नाटो समिट: अमेरिका पर निर्भरता से पहले यूरोप को यह करने की है जरूरत!
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नाटो शिखर सम्मेलन: अमेरिका से उम्मीदों पहले यूरोप खुद से पूछे ये 5 कठिन प्रश्न, क्या रणनीतिक भूलों से मजबूत हुआ चीन?

नाटो शिखर सम्मेलन 2026 और यूक्रेन युद्ध के बीच जानिए क्यों यूरोप को अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपनी कूटनीतिक और रणनीतिक भूलों का आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Jul 8, 2026, 01:07 am IST
inविश्व, विश्लेषण, मत अभिमत
NATO Summit 2026 Ukraine War Europe Strategic Review Russia China Alliance Donald Trump

जब नाटो के सदस्य देश यूक्रेन युद्ध, यूरोप की सामूहिक सुरक्षा और अटलांटिक गठबंधन के भविष्य पर विचार करने के लिए एकत्र हुए हैं, तब एक मूलभूत प्रश्न अनिवार्य रूप से उठता है—क्या आज जिस संकट. के समाधान के लिए यूरोप अमेरिका से अधिक सक्रिय भूमिका की अपेक्षा कर रहा है, उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने में उसकी अपनी कुछ रणनीतिक भूलों की भी भूमिका रही है?

निस्संदेह, नाटो ने पिछले सात दशकों में यूरोप में स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने में ऐतिहासिक योगदान दिया है। किंतु किसी भी सशक्त गठबंधन की वास्तविक शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता में नहीं, बल्कि अपनी नीतियों की निष्पक्ष समीक्षा करने के साहस में निहित होती है।

यूक्रेन का वर्तमान संघर्ष किसी एक घटना का परिणाम नहीं है। यह वर्षों से बढ़ते अविश्वास, असफल कूटनीति, परस्पर विरोधी सुरक्षा अवधारणाओं और अनेक पक्षों द्वारा की गई रणनीतिक भूलों का संयुक्त परिणाम है।

सुरक्षा कभी भी एकतरफा व्यवस्था नहीं हो सकती

प्रत्येक संप्रभु राष्ट्र को अपनी विदेश नीति और सुरक्षा संबंधी निर्णय स्वयं लेने का अधिकार है। यही आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

लेकिन इतिहास का एक दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण सत्य भी है—कोई भी महाशक्ति अपने दरवाज़े तक किसी प्रतिद्वंद्वी सैन्य गठबंधन के विस्तार को सहज रूप से स्वीकार नहीं करती।

1962 के क्यूबा मिसाइल संकट में स्वयं अमेरिका ने सोवियत संघ की सैन्य उपस्थिति को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अस्वीकार्य माना था।

इसी प्रकार, रूस की सुरक्षा संबंधी चिंताओं से सहमत होना आवश्यक नहीं है, किंतु उन्हें पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देना भी शायद दूरदर्शी कूटनीति नहीं कहा जा सकता।

सफल कूटनीति का आधार केवल अपने मित्रों की चिंताओं को समझना नहीं, बल्कि अपने प्रतिद्वंद्वी की सुरक्षा संबंधी आशंकाओं को भी समझना होता है।

क्रीमिया के बाद की नीति और उसके दूरगामी परिणाम

2014 में क्रीमिया के अधिग्रहण के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कठोर प्रतिबंध लगाए तथा उसे जी-8 से बाहर कर दिया।

उस समय यह निर्णय रूस की कार्रवाई के विरोध के रूप में उचित माना गया।

लेकिन एक गंभीर प्रश्नg आज भी विचारणीय है—

क्या इन कदमों ने रूस को अलग-थलग किया, या उसे चीन की ओर और अधिक धकेल दिया?

पिछले एक दशक में रूस और चीन के बीच ऊर्जा, रक्षा, प्रौद्योगिकी, वित्त तथा वैश्विक कूटनीति के क्षेत्रों में अभूतपूर्व निकटता आई है।

यदि पश्चिम का उद्देश्य रूस को रणनीतिक रूप से अलग-थलग करना था, तो यह स्वीकार करना होगा कि उसका परिणाम अपेक्षित दिशा में नहीं गया।

सबसे बड़ा लाभार्थी: चीन

जब यूरोपn और रूस वर्षों तक टकराव में उलझे रहे, तब चीन ने अत्यंत धैर्यपूर्वक इस स्थिति का लाभ उठाया।

रूस धीरे-धीरे चीनी बाजारों और निवेश पर अधिक निर्भर होता गया।

दूसरी ओर, यूरोप को सस्ती रूसी ऊर्जा का विकल्प खोजने में भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ी।

ऊर्जा संकट, महँगाई, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में गिरावट तथा रक्षा बजट में बढ़ोतरी ने यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव डाला।

इन सबके बीच चीन ने बिना एक भी गोली चलाए अपनी वैश्विक स्थिति को और मजबूत कर लिया।

इतिहास बार-बार सिद्ध करता है कि कई बार युद्ध मैदान में नहीं, बल्कि विरोधियों की रणनीतिक भूलों से जीते जाते हैं।

मध्य-पूर्व: ट्रांस-अटलांटिक मतभेद का दूसरा मोर्चा

यूरोप और अमेरिका केn बीच मतभेद केवल यूक्रेन तक सीमित नहीं हैं।

मध्य-पूर्व में भी दोनों पक्षों की प्राथमिकताओं में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।

अमेरिका आज भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम तथा उसके क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों को गंभीर सुरक्षा चुनौती मानता है।

यूरोपीय देश भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित हैं, किंतु वे सामान्यतः प्रतिबंधों और प्रतिरोधक क्षमता के साथ-साथ कूटनीतिक समाधान पर भी अधिक बल देते हैं। इसी बीच गाज़ा युद्ध को लेकर यूरोप, अमेरिका और इज़राइल के बीच कई नीतिगत मतभेद भी उभरकर सामने आए हैं।

यह बहस अभी भी जारी है कि दीर्घकालिक क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कौन-सा दृष्टिकोण अधिक प्रभावी सिद्ध होगा।

राष्ट्रपति ट्रम्प और ‘बोझ साझा करने’ की नीति

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि अमेरिका अपने सहयोगियों की सुरक्षा का एकमात्र वित्तपोषक नहीं बन सकता।

उनका तर्क केवल रक्षा बजट तक सीमित नहीं है।

उनका व्यापक संदेश यह है कि मित्र राष्ट्रों की सुरक्षा सामूहिक उत्तरदायित्व होनी चाहिए, न कि केवल अमेरिकी करदाताओं की।

अमेरिका की जनता का एक बड़ा वर्ग मानता है कि दशकों से चली आ रही विदेश नीति ने अमेरिका पर अनुपातहीन आर्थिक और सामरिक बोझ डाला है।

आगे का रास्ता

यूरोप की सुरक्षा अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है।

उतना ही महत्वपूर्ण अमेरिका और यूरोप के बीच विश्वास तथा सहयोग का बने रहना भी है।

लेकिन किसी भी गठबंधन की सफलता केवल एकजुटता से नहीं, बल्कि ईमानदार आत्ममंथन से भी तय होती है।

यूरोप को यूक्रेन की संप्रभुता का समर्थन जारी रखना चाहिए।

साथ ही रूस को भी यह स्वीकार करना होगा कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को सैन्य बल के माध्यम से बदलना विश्व व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करता है।

दूसरी ओर, भविष्य की यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था ऐसी भी नहीं हो सकती जो किसी बड़ी शक्ति की सुरक्षा संबंधी चिंताओं की पूरी तरह उपेक्षा कर दे।

स्थायी शांति केवल सैन्य शक्ति से नहीं आती।

उसके लिए कूटनीति, यथार्थवाद, संतुलन, संवाद और दूरदर्शिता समान रूप से आवश्यक हैं।

नाटो की वास्तविक चुनौती

आज नाटो के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल यूक्रेन की सहायता करना नहीं है।

वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि वर्तमान क्षेत्रीय संघर्ष भविष्य में किसी व्यापक वैशिक टकराव का रूप न ले।

इतिहास उन राष्ट्रों को सबसे अधिक सम्मान देता है जो युद्ध जीतने के साथ-साथ शांति की स्थायी व्यवस्था भी स्थापित कर सकें।

यदि नाटो, यूरोप, अमेरिका और रूस इस संकट से कोई स्थायी शिक्षा ग्रहण कर सकें, तो संभव है कि आने वाली पीढ़ियाँ इस संघर्ष को केवल विनाश के रूप में नहीं, बल्कि अधिक संतुलित और सुरक्षित वैशिक व्यवस्था की दिशा में एक कठिन लेकिन महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में याद करें।

Topics: Panchjanya newsPanchjanya OpinionNATO Summit 2026यूक्रेन रूस युद्ध 2026यूरोपीय सुरक्षा और नाटोरूस चीन रणनीतिक गठबंधनक्रीमिया संकट इतिहासडोनाल्ड ट्रम्प नाटो नीतिTrans-Atlantic Relations
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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