नई दिल्ली (पाञ्चजन्य डिजिटल): अक्सर संकट के समय इंसान ईश्वर से किसी चमत्कार की उम्मीद करता है। हमें लगता है कि भगवान स्वयं आकर हमारे दुखों को दूर करेंगे। लेकिन यह अद्भुत श्लोक हमें बताता है कि ईश्वर की सहायता का वास्तविक स्वरूप क्या है और वे अपने भक्तों की रक्षा किस प्रकार करते हैं।
मूल श्लोक:
न देवा यष्टिमादाय् रक्षन्ति पशुपालवत्।
यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्धया संयोजयन्ति तम्॥ (महाभारत)
भावार्थ:
जिस प्रकार एक चरवाहा या पशुपालक अपने पशुओं की रक्षा के लिए हाथ में लाठी (यष्टि) लेकर उनके पीछे-पीछे चलता है, देवता या ईश्वर उस तरह लाठी लेकर किसी की भौतिक रक्षा करने नहीं आते। ईश्वर जिस मनुष्य की रक्षा करना चाहते हैं, या जिसका कल्याण करना चाहते हैं, उसे संकट से निकलने के लिए उत्तम ‘बुद्धि और विवेक’ प्रदान कर देते हैं।
आज के दौर में प्रासंगिकता
यह श्लोक अंधविश्वास और अकर्मण्यता पर करारा प्रहार करता है। कई बार लोग मुश्किलों में हाथ पर हाथ धरे बैठ जाते हैं कि ‘ईश्वर सब ठीक कर देगा’। लेकिन यह नीति श्लोक हमें समझाता है कि ईश्वर का सबसे बड़ा चमत्कार हमारे भीतर की ‘सही निर्णय लेने की क्षमता’ है।
जब भगवान कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन की रक्षा की, तो उन्होंने स्वयं हथियार नहीं उठाए, बल्कि अर्जुन को ‘गीता का ज्ञान’ देकर उनकी बुद्धि को मोह और भ्रम से मुक्त किया।

















