शरिया या पर्सनल लॉ से ऊपर देश का कानून! बाल विवाह पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, याचिका खारिज
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शरिया या पर्सनल लॉ से ऊपर देश का कानून! बाल विवाह पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुलंदशहर बाल विवाह मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि शरिया या कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह निषेध कानून (PCMA) से ऊपर नहीं हो सकता।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Jul 9, 2026, 01:26 am IST
in भारत, उत्तर प्रदेश
Allahabad High Court

भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में मुस्लिम समुदाय एक बात को लेकर बहस करता है, और वह है देश के कानून से ऊपर शरिया अर्थात इस्लामी कानून को मानने का। अभी हाल ही में महाराष्ट्र की भी एक नेता ने भी तीन तलाक और एक से ज्यादा शादियों को लेकर शरिया के पालन की बात कही थी। भारत में मुस्लिम समुदाय के नेता और मुस्लिम समुदाय के लोग भी वैसे तो अक्सर यही कहते हैं कि वे वतन की इज्जत करते हैं, मगर उन्हें शरिया के हिसाब से ही जीना है।

अब इसका अर्थ क्या हुआ? क्या इसका अर्थ यह है कि मुल्क या कहे वतन की इज्जत तभी हो पाएगी, जब देश से कानून से ऊपर शरिया होगा? और यह एक लंबा युद्ध है, जो बार-बार एक अंधे मोड पर जाकर समाप्त हो जाता है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है, उत्तर प्रदेश से।

यह मामला है उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर का, जहाँ पर एक 16 वर्षीय मुस्लिम लड़की की शादी को रोक दिया गया। पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम ने शादी को रोका और उन्हें इसके चलते हमला और धमकी दोनों ही झेलनी पड़ीं। लड़की के परिवारवालों पर एफआईआर भी दर्ज हुई, कि उन्होनें पुलिस और चाइल्ड लाइन की टीम के काम में बाधा डाली थी। यह भी आरोप लगा कि ये लोग लड़की को भी चाइल्ड लाइन टीम के सदस्य से छीनकर ले गए थे।

ये 19 लोग 15 फरवरी 2026 को अपने पर दर्ज एफआईआर रद्द कराने के लिए न्यायालय गए थे। उनका कहना था कि चूंकि शरिया में लड़की मासिक धर्म आरंभ होने के बाद शादी लायक हो जाती है, तो उन पर कोई मुकदमा बनता ही नहीं है और वे उस लड़की की शादी कर सकते थे।

मगर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन सभी लोगों की याचिका खारिज कर दी। जस्टिस जे जे मुनीर और अचल सचदेवा ने 19 लोगों की एफआईआर की याचिका को रद्द करते हुए कहा कि किसी भी प्रकार का कोई भी पर्सनल लॉ, फिर चाहे वह मुस्लिम पर्सनल लॉ हो या कोई और, वह Prohibition of Child Marriage Act, 2006 के द्वारा बाल विवाह पर लगाए गए प्रतिबंध का उल्लंघन नही कर सकता है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि शरिया जो मासिक धर्म आरंभ होते ही लड़की की शादी करने की इजाजत देती है, वह साफ तौर से बाल विवाह और उन कानूनों के खिलाफ है, जो नाबालिगों के बीच यौन संबंधों को प्रतिबंधित करते हैं।

न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय के निर्णय से सहमति जताई

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की इस बेंच ने यह अवश्य कहा कि इस विषय में विरोधाभासी विचार होते हैं, मगर उन्होनें केरल उच्च न्यायालय के वर्ष 2024 के निर्णय से सहमति जताई कि कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह निषेध कानून को ओवरराइड नहीं कर सकता, फिर चाहे आप किसी भी धर्म का पालन करते हों।

न्यायालय ने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय पर 2025 में संदेह व्यक्त किया था, कि क्या पर्सनल कानून बाल विवाह निषेष कानून पर हावी हो सकते हैं, परंतु prohibition of Child Marriage (Amending) Bill 2021 लोकसभा भंग होने से पास नहीं हो पाया।

न्यायालय ने पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम की सराहना की

यह ध्यान देने वाली बात है कि न्यायालय ने पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम की सराहना की, कि उन्होनें लड़की को बचाने के लिए बहुत निष्ठा से कार्य किया।

यह निर्णय भारत के मुस्लिम समुदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे मुस्लिम लड़कियों को जल्दी शादी से छुटकारा मिल सकता है क्योंकि अभी तक लोग शरिया का सहारा लेकर लड़कियों की जल्दी शादी कर देते थे। अब ऐसे लोगों को कानूनी कार्यवाही का डर रहेगा, और मुस्लिम समुदाय की लड़कियों के लिए भी अवसरों के नए दरवाजे खुल सकते हैं।

विकसित मुस्लिम देशों में क्या है लड़कियों की शादी की उम्र

जब भी हम मुस्लिम देशों की बात करते हैं, तो कुछ ही देशों तक रुक जाते हैं, जैसे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान या फिर ईराक! परंतु विश्व में जो विकसित मुस्लिम मुल्क हैं, और जो अपनी बेटियों को आगे बढ़ने के तमाम अवसर दिला रहे हैं, वहाँ पर लड़कियों की शादी की उम्र प्राय: 18 वर्ष है। तुर्की, ट्यूनीशिया, मोरक्को और इंडोनेशिया जैसे देशों में शादी की न्यूनतम उम्र 18–19 वर्ष तय की गई है। मोरक्को में न्यायालय की अनुमति से छूट जरूर है, मगर अधिकतर शादी की उम्र लड़कियों के लिए 18 ही है। इंडोनेशिया में लड़के और लड़की दोनों के लिए ही शादी की उम्र 19 वर्ष है।

पाकिस्तान में जरूर कहने के लिए यह उम्र 18 वर्ष है, मगर इसे माना नहीं जाता है। हाल ही में पंजाब सरकार ने बाल निकाह को रोकने के लिए एक कानून बनाने का प्रयास भी किया था, मगर कट्टरपंथियों ने इसे लागू नहीं होने दिया। उन्होनें यह तर्क दिया था कि गर शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष कर दी गई तो वे हिन्दू लड़कियों का निकाह नहीं करवा पाएंगे, क्योंकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों को अक्सर कम उम्र में जबरन शादी के लिए निशाना बनाया जाता है।

पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, ईराक जैसे देशों में शादी की उम्र निर्धारित नहीं है और इसके परिणाम स्वरूप वहाँ पर लड़कियों की भागीदारी भी आर्थिक योगदान में काफी कम है।

देखना होगा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस निर्णय का स्वागत किया जाता है या फिर इस निर्णय का विरोध किया जाएगा, जिसमें बेटियों को ध्यान में रखकर कहा गया है कि “शरीयत/मुस्लिम पर्सनल लॉ  के अनुसार puberty पर शादी की अनुमति भारतीय कानूनों — Prohibition of Child Marriage Act, 2006 (PCMA) और POCSO Act — के खिलाफ है, और भारत में सभी धर्मों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष समान रूप से लागू होती है।“

 

Topics: इलाहाबाद हाईकोर्ट ऐतिहासिक फैसलाProhibition of Child Marriage Act 2006मुस्लिम पर्सनल लॉ बाल विवाहजस्टिस जे जे मुनीरबुलंदशहर बाल विवाह एफआईआरKerala High Court Judgement 2024Panchjanya newsLegal News IndiaSharia vs Child Marriage Act
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