Emergency 25 June 1975 : निर्वस्त्र करके पीठ पर टायर से मारते थे, आज भी पैर सुन्न हो जाते हैं
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Emergency 25 June 1975 : निर्वस्त्र करके पीठ पर टायर से मारते थे, आज भी पैर सुन्न हो जाते हैं

कोतवाली में पहुंचते ही हम सबको उल्टा लिटाकर पैरों के तलवों में लाठी मारी गई। फिर एक एक को अलग करके पूछताछ का दौर शुरू हुआ

Written bySudhir Kumar PandeySudhir Kumar Pandey
Jun 25, 2026, 11:13 pm IST
in भारत
इमरजेंसी फाइल्स-3 (राजन ढींगरा)

इमरजेंसी फाइल्स-3 (राजन ढींगरा)

आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का वह दौर था जब जनता की आवाज दबाई गई। यातना दी गई, जेल होती थी तो न जमानत और न अपील। समाज में भय का माहौल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने लोक की आवाज मुखर की। स्वयंसेवक न केवल जेल गए बल्कि बलिदान भी दिया। दिल्ली में इस क्रूरता के शिकार हुए थे राजन ढींगरा।

वह आपातकाल का माहौल याद कर बताते हैं कि दिनांक 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा के समय स्नातक प्रथम वर्ष का छात्र था। आपातकाल की घोषणा के लगभग 10 दिन पश्चात तत्कालीन विभाग प्रचारक श्री सुमैया जी मेरे निवास स्थान पर आये। उन्होंने एक सम्पन्न होने वाली बैठक की सूचना देकर कहा कि इस बैठक में आप अपेक्षित हैं। बैठक का स्थान पूछने पर उन्होंने कहा कि हमें सुभाष नगर पहुँचना है। सुभाष नगर बस स्टैंड पर आप मिलना। मैं और सुमैया जी सुभाष नगर बस स्टैंड पर चल पड़े। मैंने रास्ते में सुमैया जी से पूछा कि बैठक किस स्थान पर है। सुमैया जी ने कहा कि मुझे बैठक का स्थान तो पता नहीं है, लेकिन गली के दाहिने हाथ में मकान है और उस घर के बाहर लाल और सफेद रंग की दो चादरें सूखने के लिए डाली हुई हैं, हमें उसी घर में जाना है। हम निर्धारित समय पर उस स्थान पर पहुँच गये। बैठक स्थानीय संघ के अधिकारी माननीय ईश जी चडढ़ा ने ली। हमें यह निर्देश दिया गया कि हमें पुलिस से बचते हुए अन्य कार्यकर्त्ताओं से सम्पर्क बनाये रखना है। तथा कुछ समय बाद अपना साहित्य जनवाणी के रूप में छप कर आ जायेगा। जो स्वयंसेवकों तक पहुँचाना है। इस प्रकार निरन्तर बैठकों का क्रम चलता रहा।

इसी क्रम में 30 अक्टूबर को बैठक हुई और उस बैठक में मुझे अन्य कार्यकर्ताओं के साथ 31 अक्टूबर को सत्याग्रह करने का आदेश दिया गया। (जबकि सारे देश में नवम्बर माह में सत्याग्रह शुरू होने थे परन्तु विशेष परिस्थिति एवं कारण से इस दिन सत्याग्रह करने का निर्णय लिया गया था।) क्योंकि इस दिन राष्ट्रमण्डल देशों के प्रतिनिधियों का स्वागत समारोह दिल्ली के लाल किला के दीवाने आम में सम्पन्न होना था। उस कार्यक्रम में सत्याग्रह करने का निर्देश हुआ था।

इस निमित्त मैं 31 अक्टूबर 1975 को प्रातः काल सुभाष आर्य जी के साथ अशोक विहार में चला गया जहाँ सभी को एकत्रित होना था। वहाँ पर तत्कालीन जनसंघ के नेता श्री मदन लाल खुराना तथा संघ प्रचारक माननीय इन्द्रेश जी से भेंट हुई। उन्होंने हमें जानकारी दी कि हमें राष्ट्रमण्डल देशों के स्वागत कार्यक्रम के अन्त में विरोध स्वरूप नारे लगाने हैं तथा पचें बांटने हैं। (वह पर्चे तथा कार्यक्रम में प्रवेश के लिए निमंत्रण पत्र हमने वहीं से निमंत्रण पत्र लेकर दोपहर के बाद लगभग 20 युवा कार्यकर्त्ता गोविन्द राम वर्मा के नेतृत्व में दो-दो के समूह में अशोक विहार से निकल कर पुलिस की नजरों से बचते हुए दीवाने आम कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गये।)

योजनानुसार हम सब कार्यक्रम में अलग-अलग जाकर बैठ गये। कार्यक्रम सम्पन्न होते ही हमने अपनी कुर्सियों पर खड़े होकर भारत माता की जय, आपातकाल वापस लो, तानाशाही नहीं चलेगी, के नारे लगाते हुए पत्रकों को उड़ाना शुरू कर दिया। कुछ ही समय में हमें पुलिस वालों ने दबोच लिया और हमारे मुँह को दबा दिया। सभी विदेशी पत्रकार फोटो लेने लगे और हम अपने उद्देश्य में सफल हो गये। दीवाने आम से हम सबको चाँदनी चौक पुलिस कोतवाली लाया गया।

आज भी पैर सुन्न हो जाते हैं

कोतवाली में पहुंचते ही हम सबको उल्टा लिटाकर पैरों के तलवों में लाठी मारी गई। फिर एक एक को अलग करके पूछताछ का दौर शुरू हुआ। फिर सबको अलग अलग ले जाकर वहाँ कपड़े उतरवाते और निर्वस्त्र कर देते और निर्वस्त्र करके पीठ पर टायर से मारते और पूछताछ करते पुलिस वाले एक बात पूछते तुमको किसने भेजा और किसने पत्रक दिये हैं। हम सबका योजनापूर्वक एक ही जवाब था कि हमें मदनलाल खुराना ने भेजा है। मदन लाल खुराना कार्यक्रम से पहले हमें गौरी शंकर मन्दिर (चांदनी चौक) के बाहर मिले थे। उन्होंने पत्रक दिये और हम सबको अन्दर छोड़कर वे चले गये। रातभर पुलिस द्वारा मारने का क्रम चलता रहा। (पुलिस ने जो पैरों पर डण्डे मारे थे उस कारण मैं अभी भी ज्यादा समय तक यदि जूता डाल लू तो पैर सुन्न हो जाते हैं दोपहर में हमें न्यायालय में पेश कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया।

45 दिन के पश्चात मेरी जमानत हो गई। बाहर आने के बाद सुभाष आर्य जी ने मुझे जानकारी दी कि लाल किला में सत्याग्रह करने वालों के मीसा के अन्तर्गत गिरफ्तारी के वारंट निकाल दिये हैं। मीसा यह कानून था जिसमें न वकील, न दलील जबतक सरकार चाहे जेल के अन्दर रख सकती है। इस वारंट के बारे में संघ के वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा करने के बाद यह तय हुआ कि मुझे भूमिगत रहकर कार्य करना है।

मौसा का वारंट निकलते ही पुलिस ने मेरे घर पर दबिश देनी शुरू कर दी देर सवेर पुलिस वाले घर आते और पूरा घर छानते और परिवार वालों को परेशान करते। इस बीच एक रोचक घटना घटी में काफी दिनों के बाद घर पर कपड़े लेने आया तो माता जी कहने लगी कि पुलिस वाले देर रात या सुबह सुबह आते हैं दोपहर के समय वे कभी भी नहीं आये अतः स्नान कर, खाना खाकर फिर जाना। मैंने नहाने के लिए कपड़े उतारे और तौलिया बांधा ही था मेरे पड़ोस के मित्र जय भारत जी (वो भी बाद में मीसा में गिरफ्तार हो चुके थे) मेरे घर आ गये मैं गेट पर खड़ा होकर उनसे बात कर रहा था। इतनी देर में मैंने देखा पुलिस की दो गाड़ियां गली में प्रवेश करती हैं। तो मैं पुलिस के सामने से तौलिये में ही जयभारत के साथ चला गया। जय भारत ने मुझे उसी ब्लाक में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के घर बिठा दिया। थोड़ी देर बाद जब पुलिस चली गई वो मेरे घर गये और मेरे कपड़े लाये और तब मैं कपड़े पहनकर गया। पुलिस वालों से परेशान होकर मेरे घर वाले घर पर ताला लगाकर भूमिगत हो गये।

मुझे पकड़ने के लिए मेरे भाई को गिरफ्तार किया

पुलिस वालों को कहीं से जानकारी मिली कि मेरा बड़ा भाई सरकारी नौकरी शास्त्री भवन में करता है अतः पुलिस ने शास्त्री भवन में पहुँचकर मेरे भाई को गिरफ्तार कर लिया और थाने में बिठा दिया और पुलिस ने उनसे और मेरे परिवालों से कहा कि उसको ले आओ और इसको ले जाओ। मुझे जब इसकी जानकारी मिली मैंने अपने वरिष्ठ अधिकारी ईश कुमार जी से तया सुभाष आर्य जी से चर्चा की तथा मैंने पुलिस स्टेशन में जाकर स्वयं गिरफ्तारी दे दी तथा पुलिस ने मुझे जेल भेज दिया। जनवरी 1977 में चुनावों की घोषणा होने पर जेल से रिहा किया गया।

Topics: आपातकाल 25 जून 1975आपातकाल 25 जूनहिटलर-गांधीआपातकाल का सचइमरजेंसी फाइल्सआपातकाल और आरएसएस
Sudhir Kumar Pandey
Sudhir Kumar Pandey
Experienced Media Professional | Digital Content Strategist | Editorial Leader | 18+ Years in Print, Digital & Broadcast Journalism. I am a passionate and result-driven editorial professional with over 18 years of experience across some of India’s most respected media houses, including Zee News, Dainik Jagran, Panchjanya, Way2News, and Aaj Samaj. Currently leading digital content at Panchjanya (Bharat Prakashan Limited). Throughout my career, I have successfully managed editorial teams, produced high-impact news series and special editions (Tarpan, Shiv Tatva, Mudda – Delhi-NCR), and contributed to both daily operations and long-term editorial planning. My expertise spans across political reporting, current affairs, cultural features, and public issue-driven journalism. I thrive in deadline-driven environments, enjoy mentoring teams, and am always exploring ways to innovate newsroom workflows with technology. Proficient in CMS platforms, Canva, InDesign, and content planning tools. Let’s connect if you’re interested in meaningful storytelling, content strategy, or media innovation. [Read more]
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