
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले पश्चिमी देश भीतर से कितने खोखले होते हैं, यह वैसे तो कई उदाहरणों से दिख जाता है, परंतु हाल ही में एक फिल्म पर प्रतिबंध को लेकर यह मामला और भी तेजी से उठ रहा है। यह फिल्म है Citizen Vigilante, जिसे पहले जर्मनी और फिर यूरोप में प्रतिबंधित कर दिया है।
यह फिल्म दरअसल उस मुद्दे पर बात करती है, जिस पर यूरोप का कथित सभ्य समाज बात करने से कतराता है। यह कथित शरणार्थियों द्वारा श्वेत महिलाओं के साथ किये जा रहे और श्वेत आम लोगों के साथ किये जा रहे अत्याचारों पर बात करती है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें लिबरल न्यायाधीशों ने न्याय के स्थान पर अन्याय किया। जो मध्यपूर्व एशिया और अफ्रीकी देशों से शरणार्थी आए थे, और जिन्होनें श्वेत लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार किया, उन्हें “सांस्कृतिक अंतर” के आधार पर या तो रिया कर दिया गया या फिर नाम मात्र की सजा दी गई।
यह फिल्म बताती है कि कैसे इस आधार पर श्वेत लड़कियों कि साथ बलात्कार और हत्या सही साबित किया जाता है कि, वे छोटे-छोटे कपड़े पहनती हैं और इस कारण वे बेशर्म लड़कियां हैं, और उनके साथ कुछ भी किया जा सकता है। एक चौदह साल की बच्ची के साथ छ लोग बलात्कार करते हैं और उन्हें छोड़ भी दिया जाता है, यह कहते हुए कि सांस्कृतिक अंतर है। मगर बलात्कारियों को लेकर सांस्कृतिक अंतर हो सकता है क्या?
यह कहानी एक ऐसे अमेरिकी की है,जो यूरोप में जाकर बस जाता है और वह देखता है कि यूरोप में शरणार्थी जिस प्रकार से अपराधों मे वृद्धि कर रहे हैं, उसके चलते लोगों में डर और असुरक्षा उत्पन्न हो रही है। मुख्य अभिनेता Sanders अपनी पहचान छुपाकर Citizen Vigilante बन जाता है। अर्थात एक सजग नागरिक! वह सरकार और अदालतों से निराश होकर अपने हाथ मे मामले लेता है और फिर वह प्रवासी अपराधियों, भ्रष्ट अधिकारियों और गैंगस्टरों को निशाना बनाता है। उसे लेकर लोग परेशान होते हैं, मगर जनता उसे हीरो मानती है, लेकिन पुलिस और इन्टरपोल उसे खतरनाक अपराधी समझते हैं। फिल्म में कई हिंसक दृश्य हैं, जैसे प्रवासी अपराधियों द्वारा महिलाओं पर हमले और सैंडर्स द्वारा उन्हें निशाना बनाया जाना।
हाँ, हिन्दी फिल्मों के दर्शकों के लिए कुछेक दृश्य उन्हें अश्लील लग सकते हैं, क्योंकि शारीरिक संबंधों को लेकर इतना खुलापन भारत में सहज नहीं है। उस एक प्रकरण को छोड़कर पूरी फिल्म में यही दिखाया है कि कैसे यूरोप में शरणार्थी आकर वहाँ के श्वेत लोगों के साथ अत्याचार कर रहे हैं।
वे सरेआम गला रेतने से लेकर बस में टिकट न लेने जैसी हरकतें आम करते रहते हैं। वे श्वेत लड़कों को धमकाते हैं, उन्हें मारते पीटते हैं तो वहीं किशोरियों के साथ बलात्कार करते हैं। उनकी इन तमाम हरकतों पर मीडिया और शासन-प्रशासन ध्यान नहीं देता है और उन्हें एक प्रकार से दोषी तो क्या आरोपी ही नहीं ठहराया जाता है।
बलात्कार के लिए बलात्कारियों के परिवार लड़कियों को ही दोषी ठहराते हैं। लड़का कहता है कि वह बच्ची उसे खींचकर ले गई थी। अर्थात उस बच्ची ने पहल की थी, जिसके साथ छ लोगों ने बलात्कार किया था। वह लड़का कहता है कि वह बच्ची उसे खींचकर झाड़ियों में ले गई थी। उसके इस झूठ में उस मुसलमान लड़के के घरवाले उसका साथ देते हैं।
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यहाँ तक कि वहाँ मौजूद उस लड़के की बहन भी उस बच्ची का साथ नहीं देती है। और भाग जाती है। और शायद उसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर है और शायद यह कहती है कि जब नायक उससे पूछता है तो वह लड़की घृणा से भर कर जबाव देती है कि “वह लड़की इसीकी हकदार थी, क्योंकि वह वह छोटे-छोटे कपड़े पहनती थी और अपनी टांग दिखाती थी।
जब वह उसके अब्बा से पूछता है तो वह कहता है कि उसने अपने बच्चों को कुरान के हिसाब से तालीम दी है और परिवार के हिसाब से वैल्यू दी हैं। वह लड़की कहती है कि वह डिलीट कर देगी।
मगर इस फिल्म को लेकर सरकारें असहज हैं और यही कारण है कि इस फिल्म को जर्मनी में पहले प्रतिबंधित कर दिया गया। इसे लेकर फिल्म के निर्देशक उवे बोल का कहना है कि “यह सोच-समझकर सेंसरशिप का फ़ैसला लिया गया था। मैंने इसके ख़िलाफ़ शिकायत करने के लिए एक वकील रखा, लेकिन हम छह-दो के वोट से हार गए, क्योंकि मुझे बताया गया कि फ़िल्म प्रवासियों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़का रही थी।“
लोगों का कहना है कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि श्वेत लोगों के प्रति प्रवासी हिंसा करते रहें, परंतु उनके द्वारा की गई हिंसा पर कोई फिल्म न बनाई जाए?
जापान में मुसलमान शरणार्थियों को लेकर अपनी आवाज मुखर करने वाले Colonel Otaku Gatekeeper ने भी इसी दृश्य को लेकर लिखा कि ‘सिटिज़न विजिलेंट’ में मेरा पसंदीदा दृश्य वह था जब सैंडर्स मुस्लिम प्रवासी बलात्कारी के परिवार से मिलने जाता है।
उन्होंने आगे लिखा कि “उस परिवार ने न केवल उस 14 साल की लड़की के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखाई जिसके साथ उनके बेटे ने गैंगरेप किया था, बल्कि उनका मानना था कि वह इसी लायक थी क्योंकि गैर-मुस्लिम लड़कियाँ जिस तरह के कपड़े पहनती हैं, वे “गंदे” होते हैं। फिर उन्होंने लिखा कि “आप मुसलमानों को शरिया कानून से तो बाहर निकाल सकते हैं, लेकिन मुसलमानों के अंदर से शरिया कानून को नहीं निकाल सकते।“
जैसे ही इस फिल्म को जर्मनी में प्रतिबंधित किया गया, वैसे ही एक्स पर एलन मस्क ने फिल्म को फ्री में उपलब्ध करवा दिया और देखते ही देखते यह पूरी दुनिया में फैल गई। एक्स पर की हैंडल पर यह फिल्म अभी भी उपलब्ध है। अब यह फिल्म अमेरिका में ऐमज़ान में शीर्ष फिल्म बन गई है।