पश्चिम बंगाल में भी मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार द्वारा ‘लैंड जिहाद’ रोकने और अंतर-धार्मिक ज़मीन की खरीद-बिक्री को नियंत्रित करने के लिए असम मॉडल पर कानून लाने की तैयारी की जा रही है। 11 अगस्त 2026 को बांकुड़ा में प्रशासनिक समीक्षा बैठक के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा की राज्य की सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय नागरिकों के अधिकारों और जनसांख्यिकीय संतुलन को बनाए रखने के लिए यह कानून बेहद आवश्यक है। अधिकारी ने कहा की सीमावर्ती क्षेत्रों और विशिष्ट जिलों में स्थानीय लोगों की जमीनों पर अनधिकृत कब्जा या जनसांख्यिकी बदलने की कोशिशें हो रही हैं। पश्चिम बंगाल सरकार के इस कानून को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती हैं क्योंकि अनुसूचित जनजातियों या विशेष क्षेत्रों के संरक्षण के लिए राज्यों के पास पहले से ही कुछ प्रतिबंधात्मक अधिकार मौजूद हैं।
असम में अंतरधार्मिक जमीन खरीद पर सरकार का कड़ा शिकंजा
पूर्वोत्तर में भाजपा शाषित प्रदेश असम में हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने भी जमीन की खरीद-बिक्री के मार्फत राज्य पर दूरगामी कब्जे की रणनीति को मार दते हुए कड़ा कदम उठाते हुए बाहरी तत्वों के इशारे पर बड़े पैमाने पर जमीन खरीद कर विदेशियों को बसने और राज्य की जनसंख्यिकी को बदलने के इरादे को हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने पूरी तरह से नाकाम कर दिया है। इस नियम का असल उद्देश्य अवैध रूप से जमीन हड़पने की घटनाओं को रोकना, जनसांख्यिकीय चिंताओं को संभालना और राज्य में सामाजिक स्थिरता बनाए रखना है। सरकार के नए नियम के अनुसार अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच जमीन की खरीद-बिक्री के लिए सरकारी और पुलिस की अनुमति को अनिवार्य बना दिया है। असम सरकार के नए नियमों के तहत अब अंतर-धार्मिक भूमि हस्तांतरण को सामान्य बिक्री की तरह नहीं माना जाएगा। इसके लिए एक कड़े मानक और नियम लागू किया गया है।
अंतरधार्मिक जमीन सौदों पर कड़ी जांच
इस नए मानक संचालन प्रक्रिया के तहत किसी भी दो भिन्न धर्म के व्यक्तियों के बीच जमीन के ट्रांसफर के लिए रजिस्ट्रेशन से पहले सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना कानूनी रूप से जरूरी बना दिया है। सरकार ने इसमें पारदर्शिता लाने के लिए इसके कड़ी जांच का भी आदेश जारी किया हैं जिसके तहत जमीन की खरीद-बिक्री की अनुमति देने से पहले अनुमंडल अधिकारी और जिला प्रशासन स्तर पर जांच करेगी । इसके अलावे पुलिस और खुफिया विभाग द्वारा खरीदार की पहचान, जमीन का इतिहास और पैसों के स्रोत की बारीकी से सघन जांच करने का भी प्रावधान किया हैं । सरकार जमीन के खरीद बिक्री के बाद की स्थिति पर कड़ी नज़र रखने के लिए इस बात की भी जांच कर रही हैं की उस क्षेत्र में इस जमीन सौदे का कोई विपरीत सामाजिक प्रभाव या शांति भंग होने का खतरा तो नहीं है। असम सरकार द्वारा जारी किये गए आदेश के अनुसार एक ही धर्म के लोगों के बीच जमीन की खरीद-बिक्री पहले की तरह बिना इस विशेष अनुमति के सामान्य तरीके से जारी रहेगी।
धार्मिक स्थलों के आसपास जमीन खरीद पर रोक
असम विधानसभा ने एक अन्य संशोधन विधेयक के अनुसार 250 साल से अधिक पुराने धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के 5 किलोमीटर के दायरे में जमीन खरीदने पर विशेष पाबंदी लगाई गई है। अब असम में केवल मूल निवासी या स्थानीय समुदाय ही जमीन खरीद सकते हैं। सरकार के नए कानून के मुताबिक जो व्यक्ति 1 जनवरी 2006 तक अपने परिवार के साथ तीन पीढ़ियों (लगभग 75 साल) से उस क्षेत्र में रह रहा हैं उसे मूल निवासी की श्रेणी में रखा गया है। इसमें मोरन, मटक, छूटिया, कोच राजबॉंग्शी और अहोम को स्थानीय जनजातीय तथा चाय बागान, आदिवासी व अन्य को वंचित समूह को शामिल किया गया है। जिलाधिकारी अनधिकृत लोगों को हटा सकता हैं लेकिन अनुसूचित जाति, जनजाति और स्थानीय समुदायों पर यह नियम लागू नहीं होगा।
भाजपा नीत केंद्र और राज्य सरकारों के द्वारा हाल के दिनों में जनसांख्यिकी बदलने के विरोध में कड़े और व्यापक कदम उठाया जा रहा हैं। कुछ बाहरी शक्तियों के इशारे पर देश के सीमावर्ती इलाको में जनसांख्यिकी को बदलकर देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने की सोची समझी साज़िश पर काम किया जा रहा हैं। भारत नेपाल की सीमा जिसमे पश्चिम बंगाल, असम प्रदेश शामिल हैं में इस प्रकार के कानून की सख्त जरूरत हैं। इसके अलावे बांग्लादेश की सीमा से सटी प्रदेशो में भी इस प्रकार का कदम आवश्यक हैं। इसके खिलाफ भाजपा सरकारों का कदम काफी सराहनीय हैं। असम और पश्चिम बंगाल की सरकारों की तरह ही अन्य भाजपा और अन्य दलों द्वारा शासित प्रदेशों में भी सरकार इस तरह का कदम देशहित में उठा सकती हैं।
















