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भारत-जापान समझौता: ऊर्जा सुरक्षा और तकनीक पर फोकस

भारत और जापान ने अपनी 'विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी' को एक नई दिशा देते हुए ऊर्जा सुरक्षा को केंद्र में रखकर सहयोग और गहरा करने का निर्णय लिया है।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Jul 3, 2026, 05:20 pm IST
inविश्व
भारत-जापान संबंधों में नया मोड़

भारत-जापान संबंधों में नया मोड़

दुनिया इस समय ऊर्जा संकट, युद्ध, आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में भारत और जापान ने अपनी ‘विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी’ को एक नई दिशा देते हुए ऊर्जा सुरक्षा को केंद्र में रखकर सहयोग और गहरा करने का निर्णय लिया है। यहां सबसे बड़ी बात यह है कि दोनों देशों के बीच की ये साझेदारी ऐसे समय में सामने आई है, जब ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है।

दरअसल, नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में यह संकेत है कि आने वाले वर्षों में एशिया की ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक संतुलन तय करने में भारत और जापान की भूमिका और अधिक निर्णायक होगी। दोनों देशों ने रणनीतिक तेल भंडारण, वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री परिवहन, संस्थागत सहयोग और तीसरे देशों में ऊर्जा निवेश जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करने पर सहमति व्यक्त की है।

ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा साझा संबल

उल्‍लेखनीय है कि भारत और जापान दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों में शामिल हैं। दोनों देशों की अर्थव्यवस्था तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति पर निर्भर है। यही कारण है कि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय तथा जापान के अर्थव्यवस्था, व्यापार एवं उद्योग मंत्रालय (एमईटीआई) ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण प्रणाली को मजबूत करने, आपूर्ति संकट के दौरान समन्वय बढ़ाने और वैश्विक ऊर्जा बाजार से जुड़ी सूचनाओं का आदान-प्रदान करने पर सहमति बनाई है।

इस बारे में, HLBC के मैनेजिंग डायरेक्टर और इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ELCINA) में IT प्रोडक्ट्स कमिटी के चेयरमैन मितेश लोकवानी ने कहते हैं, “दोनों देश अब ऊर्जा खरीदने तक सीमित नहीं रहेंगे, नए बने समीकरणों में रणनीतिक तेल भंडारण, तेल उत्पादक देशों के साथ समन्वय, समुद्री ऊर्जा परिवहन, बाजार में कीमतों की अस्थिरता कम करने, तीसरे देशों में संयुक्त निवेश और ऊर्जा आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित बनाने की दिशा में भी मिलकर कार्य करेंगे। जिसमें कि इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (आईएसपीआरएल), जापान ऑर्गेनाइजेशन फॉर मेटल्स एंड एनर्जी सिक्योरिटी (जेओजीएमईसी) और जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (जेबीआईसी) जैसी संस्थाएं इस सहयोग को व्यावहारिक रूप देंगी।”
मितेश लोकवानी ने कहा, “विश्‍व में आज के समय में पदार्थ बहुत मायने रखता है, रेयर अर्थ पर चीन का अभी कब्‍जा है, ऐसे में स्‍वभाविक है कि भारत-जापान के ये नए व्‍यापारिक संबंध इस दिशा में कुछ नया समाधान खोजेंगे। हालांकि इसमें ताईवान की भूमिका पहले से ही है और भारत पहले ही ताईवान से तकनीकि स्‍तर पर कई अनुबंध कर चुका है, लेकिन जापान की विशेषता यह है कि वह किसी भी विषय पर बहुत डीप में जाकर काम करता है, आरएंडडी करना, डीप अध्‍ययन उसके मूल स्‍वभाव में है, स्‍वभाविक है कि इसका लाभ भारत को मिलेगा।”
उन्‍होंने कहा, “इस वक्‍त भारत सेमीकंडेक्‍टर एवं उससे जुड़े मटेरियल के लिए आत्‍मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है, निश्‍चित ही इसमें जापान की भूमिका पहले की तरह अहम रहनेवाली है, मुझे याद है 80 के दशके बाद जापान की कंपनियां यहां आईं, उन्‍होंने वाहन एवं अन्‍य इलेक्‍ट्रानिक बाजार में अपना विस्‍तार किया, किंतु वह विस्‍तार देखा जाए तो भारत के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ, जापान की तकनीक का उपयोग भारतीय इंजीनियरों ने बहुत बेहतर तरीके से किया, उसकी गुणवत्‍ता में अपने इनोवेशन से उसे एक नया आयाम दिया। अब समय प्रिंट इलेक्‍ट्रि‍क हो गया है, जिसमें जापान पहले से ही तकनीकि स्‍तर पर बहुत आगे है, स्‍वभाविक है कि इस नए अनुबंधों से भारत को तकनीकि तौर पर आगे बहुत लाभ मिलेगा।”

इसके साथ ही लघु उद्योग भारती के राष्‍ट्रीय जनरल सेक्रेटरी ओम प्रकाश गुप्‍ता इसमें एक नई बात जोड़ते हैं, वे कहते हैं, “जापान के साथ समझौता फिर किसी भी स्‍तर पर हो, उससे अनके क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर खुलेंगे, यह तो ठीक है, किंतु हमें यह भी ध्‍यान रखना होगा कि बिग इंडस्‍ट्री संस्‍थानों और उनसे जुड़ी कंपनियों तक ही लाभ सीमित होकर न रह जाए। कहने का तात्‍पर्य यह है कि जो कंपनियां Federation of Indian Chambers of Commerce & Industry फिक्की (FICCI), Confederation of Indian Industry (CII), The Associated Chambers of Commerce and Industry of India (ASSOCHAM), Federation of Indian Export Organisations (FIEO) से जुड़ी हैं, अधिकांश लाभ सिर्फ वहीं तक सीमित न रहे, वह स्‍मॉल इंडस्‍ट्री तक भी पहुंचे।”

हालांकि वे यह भी मानते हैं कि इसमें भी अप्रत्‍यक्ष रूप से लघु उद्योगों को लाभ पहुंचेगा, लेकिन जापान के साथ किए जा रहे भारत सरकार के अनुबंधों का आर्थ‍िक क्षेत्र में सीधा लाभ उन्‍हें कैसे मिल सकता है, इस पर भी हमारा फोकस हो, क्‍योंकि देश में आज यदि सबसे ज्‍यादा रोजगार किसी माध्‍यम से मिला हुआ है तो वह भारत की छोटी उद्योग ईकाइयां ही हैं। ओमप्रकाश गुप्‍ता इसके साथ ही यह भी कहते हैं कि स्‍मॉल इंडस्‍ट्री में नई तकनीक को जानने की जिज्ञासा अधिक है, ऐसे में स्‍वभाविक है जिसे आवश्‍यकता होगी, वह उस चीज का महत्‍व समझेगा और शीघ्र उस क्षेत्र में परिणाम भी देगा। जापान से आनेवाली नई तकनीक छोटे उद्योगों तक कैसे पहुंच सकती है, इसके लिए भी जरूरी लगता है कि भारत सरकार अवश्‍य प्रभावी योजना बनाए। फिलहाल इस नए समझौते पर अधिकांश भारतीय उत्‍साहित हैं।

संस्‍कृति की एतिहासिक नींव पर खड़ी है भारत-जापान साझेदारी

जीवाजी विश्‍वविद्यालय में इकॉनॉमी के प्रोफेसर एस.के.सिंह भारत और जापान के रिश्तों को सांस्‍कृतिक आधार पर देखते हैं, उनका कहना है, “इसकी जड़ें लगभग डेढ़ हजार वर्ष पुराने सांस्कृतिक संबंधों में हैं, जब भारत से बौद्ध धर्म जापान पहुंचा था। समय के साथ यही सांस्कृतिक विश्वास आज आर्थिक, तकनीकी और सामरिक साझेदारी में बदल चुका है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में जापान भारत को केवल एक विशाल बाजार के रूप में नहीं, बल्कि विश्वसनीय लोकतांत्रिक सहयोगी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिरता के प्रमुख स्तंभ के रूप में देखता है। वहीं भारत जापान को ऐसी तकनीकी शक्ति मानता है, जिसके सहयोग से विनिर्माण, आधारभूत संरचना और उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई छलांग लगाई जा सकती है।”

व्यापार बढ़ा, लेकिन असंतुलन भी बना रहा

अपनी बातचीत में प्रोफेसर एस.के.सिंह यह भी जोड़ते हैं, “पिछले पाँच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि भारत और जापान के बीच आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। वर्ष 2020-21 में दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 15.33 अरब अमेरिकी डॉलर था, जो 2024-25 तक बढ़कर लगभग 25.15 अरब डॉलर पहुंच गया। इस दौरान भारत का जापान से आयात 10.90 अरब डॉलर से बढ़कर 18.90 अरब डॉलर तक पहुंचा, जबकि भारत का निर्यात 4.43 अरब डॉलर से बढ़कर लगभग 6.25 अरब डॉलर हुआ। अर्थात् व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, लेकिन आयात की गति निर्यात से अधिक रहने के कारण व्यापार घाटा भी लगातार बढ़ता गया।” उन्‍होंने कहा, “पहली नजर में यह स्थिति भारत के लिए चिंता का विषय दिखाई देती है, लेकिन व्यापक आर्थिक दृष्टि से तस्वीर अलग है। जापान से होने वाला आयात मुख्यतः मशीनरी, अत्याधुनिक उपकरण, ऑटोमोबाइल तकनीक और औद्योगिक उत्पादों का है, जो भारत के औद्योगिकीकरण और विनिर्माण क्षमता को मजबूत करते हैं। इसलिए यह व्यापार सिर्फ उपभोग नहीं, बल्कि उत्पादन क्षमता बढ़ाने का माध्यम भी बनता है।”

जहाँ व्यापार घाटा खत्म होता है, वहीं से शुरू होता है भारत का वास्तविक लाभ

यदि केवल व्यापार संतुलन को आधार बनाया जाए तो तस्वीर अधूरी रहेगी। वास्तविकता यह है कि जापान भारत के सबसे बड़े विकास सहयोगियों में शामिल है। वर्ष 2000 से अब तक जापान भारत में लगभग 45 से 48 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कर चुका है। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक कॉरिडोर, सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में जापानी निवेश भारत की उत्पादन क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जापानी निवेश अत्याधुनिक तकनीक, गुणवत्ता आधारित उत्पादन प्रणाली, वैश्विक प्रबंधन कौशल और लाखों रोजगार की संभावनाएं भी साथ लाता है। यही कारण है कि व्यापार घाटे के बावजूद अधिकांश आर्थिक विशेषज्ञ भारत-जापान संबंधों को भारत के दीर्घकालिक हित में मानते हैं।

भारत के विकास की रफ्तार में जापान की मजबूत भागीदारी

आज यदि भारत के आधुनिक बुनियादी ढांचे की चर्चा होती है तो उसमें जापान की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है। मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना, दिल्ली मेट्रो, मुंबई मेट्रो, चेन्नई, बेंगलुरु और अन्य महानगरों की मेट्रो परियोजनाएं, वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर तथा अनेक शहरी विकास परियोजनाएं जापानी सहायता से आगे बढ़ रही हैं। जापान की आधिकारिक विकास सहायता (ODA) भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अत्यंत कम ब्याज दर और लंबी पुनर्भुगतान अवधि के साथ उपलब्ध होती है। इससे भारत को आधारभूत संरचना विकसित करने में वित्तीय दबाव कम पड़ता है। यही कारण है कि जापान को भारत का सबसे विश्वसनीय विकास साझेदार कहा जाता है।

अब ऊर्जा से आगे बढ़ेगा तकनीक और सुरक्षा का रिश्ता

नई ऊर्जा साझेदारी केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं है। दोनों देश हरित ऊर्जा, हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला में भी सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षित समुद्री मार्ग, मुक्त व्यापार और नियम आधारित व्यवस्था को मजबूत करने के लिए दोनों देशों की रणनीतिक सोच भी लगभग समान है। क्वाड जैसे मंचों पर भारत और जापान की सक्रिय भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि दोनों देश केवल आर्थिक सहयोगी नहीं, बल्कि साझा रणनीतिक दृष्टिकोण वाले साझेदार भी हैं। संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा और समुद्री सहयोग आने वाले समय में इस रिश्ते को और मजबूत करेंगे।

साझेदारी जितनी मजबूत, उतनी ही जरूरी है संतुलन

हालांकि दोनों देशों के संबंध लगातार नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहे हैं, फिर भी कुछ चुनौतियां सामने हैं। जापान के कठोर गुणवत्ता मानक, गैर-टैरिफ बाधाएं और तकनीकी नियम भारतीय कृषि, खाद्य और औषधीय उत्पादों के लिए अब भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं। यही कारण है कि दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) की समीक्षा पर सहमति व्यक्त की है। यदि भारतीय उत्पादों के लिए जापानी बाजार अधिक खुलता है तो व्यापार असंतुलन धीरे-धीरे कम हो सकता है। अब नई ऊर्जा साझेदारी भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, क्योंकि इससे दोनों देशों के बीच विश्वास, निवेश और औद्योगिक सहयोग को नई गति मिलेगी।

Topics: Japanese investment in IndiaAI and digital technologyPM Narendra ModiIndia Japan RelationsEnergy Securityenergy marketSanae TakaichiIndia-Japan energy partnership
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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