पर्यावरण दिवस पर विशेष : प्रकृति ही परमात्मा
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पर्यावरण दिवस पर विशेष : प्रकृति ही परमात्मा

महाकवि कालिदास से लेकर स्वामी विवेकानंद और श्रीगुरुजी तक, भारतीय मनीषा ने प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि ईश्वर का प्रत्यक्ष स्वरूप माना है। आज जब पर्यावरण संकट मानव अस्तित्व को चुनौती दे रहा है, तब भारतीय एकात्म दृष्टि ही उसके स्थायी समाधान का मार्ग दिखाती है।

Written byइन्दुशेखर तत्पुरुषइन्दुशेखर तत्पुरुष
Jun 4, 2026, 11:48 pm IST
inविश्व, विश्लेषण, पर्यावरण

‘या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री।
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्॥
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः।
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वः ताभिरष्टाभिरीशः।।’

महाकवि कालिदास ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के मंगलाचरण में शिव के अष्टमूर्ति स्वरूप का स्मरण करते हुए कहते हैं कि ‘संसार के समस्त प्राणी जिनके कारण जीवित रहते हैं, ऐसे प्रत्यक्ष आठ स्वरूपों वाला ईश्वर आप सबकी रक्षा करे।’ भगवान शिव की ये आठ देह हैं-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा और होता अर्थात् यज्ञकर्ता। ये आठों तत्व भगवान शिव की ऐसी मूर्तियां हैं, जो हमारे जीवन में प्रत्यक्ष रहती हुई हमारा पालन, पोषण और रक्षण करती हैं।

अपने एक अन्य नाटक ‘मालविकाग्निमित्रम्’ के भी वे अष्टमूर्ति शिव का स्मरण करते हुए कहते हैं कि, जिसके आठ तनुओं से यह सम्पूर्ण जगत सम्पूर्ण भोगों को धारण करता है, वह ईश्वर आपको सन्मार्ग दिखाए। कालिदास कहते हैं कि मनुष्यों द्वारा भोगे जाने वाले समस्त सुख-संसाधन इस अष्टमूर्ति की कृपा से ही सुलभ होते हैं।
‘अष्टाभिर्यस्य कृत्स्नं जगदपि तनुभिर्बिभ्रतो विश्वभोगान्।’

पर्यावरण का प्राचीन भारतीय बोध

दो हजार वर्ष पूर्व भारतवर्ष का यह महाकवि ईश्वर के जिस प्रत्यक्ष स्वरूप को ‘प्राणियों के जीवित रहने और संसार के भोगों को धारण करने’ का कारण मानता है, उसी को आज के वैज्ञानिक पर्यावरण कहते हैं। वर्तमान युग की हमारी पर्यावरण की चिंता इस अष्टमूर्ति ईश्वर अर्थात् पंचमहाभूत, सूर्य, चंद्रमा और इन सब से प्रभावित मनुष्य, इनकी सामूहिक चिंता से अलग नहीं है। जैसा कालिदास ने कहा है और आज हम सब जानते हैं, विश्व के समस्त सुख-वैभव इसी अष्टमूर्ति पर्यावरण के अधीन हैं।हमारा जीवन सृष्टि के जिन उपादानों पर निर्भर है, वे मूलतः वायु, जल और भोजन हैं। इनके बिना क्रमशः कुछ पलों, कुछ दिनों और कुछ सप्ताहों में ही हमारा प्राणांत हो जाता है। हमारे जीवन-यज्ञ की ये आधारभूत समिधाएं हमें जहां से उपलब्ध होती हैं, उस समूचे संकुल का ही नाम पर्यावरण है। आज यही पर्यावरण जिस स्तर पर विकृत होकर प्रलयंकारी सिद्ध हो रहा है, वह सचमुच दिल दहलाने वाला है। समुद्र, नदी, पर्वत, घाटी, धरातल में से कब कौन कुपित होकर तबाही मचा दे, यह आशंका हर समय लगी रहती है। आधुनिक विश्व में पर्यावरण के प्रति विशेष चिंता और रणनीतियां 1960-70 के दशक में आरम्भ होने लगी थीं। माना जाता है कि सन् 1962 में प्रकाशित रेचेल कार्सन की पुस्तक ‘साइलेंट स्प्रिंग’ ने कीटनाशकों के पर्यावरणीय प्रभावों को उजागर कर आधुनिक पर्यावरणीय आंदोलन की नींव रखी। किन्तु संसार में पहली उल्लेखनीय हलचल 22 अप्रैल 1970 को हुई, जब पहला ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ मनाया गया तथा जिसकी परिणति सन् 1972 में आयोजित ‘स्टॉकहोम सम्मेलन’ में हुई। यह संयुक्त राष्ट्र का पहला वैश्विक पर्यावरण सम्मेलन था, जिसमें पर्यावरण संबंधी चिंता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। इस सम्मेलन से ही संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का जन्म हुआ, जो वैश्विक पर्यावरण नीतियों का आधार बना।

श्रीगुरुजी की दूरदृष्टि

विस्मय की बात है कि संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी, जिनकी ख्याति एक आध्यात्मिक चेतना से सम्पन्न मनीषी के रूप में थी, ऐसे जागतिक विषयों के प्रति भी अत्यंत सजग रहने वाले दूरदृष्टा थे। उन्होंने पर्यावरण को लेकर होने वाली वैश्विक योजनाओं से बहुत पहले ही इस आसन्न संकट की भयावहता को भांपकर गहरी चिंता व्यक्त की थी। ऑर्गनाइजर (14 नवंबर 1955) के एक आलेख ‘आण्विक युग और धर्म’ में वे लिखते हैं कि,-व्यक्ति जिस तरह पहाड़ों को समतल करने का प्रयास कर रहा है, जंगल काटता जा रहा है, यहां तक कि धरती माता को संपदाविहीन बना रहा है, प्राकृतिक स्रोतों के जल-प्रवाहों को प्रतिबंधित करते हुए उन्हें अपनी पसंद एवं निर्मिति के अनुरूप प्रवाहित होने के लिए बाध्य कर रहा है, वह सब सृष्टि के प्रति उसके अत्यल्प सम्मान को बताने वाला है। अति आत्मतुष्टि व स्वकेंद्रित दर्प से युक्त होकर वह अति विशाल प्रकल्पों को हाथ में ले रहा है, मानो वह त्रिकालदर्शी एवं सर्वशक्तिमान हो, अथवा प्रकृति की उत्पत्ति व लय में सक्षम द्वितीय विधाता बन गया है। वह अपनी हठधर्मिता के कारण विशाल उद्यमों के प्रभावों को देखने को तैयार नहीं है।

प्रकृति जब तक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती, तब तक उसके साथ खिलवाड़ करना सरल है, किंतु जब वह पलटकर वार करेगी (अनिवार्य रूप से करेगी ही), तब मनुष्य को कौन बचाएगा। किन्तु वह तो बिना विचार किए, शीघ्रता से प्रकृति की स्वाभाविक दिशा को ही बदलना चाहता है।’ गुरुजी इस आलेख में मनुष्य की आत्मघाती प्रवृत्ति और उसके भयावह परिणामों की ओर भी संकेत करते हैं। ‘… इसी का परिणाम है कि वर्तमान में विश्व विनाश की आशंका से भयकंपित है, उसकी कृष्णछाया में जीने के लिए विवश है। एक ओर तो मनुष्य को सुखी बनाने के लिए योजनाएं बनाई जा रही हैं तो दूसरी ओर प्रकृति की गूढ़ शक्तियों को नियंत्रण में लाकर सृष्टि पर विजय प्राप्त कर स्वामी बनने के अनधिकार प्रयास कर आत्मविनाश को निमंत्रण दिया जा रहा है।’ (श्री गुरुजी समग्र : खंड 6, पृष्ठ 33)

भोगवाद और विनाश का संकट

पर्यावरण प्रदूषण के सर्वप्रमुख कारणों में हमारी सीमाहीन उपभोग-लिप्सा ही है। मनुष्य अपनी राक्षसी वृत्ति के वशीभूत यह समझता है कि यह सम्पूर्ण जल-थल-पवन-अगन-गगन का मैं ही स्वामी हूं। यह सब मेरे ही उपभोग के लिए बने हैं। जंगलों का निर्मम उच्छेदन, मिल-कारखानों के विषैले उत्सर्ग, पेट्रोलियम पदार्थों का भरपूर दहन, प्लास्टिक-इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पहाड़ आदि जितने भी प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं, सब हमारी ऐकांतिक भोगवादी दृष्टि की उपज हैं।

जीवनसिद्धि के लिए साधन और साधना दोनों ही अनिवार्य हैं। हमने साधन तो ढेरों जुटा लिए, किन्तु साधना लुप्त हो गई। सारा संसार साधनाशून्य होकर संसाधनों के पीछे दौड़ रहा है। भौतिक समृद्धि की चकाचौंध में हमारी आंखों को जो संकट दिखाई नहीं दे रहा, वही असली संकट है। वह है सीमाहीन अनियंत्रित उपभोग की प्रवृत्ति। संतोष, सादगी और अपरिग्रह आदि भाव तो जैसे अब शब्दकोशों की वस्तु रह गए। ‘अधिक चाहिए-अभी चाहिए’ की घातक प्रवृत्ति ने मानव को विवेकहीन पशु बना दिया।

ऐसे में तो स्वामी विवेकानंद की एक चेतावनी अवश्य याद कर लेनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि- ‘यदि इतिहास में कुछ भी सत्यता है और वर्तमान लक्षणों में भविष्य का कुछ भी आभास दिखाई देता है, तो अन्त में उन्हीं की विजय होगी जो बहुत ही कम द्रव्यों पर निर्भर रहते हुए जीवन व्यतीत करने और अच्छी तरह से आत्मसंयम का अभ्यास करने की चेष्टा करते हैं; और जो भोग-विलास तथा ऐश्वर्य के उपासक हैं, वे वर्तमान में कितने ही बलशाली क्यों न हों, अन्त में अवश्य ही विनष्ट होंगे तथा संसार से विलुप्त हो जायेंगे।’ (विवेकानंद साहित्य, पंचम खंड, पृष्ठ 78)
अपनी रक्तबीजी लिप्सा को तृप्त करने की आपाधापी में मानव निर्दयता से प्रकृति पर टूट पड़ा है, जिसका दुष्परिणाम है पर्यावरण-प्रदूषण।

भारतीय एकात्म दृष्टि का समाधान

इस पर्यावरण संकट का स्थायी समाधान भारतीय दृष्टि के अनुकूल जीवन-व्यवहार में ही संभव है, जो ‘एकात्मता’ पर आधारित है।
जहां हर एक कंकर, अभयंकर शंकर में रूपायित हो जाता हो, माटी का ढेला गणपति बनकर पूजा की थाली में आ विराजता हो, हरी-हरी दूब कुम्भकलशों में नहाकर शुद्धिमंत्रों के साथ अंगुलियों में थिरकती हो, हर सांझ तले पहला दीप तुलसी के बिरवों की गोद में पधराया जाता हो, वहां के जनजीवन का प्रकृति-पर्यावरण के साथ कितना तादात्म्य है, यह अनुभव सहज ही किया जा सकता है।

देवतात्मा हिमालय से लेकर सुदूर मलयाचल तक हर छोटे-बड़े पर्वत हमारी आस्था के केन्द्र रहे हैं। चंबल हो या सतलज, कावेरी हो या गोदावरी, हमने उसे गंगा के समान पापमोचनी और मुक्तिदायिनी माना। वट, पीपल, नीम, अशोक, अर्जुन, शमी, देवदारु जैसे महावृक्ष हों या तुलसी, आक, धत्तूर, कनेर जैसे छोटे-बड़े क्षुप, सभी हमारे उपास्य रहे हैं। इन वृक्षों की हजारों-हजारों जड़ें धरती के अंदर नागों के समान पसरी हुई, आड़ी-टेढ़ी होकर जिस दृढ़ता के साथ मिट्टी को थामे रखती हैं, उसे देखकर सहस्त्रफण वाले भगवान शेषनाग द्वारा धरती को धारण करने की कथा स्मरण हो उठती है।जीवविज्ञान की शाखा पारिस्थितिकी (ईकॉलोजी) की मान्यता है कि प्रकृति का प्रत्येक जीव पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाता है। हर एक जीव का अपना महत्व है और वह एक श्रृंखला के रूप में स्वयं को हमसे जोड़े हुए रहता है। अत्यन्त निरुपयोगी प्रतीत होने वाला सूक्ष्मतम कीट भी इस प्रकृतिचक्र को व्यवस्थित रखने में भाग लेता है। सहस्राब्दियों पूर्व भारतीय मनीषा ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को न केवल हृदयंगम किया, अपितु अपनी जीवन-संरचना भी इसी के अनुरूप निर्धारित की।

चींटी से लेकर चिड़िया तक और चूहे से लेकर हाथी तक, सारे जीव-जन्तु हमारी विश्वपोषी एकात्म दृष्टि की परिधि में समाविष्ट हो गए। हाथ में आटे की पोटली लेकर चींटियों के बिल ढूंढते, निर्जन अरण्यों में वृक्षों की शाखों पर पानी से भरे कुण्डे लटकाते, गायों और कुत्तों को रोटी खिलाने वाले मनुष्य देश के हर नगर-ग्राम, हर बस्ती में आज भी मिल जाते हैं। प्रमुख जीव-जन्तुओं में से तो शायद ही कोई ऐसा प्राणी बच पाया होगा जो किसी देवता के वाहन या अनुचर, सहचर के रूप में आकलित न किया गया हो।

यह भारतीय मनीषा ही है जिसने इस प्रकृति चक्र के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए सर्प जैसे प्राणांतकारी जीव को भी देवत्व का दर्जा दिया। मानो हमारी दृढ़मूल मान्यता रही हो कि इस जगत का अंशमात्र भी ध्वंस होता है तो समूचा प्राणीतंत्र झनझना उठता है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने जीवजगत के मध्य जो एकसूत्रता का प्रतिपादन किया है, वह प्राचीन भारतीय मनीषियों के ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म:’ के दृष्टिकोण से कितना संवाद रखता है, यह कहने की जरूरत नहीं।

किन्तु आज की उपभोक्तावादी जीवन-दृष्टि कितनी ही वैज्ञानिकता का दंभ भर ले, हमारे प्रदूषित होते पर्यावरण को बचाने में समर्थ नहीं। इसको विकृत कर हम स्वयं के सिर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। यह भला कैसे संभव है कि धधकती आग में हम एक ओर घी उड़ेलते जाएं और दूसरी ओर आग बुझाने के लिए हो-हल्ला मचाते रहें।

जब तक हम स्वयं को प्रकृति का अधीश्वर और प्रकृति को हमारी भोग्या चेरी समझते रहेंगे, मनुष्य और प्रकृति के सहज संबंधों को द्वंदात्मकता के आधार पर तय करते रहेंगे, भीषण संघर्षण की चिंगारी एक दिन विश्वानल का रूप धर सब कुछ लील जाएगी। अतः हमें अत्यंत सजगतापूर्वक इनकी रक्षा उसी तरह करनी चाहिए, जैसे मंदिर की देवमूर्ति की अथवा अपनी पालनहार माता की रक्षा की जाती है। यह कार्य समुदाय, लिंग, जाति, पंथ, राष्ट्र आदि सभी सीमाओं से ऊपर उठकर मानवमात्र का धर्म है।

यह कोई सेवा या प्रसिद्धि का कार्य नहीं, वरन् उसी तरह मौलिक उत्तरदायित्व है, जिस प्रकार मनुष्य अपनी संतानों और आश्रितों का पालन करता है। क्योंकि मानवमात्र या प्राणिमात्र के प्रति ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण प्रकृति-पर्यावरण के प्रति आत्मीय दृष्टि ही किसी श्रेष्ठ और उन्नत समाज की पहचान होती है। यही कारण है कि राष्ट्र एवं संपूर्ण मानवता के हित में सदैव तत्पर रहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे विशालतम संस्कारदायी संगठन ने भी समाज परिवर्तन के लिए जिन पांच परिवर्तनों का आह्वान किया है, उनमें पर्यावरण संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण आयाम है। संघ का मानना है कि इस भयावह संकट के समय यदि कोई हमें इस विभीषिका से छुटकारा दिला सकता है, तो वह हिंदू जीवन-दृष्टि का एकात्म भाव ही है, जो यह मानता है कि हम इस चराचर जगत का अविभाज्य अंश हैं। हमारा समूचा अस्तित्व धरती से लेकर अंतरिक्ष तक व्याप्त इस सृष्टि से सम्बद्ध है, उसी पर आधारित है।

अतः पर्यावरण को बचाना किसी अन्य को बचाना नहीं, यह अन्ततः स्वयं को बचाना है। हमारी एक-एक सांस और शरीर की एक-एक कोशिका इस पर्यावरण की देन है। धरती, समुद्र, नदी, पर्वत, वनस्पति, वायु और अंतरिक्ष साक्षात देवता हैं। हम इस अष्टमूर्ति शिवस्वरूप पर्यावरण के ही अंग हैं, अंश हैं। उसकी एक मूर्ति हम स्वयं हैं- याजक के रूप में। अपने इस होता धर्म का पालन करते हुए, ‘शिवो भूत्वा शिवम् यजेत’ का संकल्प ध्यान में रखेंगे तो पर्यावरण भी बचेगा, पृथ्वी भी बचेगी, हम भी बचेंगे।

Topics: श्रीगुरुजीभारतीय एकात्म दृष्टिWorld Environment Dayअष्टमूर्ति शिवपर्यावरण संरक्षणमहाकवि कालिदासस्वामी विवेकानंदसनातन पर्यावरणपंचमहाभूतजल-वायु प्रदूषणप्रकृति संरक्षणप्राकृतिक असंतुलनपर्यावरण दिवसजीव-जगत-प्रकृतिपाञ्चजन्य विशेषपर्यावरण संकटप्रकृति ही परमात्मा
इन्दुशेखर तत्पुरुष
इन्दुशेखर तत्पुरुष
वरिष्ठ साहित्यकार [Read more]
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