आपातकाल में सत्ता का चाबुक उस पर चला जिसने सत्ता दिलाई। इंदिरा गांधी सरकार ने कुर्सी के चलते जनता पर जुल्म किए। भीषण यातना दी गई। लेकिन लोकतंत्र सेनानियों का हौसला नहीं डिगा। दिल्ली के सुरेश गुप्ता ने भी लोकतंत्र के लिए यातना सही।
सुरेश गुप्ता बताते हैं कि जिस समय लोकतंत्र की हत्या कर आपातकाल की घोषणा हुई, उस समय मैं संघ शिक्षा वर्ग वैश्य कॉलेज, रोहतक में था। प्रथम वर्ष का शिक्षार्थी था। अधिकारी भूमिगत हो गए। कुछ कार्यकर्ताओं ने वर्ग को समाप्त कर, स्वयंसेवकों को घर जाने का आदेश दिया।
दिल्ली, घर पहुंचकर कुछ ना कुछ कार्य करने का आदेश हमें अधिकारियों की ओर से मिलता रहा। जिसे हम समय-समय पर पूरा करते रहे। नवम्बर में सत्याग्रह करने की योजना बनी। हम 4 नवम्बर 1975 को तत्कालीन छात्र नेता रजत शर्मा के नेतृत्व में दिल्ली विश्वविद्यालय में सत्याग्रह करने के लिए दिल्ली कैंपस में पहुंचे। हमारी संख्या लगभग 40 रही होगी। हम सभी 17-18 साल से लेकर 20 साल तक के नौजवान विद्यार्थी थे। भारत माता की जय बोलते हुए हम सभी ने गिरफ्तारी दी। लगभग 3 महीने जेल में रहकर अधिकारियों ने हमारी जमानत करा दी।
देशभर में 25 जून 1975 को काला दिवस मनाने का निश्चय किया गया। मुझे उस रात्रि को चांदनी चौक में पोस्टर लगाने थे। हमारी टोली में 3 लोग थे, पवन गुप्ता, चंद्रभूषण आर्य और मैं। लाल किले से लेकर फतेहपुरी तक की एक पट्टी में पोस्टर लगाने थे। हमें जो पोस्टर मिले थे उस पर इंदिरा गांधी की फोटो को जेल में सलाखों के पीछे दिखाया गया था और उस पर लिखा था “तानाशाह की अंतिम जगह। मध्य रात्रि के बाद लगभग 2.00 बजे पुलिस ने हमें गिरफ्तार कर लिया। हम उस समय कटरा नील के सामने बल्लीमारान के टेलीफोन बूथ पर पोस्टर लगा रहे थे। गिरफ्तार करने के बाद हमें लाहौरी गेट थाने ले जाया गया और रात भर यातनाएं देने के बाद हमसे पूछताछ की गई।
तीन दिन तक भयंकर यातना
पुलिस ने अपनी जानकारी और हमसे बातचीत के आधार पर पंडित धन प्रकाश जी के यहां छापा मारा और उसमें भी कुछ पोस्टर पकड़े गए। इस प्रकार से हम चार लोग हो गए और चारों लोगों की पुलिस ने तीन दिन की रिमांड कोर्ट से प्राप्त कर ली। तीनों दिन पुलिस के अत्याचार जारी रहे। कभी डंडा डोली बनाकर, कभी डंडा फंसाकर, कभी उल्टा लिटा कर हंटर से, डंडे से, हाथ पर चढ़कर पुलिस जो भी अधिक से अधिक यातनांए दे सकती थी। थाने में उलटा लटकाकर नाक में मिर्च डाली गई। कभी दीवार में बाल पकड़कर मारकर पुलिस ने हम चारों से बड़ी गहराई से जानने की कोशिश की लेकिन हमारा एक ही जवाब होता था “भारत माता की जय-भारत माता की जय। रिमांड पूरा होने पर हमें तिहाड़ जेल (मीसा के अंतर्गत) भेज दिया गया। हम सब लोग आपातकाल समाप्त होने तक तिहाड़ जेल में मीसा बंदी के रूप में रहे।
जब जज ने सवाल किया और डर भी दिखा
जिस समय हम तिहाड़ जेल में थे उस समय एक नाम की गलतफहमी के कारण मुझे दिल्ली हाई कोर्ट ले जाया गया। समाज में भय का कैसा वातावरण था, कितना आतंक था, इस घटना से पता चलता था। जब मुझे हाई कोर्ट में पेश किया गया, तब जज साहब ने मुझसे पूछा “आपका नाम और आपकी उम्र क्या है? मैंने कहा “मेरा नाम सुरेश चंद है, मेरी उम्र 17 वर्ष है” तो दोनों जजों ने एक साथ कहा कि “18 वर्ष से कम की आयु के व्यक्ति को मीसा कैसे लग सकती है?” तब मैंने उनसे कहा कि “सर में भी तो यही जानना चाहता हूँ?” हाईकोर्ट के दोनों जजों ने आपस में एक दूसरे को देखा और धीरे से कुछ बात की दोनों जज अंदर से कितने भयभीत थे यह दिखाई दे रहा था। वह मुझे छोड़ना तो चाहते थे, लेकिन ऊपर के आदेश के कारण उन्होंने मुझे पुनः तिहाड़ जेल में वापस भेज दिया।
















