबकि इस्लाम समानता का संदेश देता है। किंतु कंबू इस प्रलोभन के सामने झुकता नहीं। वह स्पष्ट शब्दों में कहता है कि हिंदू समाज की सामाजिक कुरीतियां निंदनीय अवश्य हैं, परंतु वे सुधार योग्य हैं, जबकि मजहबी असहिष्णुता कहीं अधिक घातक है, जो दूसरों को स्थायी रूप से ‘काफिर’ मानकर उनके विनाश को उचित ठहराती है। यहां सावरकर दो स्तरों पर आलोचना करते हैं, एक ओर हिंदू समाज की सामाजिक बुराइयों की, दूसरी ओर इस्लाम की मजहबी कट्टरता की।
छद्म पंथनिरपेक्षता और विनाश
उपन्यास आगे चलकर तत्कालीन राजनीति पर भी तीखा व्यंग्य करता है। जब अरनाड में हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे थे, उसी समय तिरुरंगाडी के अनेक संपन्न हिंदू खिलाफत आंदोलन के लिए उदारतापूर्वक धन दे रहे थे। कंबू लोगों को आने वाले संकट के प्रति सावधान करता है, किंतु उसकी चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया जाता। शीघ्र ही वही लोग हिंसा के प्रथम शिकार बनते हैं। सावरकर यहां यह संकेत देते हैं कि छद्म पंथनिरपेक्षता और आत्मविस्मृति अंततः समाज को विनाश की ओर ले जाती है।
दंगों के फैलने पर कुट्टम गांव भी हिंसा की चपेट में आ जाता है। हिंदुओं के घरों में जबरन प्रवेश, लूट, बलात्कार और हत्याओं का भयावह चित्रण उपन्यास को अत्यंत मार्मिक बना देता है। सावरकर यह दिखाते हैं कि उपद्रवियों के लिए हिंदुओं की जातिगत भिन्नता का कोई महत्त्व नहीं, उनके लिए सभी केवल ‘काफिर’ हैं। इस व्यापक संकट के बीच केवल कंबू की संगठनात्मक चेतना ही हिंदुओं को प्रतिरोध के लिए तैयार करती है। संघर्ष इतना भीषण होता है कि गांव का कुआं हिंदुओं की लाशों से भर जाता है। यह दृश्य उपन्यास का भावनात्मक और वैचारिक चरम है। इसी के सामने दामू और सुमती हिंदू संगठन का संकल्प लेते हैं।
उपन्यास के अंत में सावरकरजी ने तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक उदासीनता पर तीखा प्रहार किया है। मोपला से सुदूर उत्तर भारत में बैठे खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले कांग्रेसी हिंदू यह दावा कर रहे थे कि मोपला में तो कुछ हुआ ही नहीं है। यहां तक कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को अपना आदर्श मानने वाले गांधी भी मोपला के उन हिंसक मुसलमानों को ‘शूर’ (बहादुर) कहकर संबोधित कर रहे थे।
इन सभी विसंगतियों और तुष्टीकरण की राजनीति का पूरा लेखा-जोखा लेते हुए, उपन्यास के अंत में सावरकरजी एक महान संदेश देते हुए लिखते है,”जब पेशावर की महार बस्ती की झोपड़ी भी रामेश्वरम् के हिंदू को अपने ही घर का हिस्सा प्रतीत होगी, तभी हिंदुओं पर होने वाले अन्याय समाप्त होंगे।” इस प्रकार यह उपन्यास केवल मोपला विद्रोह का वर्णन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, संगठन, आत्मरक्षा और राष्ट्रीय एकात्मता का घोष बन जाता है।
अंडमान से मुक्त होने के पश्चात सावरकरजी ने लगभग 1927 के आसपास अपनी आत्मकथा ‘मेरा आजीवन कारावास’ लिखी थी। इसके गुजराती में प्रकाशित होते ही 17 अप्रैल 1934 को अंग्रेज सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया। सावरकर इस प्रतिबंध को हटाने का प्रयास कर रहे थे, किंतु अंडमान की वास्तविक यातनाओं को समाज तक पहुंचाने के लिए उन्होंने साहित्य का मार्ग चुना। फलतः 1936 में ‘कालापानी’ नामक उपन्यास धारावाहिक रूप में प्रकाशित होना प्रारंभ हुआ और 1937 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ।
यह उपन्यास किसी एक नायक पर केंद्रित नहीं है, किंतु इसकी शुरुआत ‘स्वामी योगानंद’ से होती है, जो वास्तव में रफीउद्दीन अहमद नामक अपराधी होता है। मथुरा में उसकी बड़ी ख्याति फैली होती है। अपने खोए हुए पुत्र की खोज में रमाबाई अपनी पुत्री मालती के साथ उसके सत्संग में पहुंचती हैं। योगानंद उनकी भावनाओं का लाभ उठाकर विश्वास अर्जित करता है और अवसर पाकर मालती का अपहरण कर उसे अपनी वासना का शिकार बनाता है। बाद में पता चलता है कि तथाकथित स्वामी वास्तव में रफीउद्दीन अहमद है।
सावरकर ने रफीउद्दीन का चरित्र अत्यंत निर्लज्ज, क्रूर और पश्चातापविहीन व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है। न्यायालय में भी उसका उपहासपूर्ण व्यवहार जारी रहता है। जब न्यायाधीश उससे उसके भविष्य के बारे में पूछते हैं, तब वह व्यंग्यपूर्वक कहता है कि ‘न्यायाधीश अपनी मृत्यु नहीं देख पाएंगे और उसे इस मुकदमे में बरी भी नहीं करेंगे।’ यह संवाद उसके अपराधी अहंकार और मानसिक विकृति का प्रतीक बन जाता है।
उपन्यास का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष हिंदू समाज की अंधभक्ति और बाबागिरी पर प्रहार है। सावरकर दिखाते हैं कि किस प्रकार सामान्य ही नहीं, बल्कि वेदों का अध्ययन करने वाला किशन भी रफीउद्दीन जैसे ढोंगी के प्रभाव में आ जाता है। यह प्रसंग समाज को चेतावनी देता है कि अंधविश्वास और भावनात्मक भक्ति किस प्रकार विनाश का कारण बन सकती है।
किशन बाद में मालती को खोज निकालता है। वह अनेक बार गुलाम हुसैन की वासना का शिकार बन चुकी होती है। संघर्ष के दौरान मालती अवसर पाकर गुलाम हुसैन की हत्या कर देती है। हत्या के आरोप में किशन और मालती को आजीवन कारावास की सजा मिलती है। वे अपने नाम बदलकर कंटक और कंटकी रख लेते हैं तथा स्वयं को भाई-बहन बताते हैं, जबकि दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो चुके होते हैं। मालती का चरित्र उपन्यास की सबसे सशक्त उपलब्धियों में से एक है। अनेक अत्याचार सहने के बाद भी वह स्वयं को अपवित्र या पतित नहीं मानती, बल्कि परिस्थितियों की शिकार समझती है। अवसर मिलने पर वह अत्याचारी का वध करती है। इस दृष्टि से मालती का चरित्र शोषित स्त्रियों के लिए साहस, आत्मसम्मान और मानसिक दृढ़ता का प्रतीक बनकर उभरता है।
मौका मिलते ही कंटक व रफीउद्दीन दोनों अंडमान से भागने का प्रयास करते हैं। विस्मय की बात यह है कि मालती पर प्रेम करने वाला कंटक पुराने योगानंद अथवा रफीउद्दीन की करतूतें भुलाकर उसका साथ देने लगता है। वहीं उनकी भेंट डोलकाठी से होती है। डोलकाठी पहचान लेता है कि रफ़ीउद्दीन वही व्यक्ति है, जिसने पहले उसका धन हड़पने के लिए उसे समुद्र में धक्का दिया था। अंततः वह रफीउद्दीन की हत्या कर देता है। यहां सावरकर सांकेतिक रूप से धर्मांधता और भावनात्मक अंधत्व की मानसिकता को उजागर करते हैं।
उपन्यास का अंत अत्यंत मार्मिक और शोकपूर्ण है। डोलकाठी को एक ताबीज मिलता है, जिसे वह शुभ संकेत मानता है। बाद में उसे ज्ञात होता है कि कंटकी वास्तव में उसकी बिछड़ी हुई बहन मालती है। वह मालती का हाथ कंटक के हाथ में देकर भारत लौटने का निर्णय लेता है। उसे विश्वास होता है कि ताबीज उन्हें सुरक्षित पहुंचा देगा, किंतु मार्ग में दुर्घटना हो जाती है और तीनों की मृत्यु हो जाती है। यहां सावरकर अंधविश्वास की विडंबना को अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं। उपन्यास में कई गहरे सांस्कृतिक संकेत भी मिलते हैं। एक स्थान पर वनवासी जावर स्त्रियां मालती की साड़ी को “अश्लील” कहती हैं, क्योंकि उनके अनुसार पूर्ण वस्त्र पहनना असभ्यता है। इस प्रसंग के माध्यम से सावरकर संस्कृति और शिष्टाचार की सापेक्ष अवधारणा पर तीखा व्यंग्य करते हैं।
सावरकर के ये दोनों उपन्यास सत्य घटनाओं से प्रेरित हैं। उपन्यासकार सावरकर तथाकथित मानवतावाद अथवा सांप्रदायिक सद्भाव के दबाव में सत्य को छिपाने का प्रयास नहीं करते। वे राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए घटनाओं का निर्भीक और तथ्यनिष्ठ चित्रण प्रस्तुत करते हैं। ‘कालापानी’ पर चलचित्र बनाने की योजना सुधीर फड़के ने बनाई थी, किंतु सेंसर बोर्ड रफीउद्दीन के मुस्लिम नाम को बदलने की शर्त पर अड़ा रहा और सावरकर इसके लिए तैयार नहीं हुए। परिणामतः वह चलचित्र बन नहीं सका। आज के समय में संभवतः ऐसा प्रयास अधिक सहजता से किया जा सकता है। यदि मोपला कांड पर भी पूर्ण ऐतिहासिक यथार्थ के साथ चलचित्र बनाया जाए, तो वह केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि समाज को झकझोर देने वाला ऐतिहासिक दस्तावेज सिद्ध हो सकता है। सावरकर के ये उपन्यास आज भी सामाजिक चेतना, संगठन, आत्मरक्षा, अंधविश्वास-विरोध और राष्ट्रीय दृष्टि के महत्त्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं।

















