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जब जज ने कहा- इंदिरा गांधी से कह दो फैजाबाद में चाहें तो बम गिरा दें, मैं इन्हें जमानत दे रहा हूं

पाञ्चजन्य से विशेष बातचीत में कपिलदेव तिवारी बताते हैं कि आपातकाल के दौरान बहुत ज्यादा डर का माहौल था। जो लोग इस दौरान बंदी बनाए गए, उनसे गांव के लोग नमस्ते करने तक से डरते थे।

Written bySudhir Kumar PandeySudhir Kumar Pandey
Jun 28, 2026, 10:24 am IST
inभारत, उत्तर प्रदेश
कपिलदेव तिवारी (लोकतंत्र की बने आवाज)

कपिलदेव तिवारी (लोकतंत्र की बने आवाज)

आपातकाल (25 जून 1975) लोकतंत्र का वह कालखंड है, जब जनता के मूल अधिकारों पर कुठाराघात हुआ था। सत्ता की चाह ने संविधान से खिलवाड़ किया। भय का ऐसा माहौल बनाया गया कि जिसे सुनकर ही सिहरन होती है। जिन्होंने आवाज उठाई उन्हें जेलों में बंद कर दिया गया। अयोध्या के कपिलदेव तिवारी ने भी लोकतंत्र को बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए आवाज उठाई थी।

पाञ्चजन्य से विशेष बातचीत में कपिलदेव तिवारी बताते हैं कि आपातकाल के दौरान बहुत ज्यादा डर का माहौल था। जो लोग इस दौरान बंदी बनाए गए, उनसे गांव के लोग नमस्ते करने तक से डरते थे। मैं उस समय जनसंघ की युवाओं की टोली युवा संघ से जुड़ा था। उस समय मैं अपने गांव मोइया कपूर पुर, (पूरे तिवारी), सोहावल अयोध्या में था। गांव में बंदी बनाने के लिए ट्रक भरके पुलिस आई थी, जोकि करीब आधा किलोमीटर पहले जंगल में छिप गई थी। गांव के अंदर चार-पांच पुलिसकर्मियों के साथ दरोगा आया था। गिरफ्तार कर फैजाबाद जेल में डाला गया। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका हाई कोर्ट में डाली गई तो मुझे लखनऊ की जेल ले जाया गया। नौ डीआरआई के केस लगाए गए।

जब लगा कि बाहर से बेहतर जेल है

मैं उस समय बीएड कर रहा था। प्रैक्टिकल परीक्षा बाकी थी। मैंने जेल से परीक्षा देने को कहा तो मना कर दिया गया। परीक्षा के लिए व्यक्तिगत रूप से पहुंचना जरूरी था। मेरे भाईसाहब वकील थे तो उन्होंने जिलाधिकारी से इस संबंध में बात की। जिलाधिकारी ने कहा कि वह गृह सचिव से पूछेंगे। इसके बाद जवाब मिला कि नहीं छोड़ेंगे। इस पर भाईसाहब अदालत गए। वहां से चार दिन की पैरोल मिली। मैं परीक्षा देकर गांव गया तो कोई मुझसे बात ही नहीं कर रहा था। नमस्ते तक का जवाब नहीं मिलता था। इतना ज्यादा डर का माहौल था। गांव वालों को लगता था कि वह बात करेंगे तो सीआईडी उन्हें पकड़कर जेल में डाल देगी। मुझे लगा कि मेरे लिए बाहर ही जेल है, पैरोल का समय पूरा होने से पहले ही मैंने सरेंडर कर दिया। संघ के जिला प्रचार उपाध्याय जी भी उस समय जेल में बंद थे। मैंने उन्हें सारी बात बताई।

देखता हूं कैसे छूटोगे, यहीं गाड़ के मार दूंगा

मेरे ऊपर नौ डीआरआई के केस हुए। प्रशासन के लोगों ने कहा कि देखता हूं कैसे छूटोगे, यहीं गाड़ के मार दूंगा। मेरी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में सुनवाई हुई। जज ने सरकारी वकील से कहा कि हिंदी में बोलिए। केस को देखकर जब जज ने पूछा कि पुलिस क्या करती थी। पुलिस ने कहा कि फैजाबाद का इलाका बहुत खतरनाक है। न्यायाधीश ने सरकारी वकील से कहा कि इंदिरा गांधी से कह दीजिए कि वह फैजाबाद में चाहें तो बम गिरा दें, मैं इन्हें जमानत दे रहा हूं। 18 वकीलों ने मेरी जमानत ली।

पुलिस ने चटर्जी और महमूद को बुरी तरह मारा

इमरजेंसी के दौरान साइकिल से पर्चे बांटे जा रहे थे। देहात में सूर्य नारायण मिश्रा, सुरेंद्रनाथ चटर्जी और एक मुस्लिम महमूद भी इस काम में लगे थे। पुलिस ने चटर्जी को महमूद को बहुत बुरी तरह मारा। जेल के अंदर मेरे सामने मार रहे थे तो मैंने विरोध किया था। इमरजेंसी में मैं करीब 11 महीने जेल में था।

 

Topics: आपातकाल 1975हिटलर-गांधी25 जून 1975आपातकाल का सचइमरजेंसी फाइल्स
Sudhir Kumar Pandey
Sudhir Kumar Pandey
Experienced Media Professional | Digital Content Strategist | Editorial Leader | 18+ Years in Print, Digital & Broadcast Journalism. I am a passionate and result-driven editorial professional with over 18 years of experience across some of India’s most respected media houses, including Zee News, Dainik Jagran, Panchjanya, Way2News, and Aaj Samaj. Currently leading digital content at Panchjanya (Bharat Prakashan Limited). Throughout my career, I have successfully managed editorial teams, produced high-impact news series and special editions (Tarpan, Shiv Tatva, Mudda – Delhi-NCR), and contributed to both daily operations and long-term editorial planning. My expertise spans across political reporting, current affairs, cultural features, and public issue-driven journalism. I thrive in deadline-driven environments, enjoy mentoring teams, and am always exploring ways to innovate newsroom workflows with technology. Proficient in CMS platforms, Canva, InDesign, and content planning tools. Let’s connect if you’re interested in meaningful storytelling, content strategy, or media innovation. [Read more]
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