आपातकाल का वह काला दौर आज भी स्मृतियों में बसा है। 25 जून 1975 की रात जब आपातकाल की घोषणा हुई, उसी शाम को मेरी डयूटी लोकनायक जय प्रकाश नारायण जी की सुरक्षा पर थी। उस समय किसको पता था कि कुछ समय बाद ही लोकतंत्र की निर्मम हत्या कर दी जायेगी। लोकनायक सहित विपक्ष के नेता इस प्रकार बंदी बना लिए जायेंगे। 1 जुलाई 1975 को मुझे गिरफ्तार किया गया, लेकिन सिविल डिफेंस का डिविजनल वार्डन होने के कारण 24 घंटे में मुझे छोड़ दिया गया और उसके बाद पूरे आपातकाल में पुलिस मुझे पुनः गिरफ्तार नहीं कर पायी।
पूरे आपातकाल तक मुझे भूमिगत रहकर काम करने का अनोखा अनुभव मिला। मेरे कारण मेरे बड़े भाई श्री जगदीश आर्य को गिरफ्तार होना पड़ा था। आपातकाल लगने के तुरंत बाद 27 जून 1975 को दिल्ली जनसंघ के तत्कालीन मंत्री श्री योगेन्द्र जैन का मेरे पास फोन आया था कि यमुना किनारे श्री मदनलाल खुराना जो भूमिगत काम की दृष्टि से प्रदेश के प्रमुख कार्यकर्ताओं को बैठक लेंगे। तब से लेकर आपातकाल के अंत तक भूमिगत से विविध प्रकार के काम करने का अवसर मिला, जिनमें से कुछ का उल्लेख कर रहा हूं-
1. जब श्री मदनलाल खुराना जी को गिरफ्तार कर नजफगढ़ पुलिस स्टेशन के अंडरग्राउंड हवालात में ले जाया उनके पास एक डायरी थी, जिसमें महत्वपूर्ण फोन नम्बर थे। उस डायरी को पुलिस से बचाकर लाने का दायित्य मुझे सौंपा गया था। इस कार्य को मैंने सफलतापूर्वक किया। इसके कारण काफी लोग गिरफ्तार होने से बच गये थे।
2 तब अटल जी गिरफ्तार होकर AIIMS में उपचार के लिए भर्ती थे। उनके आपातकाल के विरोध सन्देश का पत्र लाने की जिम्मेदारी मुझे दी गयी थी। तब सरदार ड्राइवर (उस समय की फोटो रिकॉर्ड के लिए) बनकर श्रीमती मदन लाल खुराना तथा अपनी धर्मपत्नी सहित AIIMS गया था। तब अटल जी के संकेत से बाथरूम से संदेश का पत्र लाने में सफल रहा था।
3. हिसार जेल में बंद श्री विजय कुमार मल्होत्रा जी से मिलकर सन्देश ले जाने का काम मुझे सौंपा गया था। तब भी सरदार का वेश लेकर उनके साले के कल्पित नाम से मुलाकात करने तथा संदेश लाने में सफलता मिली थी।
4. पंजाबी बाग में विपक्षी नेताओं की एक बैठक होनी थी। जिसमें श्री पीलू मोदी, श्री कर्पूरी कुर और डॉ सुब्रमण्यम स्वामी( संयोग से स्वामी जी ने भी सरदार का वेश बना रखा था) को लाने का काम मुझे सौंपा गया था। मैं अपनी फिएट में उन्हें ला रहा था कि अचानक कार का टायर पंक्चर हो गया। उस हालात में भी उन्हें गंतव्य तक पहुंचाया।
5. तब मदनलाल खुराना जी कीर्तिनगर के अपने वर्तमान निवास में रहते थे तथा तब तक गिरफ्तार नहीं हुए थे। भूमिगत थे। तब लैंडलाइन फोन होते थे। पुलिस ने उनको गिरफ्तारी को मुमकिन बनाने के लिए घर सील कर दिया और लैंडलाइन फोन उखाड़कर सारी तारें काट दी। उस समय जोखिम उठाकर 24 घंटे के भीतर तारें जोड़कर तथा दूसरा फोन लगा कर फोन चालू कर दिया। यह घटना आज भले छोटी लगे क्योंकि मोबाइल का युग है पर उस समय के हिसाब से लैंडलाइन ही एकमात्र साधन था।
इस प्रकार अनेक यादें हैं जो अब स्मृतियां बन गयी हैं। तब बाहर धनसंग्रह कर बंदी कार्यकर्ता जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, उनके परिवारों को जीवन यापन हेतु न्यूनतम आर्थिक सहायता देना, जिसमें संघ की योजना से काम किया। जेल में गिरफ्तार साथियों के उचित भोजन की व्यवस्था हेतु बाहर से अतिरिक्त, राशन की व्यवस्था की गई। उस समय का एक महत्वपूर्ण विषय था अपने उन साथियों की जमानत करवाना जिनकी जमानत हो सकती थी। वकील मनमानी फीस मांगते थे। तब अपने कार्यकर्ता वकीलों का एक पैनल बनवाया जो निःशुल्क जमानत करवाते थे।
देश सुरक्षित होगा तब हम सुरक्षित होंगे। इस भाव की आवश्यकता है। लोकतंत्र को स्थिर रखने के लिए इसके स्थायी भावों को जीवंत रखना होगा। कुर्सी (पद) का स्वभाव है नींद आना, हमें जगाते रहना पड़ेगा, जिससे जड़ता न आये, लोकतंत्र के सारे अवयव जीवित रहें। स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा का नाद है वो कभी बाधित न हो।
जिन लोगों ने लोकतंत्र के लिए जून 1975 संघर्ष किया, जेल गए, जेल के बाहर लड़ते रहे, उनमें से 70 प्रतिशत से अधिक लोग हमारे बीच नहीं हैं। जो अपनी युवा अवस्था में जेल गये थे, वे प्रौढ़ावस्था पार कर चुके हैं, और लगातार उनके जाने के समाचार प्राप्त होते रहते हैं। लगता है कि आने वाले 10 वर्षों में वह पीढ़ी भी समाप्त हो जायेगी जिसने आपातकाल का दुःख दर्द देखा और समझा है। आपातकाल के लिए कांग्रेस ने अभी तक देश से माफी नहीं मांगी है न उन्हें इसकी शर्मिंदगी है। इससे आने वाले दिन और चुनौतीपूर्ण हैं।

















