स्वामी विवेकानंद माँ भारती के ऐसे देदीप्यमान सूर्य हैं; जिनके कालजयी विचार महासमाधि के 124 वर्ष बाद भी प्रासंगिक बने हैं। 4 जुलाई 1902 को 39 वर्ष, पांच महीने और 24 दिन की संक्षिप्त लोकलीला पूर्ण कर परमतत्व में विलीन हो जाने वाले इस महामनीषी ने दासता के अंधयुग में भारतभूमि के सनातन और सार्वभौम जीवनमूल्यों को विश्वमंच से समूची दुनिया में संचारित किया था।
स्वतंत्रता आंदोलन पर स्वामी जी का गहन प्रभाव
भारतभूमि के प्रति जो अगाध प्रेम स्वामी विवेकानंद जी ने देशवासियों में संचालित किया था, वही स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य प्रेरणा बना। भारत भ्रमण के दौरान देशभर के राजाओं को जोड़ने का प्रयत्न भी इस उद्देश्य से किया था। आजादी के आंदोलन के सभी चरणों पर उनका व्यापक प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।
प्रचंड तपश्चर्या से सूक्ष्म जगत का उद्वेलन
स्वामी विवेकानंद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधा माने जाते हैं। उन्होंने अपनी प्रचंड तपश्या से सूक्ष्म जगत को इतना मथ डाला था कि भारत की प्रसुप्त आत्मा जाग उठी थी। इसी का परिणाम था कि जन-जन में स्वतंत्रता की ज्वाला धधक उठी। युवाओं में स्वतंत्रता के लिए आत्माहुति के पीछे उनकी ही प्रेरणा थी। सूक्ष्म स्थूल का आधार होता है। जो सूक्ष्म में घटित होता है वही कालांतर में स्थूल में परिवर्तित हो जाता है। भगिनी निवेदिता के अनुसार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव फ्रांसीसी क्रांति पर रूसो के प्रभाव अथवा रूसी व चीनी क्रांति पर कार्ल मार्क्स के प्रभाव से किसी भी तरह से कम नहीं था। कोई भी स्वतंत्रता आंदोलन राष्ट्रव्यापी चेतना के पृष्ठभूमि तैयार किए बिना आकार नहीं ले सकता। सभी समकालीन स्रोतों से स्पष्ट हो जाता है कि भारत में राष्ट्रीयता की भावना की जागरण में विवेकानंद का प्रभाव सबसे सशक्त था। वे नींव के निर्माण में लगने वाली आधारशिला ही नहीं, राष्ट्रीय जीवन के अन्यतम प्रतीक भी थे। अपनी मित्र व स्वामी विवेकानंद की अनुयायी श्रीमती एरिक हेमंड को भेजे पत्र में भगिनी निवेदिता ने इस बात का उल्लेख करते हुए लिखा था,‘’अंग्रेज उनके प्रति आशंकित हैं। अल्मोड़ा में पुलिस अपने जासूसों के द्वारा स्वामी जी पर दृष्टि रही है। यद्यपि स्वामी जी इस बात को गंभीरता से नहीं लेते हैं पर यदि ब्रिटिश सरकार स्वामी जी के खिलाफ कोई अनुचित कदम उठाएगी तो उसका विरोध करने वाली राष्ट्रवादी ताकतों में वे भी पूर्ण निष्ठा से शिरकत करेंगी।‘’
क्रांतिकारियों की विवेकानंद साहित्य में विशेष रुचि
स्वामी जी के लेखों और भाषणों ने अनेक सुशिक्षित हिंदुओं पर गहरी छाप छोड़ी थी। उस दौर में पुलिस जब भी किसी क्रांतिकारी के घर की तलाशी लेने जाती थी तो वहां उसे वहां स्वामी विवेकानंद जी की पुस्तकें मिलती थीं। महान क्रांतिकारी ब्रह्मबांधव उपाध्याय और अश्विनी कुमार दत्त का कहना था कि स्वामी जी ने उन्हें बंगाली युवाओं की अस्थिओं से एक ऐसा शक्तिशाली हथियार बनाने को कहा था जो भारत को स्वतंत्र करा सके। चर्चित बंगाली लेखक कालीचरण घोष अपनी प्रेरणादायी रचना ‘’दि रोल ऑफ ऑनर एनेक्टोड ऑफ इंडियन मार्टियर्स’’ में बंगाल के युवा क्रांतिकारियों के मन पर स्वामी जी के प्रभाव के बारे में विस्तार से लिखते हैं कि स्वामी जी की वाणी ने न सिर्फ बंगाली युवाओं के मन में राष्ट्रभक्ति की भावना भरी थी वरन उनमें राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय होने की प्रवृत्ति भी विकसित की थी। स्वामी विवेकानंद के बौद्धिक जगत पर पड़ा प्रभाव उनके देहावसान के बाद बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में श्री अरविंद के उद्भव के रूप में सामने आया था।
स्वामी जी के द्वितीय होने की कल्पना भी असम्भव
निसंदेह यदि हम भारत को सही अर्थों में जानना चाहते हैं तो हमें विवेकानन्द के विचारों को पूरी ईमानदारी से पढ़ने की जरूरत है। महज 39 वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये, वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक हम भारतवासियों का सशक्त मार्गदर्शन करने में सक्षम हैं। तीस वर्ष की आयु में इस युवा संन्यासी ने शिकागो (अमेरिका) के विश्व धर्म सम्मेलन में जिस ओजस्विता के साथ हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व कर उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवायी, वह अतुलनीय है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का कहना था, ‘’यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।” इतिहासकार रोम्या रोलां के मुताबिक, “उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे।”
‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ’ का अनूठा प्रबोधन
स्वामी विवेकानंद के उपदेशात्मक वचनों में एक सूत्र वाक्य लोकविख्यात है – “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” कठोपनिषद् 3/14 के इस ज्ञान सूत्र को अंगीकृत कर स्वामी जी ने देशवासियों को अज्ञानजन्य अंधकार से बाहर निकलकर ज्ञानार्जन की प्रेरणा दी थी। स्वामी विवेकानंद ने इस राष्ट्र मंत्र का उद्घोष इसीलिए किया था क्योंकि वे देश में कभी न सोने वाले ज्ञानी योद्धाओं को देखना चाहते थे। ऐसे योद्धा जिनके पास ज्ञानरूपी अस्त्र हों और जो कभी बरगलाए न जा सकें। श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी इस श्लोक की व्याख्या करते हुए कहते हैं, “उठो जागो और श्रेष्ठ ज्ञानियों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो। ज्ञान के बिना इस जगत में कुछ भी उन्नति साध्य नहीं हो सकती। यह आत्मज्ञान और आत्मोन्नति का मार्ग अत्यंत कठिन है वैसे ही जैसे तलवार की तीक्ष्ण धार पर चलना। इस पथ पर संभलकर चलना चाहिए, पथ से थोड़ा भी डिगे तो पतन हो जाएगा। सब ज्ञानी इस मार्ग का ऐसा ही वर्णन करते आए हैं। सदा सावधान रहना चाहिए। उठो जागो, यहाँ सोने से काम नहीं चलेगा।”
हिन्दू चिन्तन पूरी दुनिया के लिए ईर्ष्या का विषय
स्वामी जी कहते थे कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की भूमि है; संन्यास एवं त्याग की पुण्यभूमि है। दुनियाभर में केवल यहीं आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिये जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला है। उनकी प्रगाढ़ मान्यता थी कि भारतभूमि की गोद में जन्मे ऋषियों-मुनियों और महात्माओं ने मानव के सर्वांगीण उत्थान की सर्वाधिक ईमानदार कोशिशें की हैं। वे कहते थे कि हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए ईर्ष्या का विषय है। स्वामी जी का कहना था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरूरत भी है लेकिन हमें याचक नहीं बनना चाहिये। हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ है जो हम पश्चिम को दे सकते हैं और पश्चिम को उसकी बेहद जरूरत है।

















