25 जून 1975 की वह रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की सबसे पीड़ादायक रातों में से एक थी। आधी रात के बाद आपातकाल की घोषणा हुई और देखते ही देखते देशभर में गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण बंदी बना लिए गए। समाचार-पत्रों पर नियंत्रण स्थापित कर दिया गया। विरोध का स्वर अपराध बना दिया गया। हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और छात्र नेताओं को बिना मुकदमे जेलों में डाल दिया गया। इनमें मैं भी शामिल था।
जेपी आंदोलन की युवा शक्ति की अग्रिम पंक्ति में था। राम बहादुर राय, सुशील कुमार मोदी और के.एन. गोविंदाचार्य जैसे साथियों के साथ छात्र आंदोलन को दिशा देने का प्रयास किया। आंदोलन से जुड़े अनेक लोगों का मानना है कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण को छात्र आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए मनाया। संघर्ष के दौरान मैं सत्ता की आँखों में खटकने लगा।
जब कारागार में खबर फैली—”चौबे नहीं रहे”
गिरफ्तारी के बाद बिहार की विभिन्न जेलों में रखा गया। किंतु कारागार की दीवारें मनोबल नहीं तोड़ सकीं। जेल के भीतर भी बंदियों का उत्साह बढ़ाते रहा। उन्हें बताया कि यह संघर्ष किसी व्यक्ति या दल का नहीं, लोकतंत्र का है। प्रशासन के लिए समस्या केवल यह नहीं थी कि मैं नहीं झुक रहा हूं; समस्या यह थी कि दूसरे भी टूट नहीं रहे थे।
प्रशासन की दृष्टि में सबसे “खतरनाक” राजनीतिक बंदियों में गिना जाने लगा। इसके बाद अत्याचारों का ऐसा दौर शुरू हुआ जिसकी स्मृति आज भी ताजा है। बक्सर और आरा की जेलों की अंधेरी कोठरियों ने वह पीड़ा सुनी और देखी।
मृत्यु-द्वार से लौटा
मुझे इतनी निर्ममता से पीटा गया कि शरीर का कोई भाग सुरक्षित नहीं बचा। आंख पर ऐसा प्रहार हुआ कि दृष्टि जाते-जाते बची। तप्त लोहे की सलाखों से शरीर को दागा गया। नाभि और उदर पर भीषण प्रहार किए गए। दारोगा ने एड़ी से नाभि को इतनी भीषणता से रगड़ दिया कि मूत्रमार्ग से रक्तस्राव होने लगा। जेल से बाहर आने के बाद भी पाँच-छह वर्षों तक उसका उपचार चलता रहा।
मेरी स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि एक दिन जेल के भीतर खबर फैल गई—”चौबे नहीं रहे।” एक बैरक से दूसरी बैरक तक यह बात फैलती चली गई। कारागार में सन्नाटा छा गया। अनेक बंदियों ने मान लिया कि मैं अब जीवित नहीं रहा। कुछ की आंखें भर आईं। कुछ ने मौन प्रार्थना शुरू कर दी। उस रात जेल में किसी ने भविष्य की चर्चा नहीं की।
गंभीर स्थिति का समाचार जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण तक पहुँचा तो वे भी चिंतित हो उठे। उधर, माता-पिता की पीड़ा का अनुमान भी कठिन है। न मोबाइल थे, न त्वरित संचार के साधन। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं था कि मैं जीवित हूं कि नहीं। केवल प्रतीक्षा थी, केवल प्रार्थना थी।
इन्हीं क्षणों में एक पुलिस अधिकारी ने वह किया जो किसी भी राजनीतिक व्यवस्था से ऊपर उठकर केवल मनुष्यता करती है। जब मैं जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा था, तब उसने समय पर मुझे जल पिलाया। संभवतः वही जल उस समय जीवन का आधार बन गया। मृत्यु का द्वार सामने था, किंतु नियति ने वापस बुला लिया था।
पुरवाई चलती है तो आज भी दर्द होता है
जीवित लौटा, लेकिन घाव साथ लौटे। शरीर पर पड़े उन प्रहारों की स्मृति वर्षों तक उपचार मांगती रही। पाँच-छह वर्षों तक चिकित्सा चलती रही। किंतु कुछ घाव ऐसे होते हैं जो केवल शरीर पर नहीं, जीवन पर अंकित हो जाते हैं।
आज आपातकाल को पांच दशक से अधिक समय बीत चुका है। नई पीढ़ी उसे इतिहास की पुस्तकों में पढ़ती है। लेकिन वह केवल इतिहास नहीं, जीवित स्मृति है। वे बताते हैं कि आज भी जब मौसम बदलता है, जब पुरवाई हवा चलती है, तब पुराने घाव बोल उठते हैं। शरीर में वही दर्द लौट आता है जो कभी जेल की कालकोठरी में महसूस हुआ था।
समय बीत जाता है। सरकारें बदल जाती हैं। पीढ़ियाँ भी बदल जाती हैं। लेकिन कुछ घाव इतिहास बनकर जीवित रहते हैं।
















